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मैने तो राहुल गांधी से पूछ ही लिया, आप को भाजपा पप्पू क्यों कहती है?

Posted on: 31 Oct 2018 16:01 by Ravindra Singh Rana
मैने तो राहुल गांधी से पूछ ही लिया, आप को भाजपा पप्पू क्यों कहती है?
इंदौर:  जिस टेबल पर हम पत्रकार मित्र बैठे थे वहां तो अपना प्रश्न पूछने का नंबर लगा नहीं लेकिन अपन ने भी तय कर रखा था पूछूंगा तो सही। आखिर टेबल पर वो प्रश्न के जवाब में कह रहे थे कि यम द्वार जो है वह अहं के त्याग का प्रतीक है….अपना ध्यान तो लगा हुआ था कि बस जवाब खत्म हो जाए। वो जैसे ही अपने सामने से निकलने लगे, अपन ने रोक लिया। साइड में खड़े एसपीजी जवान ने हाथ पकड़ पीछे खींचना चाहा तब तक तो अपन ने प्रश्न दाग दिया था-राहुल जी, आप के इतने अच्छे विचार हैं, बोलते भी अच्छा हैं फिर ये भाजपा वाले आप को पप्पू क्यों कहते हैं? आसपास खड़े अन्य पत्रकार मित्र भी हंस पड़े, मेरे चेहरे पर नजर गड़ाए राहुल कुछ पल चुप रहे फिर मुस्कुराते हुए बोले शिव का दूसरा नाम पता है? मैंने कहा आप ही बताइये। वो बोले उनका दूसरा नाम भोलेनाथ हैं। भोलेनाथ यानी भोले। मैं भला हूं, भोला हूं।मैं शिव भक्त हूं, मुझे फर्क नहीं पड़ता वो क्या कहते हैं।अपने जवाब से संतुष्ट कर राहुल गांधी आगे बढ़ गए।
करीब एक घंटे मीडिया से बातचीत में उन्होंने हर प्रश्न का बिना विचलित हुए आत्मविश्वास से जवाब तो दिया ही। यह भी ध्यान रखा कि पूरा उत्तर हो जाए, बीच में किसी पत्रकार ने टोकना चाहा तो विनम्रता से कह भी दिया मैं अपनी बात पूरी कर लूं।
सोमवार की रात वाले रोड शो, छप्पन दुकान पर आइस्क्रीम खाने और मीडिया से हुई इस चर्चा में यह बात मार्क करने वाली थी कि राजीव गांधी अपने जिस भोलेपन और स्मित मुस्कान के कारण दिल जीतने में माहिर थे कुछ वैसा ही अंदाज राहुल का भी है, और शायद यही वजह है कि भाजपा को पप्पू के बदले किया जाने वाला गप्पू (फेंकू) वाला पलटवार अधिक घातक लगने लगा है या संघ की सलाह काम कर रही हो कि अब संबित पात्रा जैसे वाचाल प्रवक्ता भी पप्पू कहना याद नहीं रखते।या हो सकता है कि भाजपा ने बीते सालों में हर मोड़ पर जिस तरह मखौल उड़ाया वही सब अब प्रेशर कुकर के रूप में पलटवार का काम कर रहा है।
आदमी वही जो अपनी गलतियों से सीखे और मीडिया से राहुल की चर्चा में शुरु से आखिर तक कहीं लगा नहीं कि राहुल परिपक्व नेता नहीं है।उन्होंने झाबुआ में जहां गलती से कार्तिकेय का नाम लेने की बात स्वीकारी, वहीं साथ में ई टेंडरिंग और व्यापम घोटाले का जिक्र करते हुए शिवराज को लपेट लिया। यूपीए सरकार की विफलताओं की जिम्मेदारी स्वीकारीं वहीं मनमोहन सिंह की ईमानदारी को भी याद किया। भले ही एक सार्वजनिक सभा में कागज फाड़कर  मनमोहन सिंह के फैसले की धज्जियां उड़ाई हों लेकिन आज भ्रष्टाचार में घिरे चौकीदार को चोर बताते हुए फख्र से कह रहे थे यूपीए सरकार में मनमोहन सिंह पर इस तरह का एक भी आरोप नहीं लगा।