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कांग्रेस को ऊर्जा मिली और शिवराज को संजीवनी, सुरेंद्र बंसल की टिप्पणी

Posted on: 30 May 2018 05:39 by Ravindra Singh Rana
कांग्रेस को ऊर्जा मिली और शिवराज को संजीवनी, सुरेंद्र बंसल की टिप्पणी

इसे अभयदान नहीं कह सकते लेकिन राजजीवन का नव संजीवन तो है ये… जी, मैं बात प्रदेश के मुखिया शिवराजसिंह की कर रहा हूँ। उन्हें कर्नाटक चुनाव से संजीवनी मिली लगती है वे आतुर और उत्साही हो चले हैँ। दिख यही रहा है…बीजेपी का कर्नाटक में पीछे हो जाने से नीतिज्ञों के बनाये हुए समीकरण बदल गए हैं … होना यही था कि शिवराज कब जाते हैं चुनाव के पहले या चुनाव के बाद, लेकिन बनाई हुई नीति पर कर्नाटक में सरकार गठन की विफलता ने पानी उड़ेल दिया । अब शिवराज बांध के पानी की तरह ठहरा दिए गए हैं और यही वजह है सरकारी ताज़िये के विसर्जन के पूर्व ही शिवराज सरकार चुनाव के चौराहे पर खडी हुई है और अपनी ही भूली हुई घोषणाओं, वादों और कार्यक्रमों के नीचे से निकलकर  अमरत्व पाना चाहती है।

इन दिनों गौर से देखिए अपने मुख्यमंत्री को… वे कह रहे है,डाँट रहे हैं , नाराज़ हो रहे हैं , दौड़भाग कर रहे हैं, रीति नीति निर्धारित कर रहे हैं , विपक्ष को घुर कर घेरने की कोशिश कर रहे हैं, और कवायदें अंजाम का हुक्म कारिंदों को जाहिर कर रहे हैं। बाप रे…कर्नाटक के पहले तो ऐसा नहीं था .. तब वे कह रहे थे मैं रहूँ या न रहूँ ,यह कुर्सी जो मुख्यमंत्री के लिए आरक्षित है हमेशा  रहेगी ,इस पर जो चाहे आकर बैठ सकता है। शिवराज जी का अंतर्मन से उपजित यह कथ्य यूँ ही नहीं था , अमित शाह भोपाल पहुंचने वाले थे उसके तार इसी आधार से तन्मय होकर उर्जित हो चले थे ,शायद तेरह बरस के मुख्यमंत्री को यह आभास हो चला था कि वे शिकार हो रहे हैं और मुख्यमंत्री के लिए आरक्षित कुर्सी जो आगे लगाई गयी है वह अब भपका दे रही है।

लेकिन ,ऐसी स्थितियां अब शांत हो गयी है , परिवर्तन के भपकते कोयले पर पानी डल गया है। कर्नाटक के चुनाव ने उन्हें यह नवसंजीवन प्रदान किया है । बीजेपी वहां चूक गयी तो शिवराज को खिसकाने से भी उसे चुकना पड़ा । ऐसा इसलिए कि मप्र में चुनाव पूर्व तैयारियों पर कांग्रेस पहले ही निकल पड़ी थी , वे अलग अलग चल कर एक हो चले। दरअसल कांग्रेस के सभी प्रादेशिक नेताओं की अक्ल इस ठिकाने पर आ चली कि नहीं चले साथ तो सब खा जाएंगे मात, और शायद यह भी कि इस बार भी नहीं तो फिर कभी नहीं। ऐसे में कूटनीति से कॉंग्रेस जब कर्नाटक में सरकार बनाने में कामयाब हो गयी तो उसका सुपर गियर मप्र में भी काम करने लग गया। नर्मदा परिक्रमा से लौटे दिग्विजय सिंह की कांग्रेस के भीतर एकता यात्रा चल रही है । वे कभी सिंधिया से मिल रहे हैं तो कभी अरुण यादव से बंद कमरे में गुफ्तगू कर रहे हैं, कमलनाथ से वे नियमित ही चर्चा कर लेते हैं । और जो भी सुराख उन्हें दिख रहे हैं वहां का पेंचवर्क कैसे करना है दिग्विजयसिंह इसी कारीगरी में लगे हैं। कमलनाथ संगठन के संचालन के मुख्य सूत्रधार हैं, उनके प्रयास बीजेपी को घेरकर कांग्रेस की अहमियत बढ़ाना और साथी नेताओं को जिम्मेदारी से सक्रिय करना है, कांग्रेस संगठन की नवीन संरचना भी यह दर्शाती है। तीसरे मुख्य अंग है ज्योतिरादित्य सिंधिया , महाराज वर्ग के ये नेता इन दिनों दलितों से नजदीकी में लगे है , बैल जुती गाड़ियों से लोक हित में जुलुसिये हो गए हैं , प्रदर्शन कर रहे है। वहीं जून के पहले पखवाड़ा कॉन्ग्रेस ने मेमोरियल बना दिया है, मंदसौर में हुए किसान गोलीकांड की याद में और आड़ में फिर किसानों को सड़कों पर लाने की कोशिश है।

कुल मिलाकर राजनैतिक सरगर्मी का दौर झुलसती गर्मी में शुरू हो चुका है जो लगता नहीं आनेवाले दिनों में बरसात के पानी से भी ठंडा पड़ेगा। शिवराज टिक गए है कितने समय के लिए यह वक़्त बताएगा लेकिन उनके राज का सबसे प्रतिद्वंद्वी दौर शुरू हो चुका है । जो कॉन्ग्रेस कभी विपक्ष का काम नहीं कर सकी वह सत्ता हथियाने के पूरे प्रयास अब कर रही है, उनकी योजनाएं समूल हो या निर्मूल हो लेकिन वे यह साफ है अब गली और कूचों से बाहर आती कांग्रेस नज़र आएगी। शिवराज यह भांप चुके है और हर कदम पर अपना वार करने के प्रयास में एक योध्दा बनने की कोशिश कर रहे हैं। वे चाहते तो अपना रिपोर्ट कार्ड हर छह महीने में दुरुस्त कर सकते थे , लेकिन  वे नवसंजीवनी पाकर चेते हैं और अब देख रहे हैं उन्होंने कितनी घोषणाएं की थी कितनी पूरी हुई और जो नहीं हुई तो क्यों नहीं हुई। यह भी की तेरह साल में सत्ता का झोला कहाँ कहाँ से फट गया उसे कैसे सूए और सुतली से सिलना है, यह भी कि किन सार्वजनिक नलों से नर्मदा की जगह सौगातों की धार निकालना है । इन सबके लिए शिवराज शुरू हो गए लगते हैं। राहुल गांधी जब नीमच मंदसौर पहुंचेंगे तब शिवराज का असली मल्टीमीटर टेस्ट होगा।

देखिए आगे बहुत कुछ होनेवाला है 

लेकिन मेरा कहना है कर्नाटक ने कांग्रेस को ऊर्जा दी और  शिवराजसिंह को संजीवनी।

*सुरेंद्र बंसल*

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