मोदी के मनोवैज्ञानिक चक्रव्यूह में फंसी कांग्रेस

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सतीश जोशी

लोककसभा चुनाव के दौरान नरेंद्र मोदी के भाषणों में नामदार विरुद्ध कामदार की बड़ी बहस छिड़ी। उस बहस का असर वंशवाद पर जरूर पड़ा है। बकौल नरेंद्र मोदी नामदार लोग उत्तरप्रदेश, बिहार से खेत रहे और नेहरू-गांधी परिवार पर भी उसकी आंच आई। अमेठी से राहुल गांधी का हारना नरेंद्र मोदी के वंशवाद पर किए गए हमले का सबसे बड़ा नमूना है। नरेंद्र मोदी चुनावी सभाओं में अपने को कामदार बताकर जनता के बीच नामदारों के खिलाफ सहानुभूति लूटकर फिर से सत्ता में आ गए। सत्ता में आने का यही एक कारण नहीं है और भी बहुत सारे कारण हैं जिनको गिनाया जा सकता है।

यहां हम इस पर चर्चा नहीं करते हुए नरेंद्र मोदी के नामदारों के खिलाफ रचे गए मनोवैज्ञानिक चक्रव्यूह की चर्चा करेंगे। चुनाव में जो हुआ सो हुआ, पर परिणाम के बाद समूची कांग्रेस इस मनोविज्ञानिक जाल में फंस गई है। ऐसी फंसी कि राहुल गांधी का इस्तीफा वापस लिए जाने की कोई शक्ल नहीं बन रही है। दरअसल, कांग्रेस इस मनोवैज्ञानिक चक्रव्यूह से बाहर निकलने के लिए गांधी-नेहरू परिवार से सीधे संचालित न होकर अब किसी वफादार से संचालित होने की राह पर निकल पड़ी है। लोग कहते हैं राहुल युग समाप्त हुआ, मगर ऐसा नहीं है।

सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी सीधे उस व्यक्ति का चुनाव नहीं करेंगे जो कांग्रेस पार्टी को चलाए, मगर हां व्यक्ति वही होगा जो उनकी पसंद का होगा। यानी राहुल का छाया युग आने वाला है। कांग्रेस पार्टी इसके लिए मजबूर हुई है कि गांधी-नेहरू परिवार कुछ सालों के लिए सीधे कांग्रेस पार्टी को नहीं चलाए। यह नरेंद्र मोदी के वार का ही कमाल है। नामदारों की पार्टी कह कहकर उन्होंने समूची कांग्रेस की सोच को इसी दिशा में मोड़ दिया है। कांग्रेस संगठन अपने को मजबूत करने की बजाय रहे-सहे संगठन को भी छिन्न-भिन्न करने में लगी है। अच्छे दिनों में कोई भी पार्टी संगठन चला सकता है, मगर बुरे दिनों एक ऐसा केंद्रबिंदु होना चाहिए, जिसकी सब सुनें।

युवा नेतृत्व के नाम पर जिसको भी सामने लाया जाएगा उसके खिलाफ एक नया धड़ा कांग्रेस पार्टी में चुनौती बन जाएगा। यदि किसी बुजुर्ग को कमान सौंपी गई तो फिर पहले से ही वरिष्ठ और कनिष्ठ की लड़ाई से जूझती कांग्रेस बाहर कैसे निकलेगी? दक्षिण भारत में कांग्रेस के हाल सबको पता हैं। वहीं उत्तर भारत में उसकी और भी बुरी दशा है। कहने को मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में उसकी सरकारें दिखाई देती हैं, मगर वे कैसी चल रही हैं और वे कितना पार्टी को भविष्य के लिए खड़ी कर रही हैं यह सब जानते हैं।

जिस तरह सरकारें चल रही हैं उससे पार्टी का रहा-सहा संगठन भी सत्ता और संगठन की लड़ाई में ध्वस्त होता दिख रहा है। दक्षिण में कर्नाटक के ताजा हालात से निपटने के लिए नेतृत्व की शून्यता सत्ता को बचा पाएगी कि नहीं कहना मुश्किल है। कुल मिलाकर संगठन को गति देने की प्रक्रिया शुरू करने का यह असर था, जब सत्ता हाथ में नहीं है, तब संगठन कौन चलाए इस उधेड़बुन में पूरी पार्टी लग गई है। फैसला लेने वाली कांग्रेस वर्किंग कमेटी में सब एक-दूसरे को राय देने की बजाय उस व्यक्ति की तलाश में हैं जो सबको साथ लेकर चले।

ऐसा कोई व्यक्ति नजर नहीं आ रहा है। दस साल की मनमोहन सिंह सरकार में सोनिया गांधी ने सत्ता और संगठन को बखूबी चलाया, मगर सत्ता को स्थायी भाव मान लेने और लूट मचाए रखने की प्रवृत्ति ने नरेंद्र मोदी जैसे योद्धा को जन्म दिया। 2014 और 2019 की जंग जीतकर नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी विधानसभाओं की नई लड़ाई के लिए अपने को तैयार कर रही है, वहीं कांग्रेस पार्टी नरेंद्र मोदी के मनोवैज्ञानिक चक्रव्यूह में फंसी हुई है। एक तरफ बरस रहे मेघ के जनसैलाब में नदी-नाले बह चले हैं, वहीं लोकसभा चुनाव में बरसे तीखे व्यंग्यबाणों में उल झी कांग्रेस अपने को इस मनोवैज्ञानिक हमले से कैसे बचाए? यह लाख टके का सवाल है।

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