संसद में पीएम से गलबहियां  वाले राहुल के अंदाज ने जिस तरह पूरे विश्व को चौंकाया आज के उनके आत्म विश्वास से यही भाव झलक रहा था।वे आज फिल्म का सीन नहीं कर रहे थे बल्कि मीडिया मंचपर अपना रोल अदा कर रहे थे। सार्वजनिक सभा में नेता के पास भाषण या पॉइंट लिखे होते हैं, राजबाड़ा की सभा में जैसे वह अहिल्या देवी का नाम लेना भूल गए थे तो साथ के नेताओं ने याद दिला दिया था।
मीडिया से इस चाय चर्चा से पहले किसी नेता ने इस तरह की सेटिंग भी नहीं की थी कि कौन चैनल वाला, बड़े अखबार वाला क्या प्रश्न पूछेगा। उल्टा हुआ यह कि जब सिंधिया हर टेबल पर जाकर कम समय होने का हवाला देकर यह अनुरोध कर रहे थे कि बस दो प्रश्न से ज्यादा मत पूछिएगा तो एक टेबल से यह आवाज भी उठी कि सिंधिया जी आप ही तय कर दीजिए कि दो प्रश्न में भी क्या पूछना है। खुद राहुल को पता नहीं था किस टेबल से किस मिजाज का सवाल उछाला जाएगा।उनके चेहरे के भाव बता रहे थे कि वे हर बॉल का सामना करते हुए हेलीकॉप्टर शॉट लगाने के लिए भी तैयार हैं।राहुल गांधी से चर्चा य के दौरान न्यूज चैनलों पर खास अवसरों पर प्रसारित किए जाने वाले वो इंटरव्यू भी याद आते रहे जिसमें पूर्व निर्धारित सवाल और तय जवाब होने के बाद भी अहं के आगे साक्षात्कार करने वाले का विश्वास थर थर कांपता नजर आता है।
होटल में राहुल गांधी की मीडिया से चर्चा सुबह 8.30 बजे की अपेक्षा एक घंटे विलंब से शुरु हुई । हर दो टेबल जोड़ कर ग्यारह कुर्सियां रखीं थीं। मीडिया कनेक्ट का दायित्व संभाल रहीं शोभा ओझा हर टेबल पर जा कर जानकारी दे रही थीं कि तीन कुर्सियां राहुल जी, कमलनाथ और सिंधिया के लिए रिजर्व रखिए। वे हर टेबल पर आएंगे। आप से पांच मिनट चर्चा करेंगे। जो सवाल पूछना हो, सुझाव, फीडबेक देना हो आप सब स्वतंत्र हैं। हमारा कैमरामेन रहेगा, उस वक्त के फोटो भी लेगा। आप मोबाइल से वीडियो, सेल्फी ना लें।
कुछ देर बाद कमलनाथ को लेकर नरेंद्र सलूजा हर टेबल पर पत्रकारों से परिचय कराने ले आए। कमलनाथ कांग्रेस की स्टेटजी बता रहे थे कि राहुल जी शहर, गांव की मानसिकता, क्षेत्रीयता आदि के मुताबिक भाषण देते हैं। कई जगह तो खुद अचानक अपने मुताबिक भी बोलते हैं। जैसे झाबुआ में वो कर्ज में डूबी मप्र सरकार के आंकड़े गिनाने लगें तो आदिवासी मतदाता को क्या मतलब इससे। झाबुआ में उन्होंने इंदिराजी, राजीव जी की इस आदिवासी अंचल से आत्मीयता का जिक्र किया।
इसी बीच ज्योतिरादित्य
