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राजनीति के लुभावने और मोहक अंदाज़ में है राहुल गांधी, सुरेंद्र बंसल की कलम से

Posted on: 31 Oct 2018 17:05 by Ravindra Singh Rana
राजनीति के लुभावने और मोहक अंदाज़ में है राहुल गांधी, सुरेंद्र बंसल की कलम से

चुनाव के माहौल के बीच कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का मप्र के मालवांचल का दौरा एक सफल राजनैतिक प्रयास कहा जा सकता है। राहुल कई मायनों में सफल रहे और इसके साथ यह कहना एक ईमानदारी है कि वे इस दौरे में इस दौर के ऐसे प्रतीकात्मक नेता की तरह उभरें हैं जो शालीन, संयत और विवेकशील नज़र आते हैं । वे राजनैतिक परिपक्वता की ओर बढते हुए हैं उसमें खास कि उनकी शैली में कहीं अहम और अहंकार नहीं है।

अहम और अहंकार का जिक्र इसलिए कि इन दिनों बहुतेरे परिपक्व नेताओं में यह जैसे खलबत्ते से कुटकुट कर खचाखच भरा हुआ है। लोक की आवाज़ हमेशा तंत्र को लाज से सुनना चाहिए और संवाद को लज़्ज़ददार बनाना चाहिए।

राहुल गांधी इंदौर में इसी अंदाज से भिन्न भिन्न लोकवर्ग में सयानी बिल्ली के कदमों की तरह विचरण करते रहे जिसे लुभावना कैट वाक कहा जा सकता है। जब कैट वाक किया जाता है तो मॉडल को यह फिक्र नही होती कि उसके तन से कोई कपड़ा फिसल गया है यह उस मॉडल का अंदाज़ और समपर्ण है कि उस वक़्त वह सिर्फ इस सुविचार से आगे बढ़ते हैं कि अपना प्रदर्शन लुभावना और मोहक होना चाहिए।अनहोनिया जीवन में आती है लेकिन आगे बढ़ता हुआ व्यक्ति ही उससे मुकाबला कर सकता है , राहुल गांधी इस समय राजनीति के मोहक और लुभावने अंदाज़ में हैं और उनकी बढ़ती परिपक्वता उनकी छवि का नवनिर्माण कर रही है, कमोबेश इंदौर में उन्होंने यही दिखाया है।

मीडियाकर्मी उनसे मिलकर बहुत आश्वस्त लगे , लोग यह समझ नहीं पाए आखिर राहुल गांधी का पप्पू कहकर क्यों उपहास किया जाता है, दरअसल पप्पू शब्द का अर्थ ही सोशल मीडिया ने बदल दिया है और इसके अनर्थक बढ़ते अर्थों ने पप्पू शब्द की सरलता को बदनाम कर दिया है। पप्पू का अर्थ सीधा, सरल, शांत ,संयत और भोला होना है । स्वयं राहुल गांधी ने एक पत्रकार की निर्भीकता से पूछे सवाल पर पप्पू होने का जवाब भोला होना ही कहा है और इसे शिव से जोड़कर भोलेनाथ के शब्दार्थ से समझाया है। परिवारों में अकसर घर के छोटे बच्चे का नाम पप्पू होता है तो इसका सीधा अर्थ प्यार से लाडला ही होता है। लेकिन सोशल मीडिया ने राहुल गांधी को टारगेट कर इस प्यारे शब्द का अर्थ ही बिगाड़ दिया है। राजनीति में ये कुटिलता अनीति है फिर इसे फेंकू और चोर जैसे गंदले जुमले की तरह कहें वह भी। ऐसी शब्दावलियां राजनीति के मायनों को भ्रमित कर माहौल को गँदला करती है।

बहरहाल राहुल गांधी ने इंदौर और आसपास अपने अंदाज को जिस तरह से प्रस्तुत किया है उससे उन्हें शान्त, शालीन, संयत के साथ निर्भीक , चुनौतीपूर्ण हालात से जूझने में समर्थ और विवेकशील जब कह सकते हैं तो मान लीजिये अब तक उनकी जो छवि दिखाई जा रही थी उससे वे भिन्न और मजबूत नेता की तरह उभरते किरदार हैं। राहुल जब किसी रेस्त्रां में खाने जाते है तो बेहद संजीदा होकर लोगो से आत्मीयता से मिलते हैं , फिर चाहे यह उनमे परिवर्तन के तौर पर दिख रहा हो यह एक अच्छा संकेत है। राजनीति में राष्ट्र और राष्ट्र के लोगों का भला तब ही है जब दोनों पक्ष और विपक्ष मजबूत हो, राहुल ने इंदौर में इस तरह कई भरम और अवधारणाओं को तोड़ा है निश्चित तौर पर इंदौर से निकलकर बहुत आगे बढे है, उनके चेहरे का नूर ही नहीं उनकी राजनीति के कदमचाल भी मोहक और लुभावने होते जा रहे हैं।

सुरेन्द्र बंसल
(राजनैतिक विश्लेषक)

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