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कांग्रेस का ‘इस्तीफा काल’ और दायित्व को लेकर घुमड़ते सवाल

Posted on: 09 Jul 2019 10:23 by Surbhi Bhawsar
कांग्रेस का ‘इस्तीफा काल’ और दायित्व को लेकर घुमड़ते सवाल

अजय बोकिल

कांग्रेस में इन दिनों इस्तीफों की झड़ी लगी है। हर कोई अपने अपने पद से इस्तीफा दे रहा है और इस अंदाज में दे रहा है ताकि सनद रहे। मीडिया ने इसे कांग्रेस का ‘इस्तीफा काल’ बताया है। इस आपाधापी में यह समझना मुश्किल है कि जब इस्तीफा देना ही है तो सब पदाधिकारी एक साथ इस्तीफे क्योंं नहीं दे देते। ताकि पब्लिक में चुनाव हार की नैतिक जिम्मेदारी सामूहिक रूप से स्वीकार करने का संदेश तो जाए। लेकिन कांग्रेस में इस्तीफों का दौर भी किश्तों में चल रहा है। इन इस्तीफों का अंदाज भी जुलूस में चल रहे अखाड़े में एक के बाद एक करतब‍ दिखाने वालों जैसा है। एक नेता अचानक आत्मग्लानि के भाव से इस्तीफा दे देता है। भीतर भाव यह कि वह देना तो नहीं चाहता था, लेकिन चूंकि जब पार्टी अध्यक्ष ने ही पद से पल्ला झाड़ लिया है तो वह भी इस्तीफा देने को विवश है।

हो सकता है कि इस्तीफों का माहौल सुर्खियों में रखने के लिए कांग्रेस के नेता रूक-रूक कर इस्तीफे दे रहे हों। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद अध्‍यक्ष राहुल गांधी ने हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफे का ऐलान यह सोच कर किया था कि शरमा-शरमी में बाकी लोग भी ऐसा ही करेंगे। लेकिन एक-दो फुटकर इस्तीफों की पेशकश से ज्यादा कोई हलचल नहीं हुई। भाव यही था कि महज एक हार के लिए भला कोई पद छोड़ता है क्या? और छोड़ भी ‍िदया तो उससे होगा क्या? ऐसे में जो जहां है, जमा रहे। घूरे के भी दिन बदलते हैं तो अपने भी बदलेंगे।

राहुल गांधी ने चुनावी हार के कांग्रेस शासित मुख्य मंत्रियों के रवैए पर भी निशाना साधा था। लेकिन किसी मुख्यीमंत्री ने पद से त्यागपत्र नहीं दिया। बाद में कमलनाथ ने पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष पद जरूर छोड़ने की पेशकश की। कांग्रेस की कार्यकारिणी में भी जोर इसी बात पर रहा कि खुद इस्तीफा देने की बजाए ‘बाॅस’ का इस्तीफा कैसे रूकवाया जाए। अंतत: चुनाव के दौरान कांग्रेसियों द्वारा उन्हें अंधेरे में रखने से आहत राहुल गांधी ने आजिज आकर खुद अपना इस्तीफा सार्वजनिक कर दिया।

कहा कि वे अब जिम्मेदारी से मुक्त हैं। पार्टी अपना नया अध्येक्ष चुन ले। राहुल के इस कदम के बाद पार्टी के मुंह में जमा दही छाछ में बदलने लगा। एक के बाद एक नेता इस्तीफे तो दे रहे हैं, साथ ही बदले में किसी नए ‘पैकेज’ की उम्मीद भी बांधे हुए है। एक जमाना था, जब पार्टी अध्यक्ष के. कामराज के कहने पर एक झटके में कांग्रेस संगठन के सभी पदाधिकारियों ने इस्तीफे दे डाले थे। ताकि संगठन में आमूलचूल बदलाव किया जा सके। लेकिन आज की कांग्रेस में तो इस्तीफों की बूंदाबांदी भी रूक रूक कर हो रही है। बुजुर्ग नेता कह रहे हैं कि जल्दी कोई नया खेवनहार तलाश लो, लेकिन वह भी नहीं हो पा रहा है।