संवाद के दौरान उनकी बॉडी लैंग्वेज भी बता रही थी कि वे हर तरह के सवाल का सामना करने, जवाब देने का मन बना कर आए हैं। बीती रात वो ब्लेक टीशर्ट और जींस में छप्पन दुकान गए थे। जब मीडिया से सामना करने आए तो क्लीनशेव राहुल का चेहरा जरूर चमक रहा था लेकिन बिना प्रेस किया सलवटों वाला कुरता पाजामा पहने हुए थे। ये बात अलग है कि बाकी नेता साक्षात्कार में भी ड्रेसअप-मेकअप आदि का खयाल रखते हैं।पूरे वक्त नाथ, सिंधिया अगल-बगल बने रहे हों ऐसा भी नहीं था । कुछेक बार तो उन्होंने मप्र संबंधी किसी प्रश्न का जवाब देने के लिए इन दोनों को पुकार कर पास बुलाया।दंभ और तुनकमिजाजी से परे राहुल भविष्य में भी इसी तरह पेश आते रहे तो भाजपा के लिए ऐसी चुनौती भी साबित हो सकते हैं जिसके साथ अदृश्य रूप से जनतंत्र की मंत्र सिद्धी भी जुड़ी हुई महसूस होगी ।
यदि ऐसा हुआ तो भाजपा क्या करे?
✅ जिले से लेकर राज्य और केंद्र तक के नेताओ को अहं का आसन त्यागना होगा। मोदी-शाह को दिमाग से निकालना होगा कि सारा देश भाजपा कार्यकर्ता नहीं है।
✅पसंद न आने वाले मीडिया को ठिकाने लगाने वाले भाव, खुन्नस को त्यागना होगा।अपने भाषणों में संतों के प्रति सम्मान का भाव दर्शाने वाले महामानवों को यह पंक्ति याद रखना चाहिए कि निंदक नियरे राखिए….
✅दुर्भाग्य यह है कि जो नेता अटलजी को तेजी से भूल रहे हैं उन्हें उस जमाने के शाइनिंग इंडिया की दुर्गति को तो याद रखना ही चाहिए। जिसकी शाइनिंग के आगे अटल सरकार का तेज ही फीका पड़ गया था।
✅कांग्रेस में जिस तरह कार्यकर्ता भड़भड़ा कर उठ बैठा है तो बराबरी की टक्कर में भाजपा कार्यकर्ता क्यों नहीं खड़ा हो पा रहा है-इसका मंथन बंद कमरा बैठकों में करने से बेहतर होगा कि ग्राउंड लेबल पर जाया जाए।
✅शिवराज के पंद्रह साल में क्यों अधिकारी हर जिले में शेडो सीएम होते गए। सत्ता में निगम-मंडल आदि की भागीदारी भी क्यों समय रहते नहीं मिल पाई। क्यों तबादले से लेकर नक्शा पास कराने, अतिक्रमण हटवाने तक में कार्यकर्ता को लेन-देन का रास्ता ही अपनाना पड़ा, ये सारे कारण तलाशने होंगे।
✅क्यों शिवराज की जन आशीर्वाद यात्रा को अपने जिले में सफल बताने के लिए कलेक्टरों को माथापच्ची करना पड़ी? पंद्रह साल के सफलतम सीएम प्रचारित शिवराज को क्यों आशीर्वाद लेने के लिए यात्रा पर निकलना पड़ा, इस सवाल का जवाब तो खुद शिवराज सिंह को ही तलाशना होगा।
✅ जिन अ्धिकारियों की मंडली मियां मल्हार गाती रही उसे अब ही क्यों संगतकार ठीक नहीं लग रहे, माईक की आवाज पसंद नहीं आ रही-इन सारी गड़बड़ियों का निराकरण तो होने से रहा।जहाज में जो उथल पुथल मचती नजर आ रही है उसमें कहीं पेपरवेट के नीचे दबा ‘अबकि बार-दो सौ पार’ वाला कागज ना गिर जाए।
कीर्ति राणा की कलम से

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