उधर कर्नाटक में यह ‘इस्तीफा काल’ अलग रंग में नजर आ रहा है। वहां सत्तारूढ़ कांग्रेस व जेडीएस के 13 विधायकों ने नाराज होकर इस्तीफे दे दिए हैं। सरकार बचाने के लिए कांग्रेस ये इस्तीफे वापस कराने की जी तोड़ कोशिश कर रही है। उसने इसे भाजपा का षडयंत्र बताया है तो भाजपा का कहना है ‍कि इस राजनीतिक षड्यंत्र के पीछे उसका कोई हाथ नहीं है। इस पर लोकसभा में सांसद अधीर रंजन चौधरी ने आरोप लगाया कि भाजपा देश में लोकतंत्र को खत्म करना चाहती है। जबकि भाजपा इन इस्तीफों में छिपी इबारत को पढ़कर मुदित है। क्योंकि इस्तीफों से भाजपा के सत्ता में आने का रास्ता भी खुलेगा।

यहां सवाल यह है कि कांग्रेस की इस अवस्था को ‘इस्तीफा काल’ क्यों कहा जा रहा है? क्या कांग्रेस में इससे पहले कभी इस्तीफे नहीं हुए या फिर इस तरह अनमने ढंग से कभी नहीं हुए? इंदिरा गांधी के जमाने में तो आंख के एक इशारे पर इस्तीफा हो जाया करता था। लेकिन अब तो इस्तीफे के बाद की संभावनाअों को ध्यान में रखकर ही इस्तीफे दिए जा रहे हैं। मुंबई प्रदेश कांग्रेस अध्येक्ष मिलिंद देवड़ा के इस्तीफे की नीयत पर तो पार्टी के नेता संजय निरूपम ने ही सवाल उठा दिए। इसी प्रकार कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव के पद से इस्तीफा देने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थको ने इसे ‘नई सुबह’ के आगाज के रूप में देखा और महाराज के समर्थन में पोस्टर लगा दिए।

उधर पब्लिक में मैसेज यह है कि वास्तव में पार्टी में इस्तीफा कोई देना नहीं चाहता। पर देना मजबूरी है। हालांकि यह समझना मुश्किल है कि ये इस्तीफे हार की जिम्मेदारी बांटने के लिए हैं अथवा अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने के लिए हैं? इन इस्तीफों से कांग्रेस का ‘काया कल्प’ होगा या उसकी क्षीण काया मोक्ष को प्राप्त होगी?

दरअसल किसी देश, समाज, संस्कृति और राजनीतिक इतिहास के अध्यीयन के लिए समयानुसार मुख्यत प्रवृत्तियों के आधार पर उसे काल खंडो में विभाजित किया जाता है। आज के संदर्भ में समझें तो देश में अलग-अलग अनुशासनों में लगभग एक जैसे ही ‘काल’ चल रहे हैं। मसलन पत्रकारिता में यह ‘भक्ति काल’ है तो प्रशासनिक क्षेत्र में यह ‘रीति काल’ है। क्योंकि दरबारी किस्म के लोग ही सरकारें चला रहे हैं। उधर भाजपा में यह ‘ व्यक्ति काल’ है तो कांग्रेस में समुचित नेतृत्व के अभाव में ‘रिक्ति काल’ है। जिसकी पूर्व पीठिका ‘इस्तीफा काल’ के रूप में है।

कहने को इन इस्तीफों का मकसद पार्टी को मजबूत करना है। लेकिन कैसे और कब यह कोई नहीं बता रहा है। कांग्रेस में अब हर कोई मैदान छोड़ने की तैयारी में है, लेकिन इस्तीफो के दम पर मैदान कैसे मारा जाएगा, यह बूझने और बताने के लिए तैयार नहीं है। भीतर डर है कि इस्तीफा न दिया तो इसका दूसरा मतलब न निकाला जाए। कहा जा रहा है कि ‘इस्तीफा काल’ का अंत नई नियुक्तियों से ही होगा, लेकिन ये युक्ति भी भिड़ाए कौन?

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