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अब उन्हें महाराज कहने का मन नहीं करता, मिलिंद मजूमदार की टिप्पणी

Posted on: 13 Jun 2018 09:17 by krishna chandrawat
अब उन्हें महाराज कहने का मन नहीं करता, मिलिंद मजूमदार की टिप्पणी

मित्रों अभी उनकी अंत्येष्टि नहीं हुई। ऐसे में यह लिखना वकई हमारी संस्कृति और परंपरा की कसौटी पर सर्वथा अनुचित है,लेकिन मन मान नहीं रहा सो आपसे शेयर कर रहा हूं।यदि किसी की भावना को दु:ख पहुंचता हो तो क्षमा करें।

बेशक वे बहुत बड़े धार्मिक नेता थे।
बेशक उन्होंने अपने प्रभाव का उपयोग सामाजिक कार्यों में किया।
बेशक उन्हें धर्म से ऊपर राष्ट्र लगता था।
बेशक वे बेहद पारदर्शी और बेबाक थे।
बेशक उन्होंने सैकड़ों अनाथों की जिंदगी बदल दी,हजारों को पढऩे में मदद की।
बेशक उन्होंने कइयों को हताशा से उबार कर पुर्नजीवन दिया।
बेशक उन्होंने अपनी हाई प्रोफाइल लाइफ स्टाइल को कभी छिपाया नहीं।
बेशक वे कम से कम महाराष्ट्र में तो इंदौर की पहचान बन गए थे।
लेकिन उन्होंने कल जो किया,वो हद दर्जे की कायरता और पलायनवाद था। उन्होंने खुद को ही खत्म करने का महापाप नहीं किया,बल्कि विश्वास पर ही आघात कर दिया। यहां भय्यू महाराज पर चर्चा हो रही है। हमारे सुभाष रानडे सर पक्के इहलोकवादी हैं। वे ईश्वर की अवधारणा में भरोसा नहीं करते। उन्होंने मी मराठी साप्ताहिक में बुआ बाजी यानी बाबागिरी के खिलाफ एक बेहद शास्त्रीय लेख लिखा था। उस लेख का एक एक शब्द अत्यंत तर्कपूर्ण और मर्मभेदी था। मेरा पास वह अंक था,लेकिन मकान शिफ्टिंग में दुर्भाग्य से वह गुम गया। सुभाष सर हमेशा साने गुरूजी का उदाहरण देते थे। साने गुरूजी भी विचारों से प्रगतिशील थे। उनकी साधना पत्रिका में बड़े बड़े समाजवादियों के लेख छपते थे। सुभाषजी के अनुसार साने गुरूजी कहते थे कि एक गरीब महिला विठ्ठल की मूर्ति के सामने खड़ी होकर अपना सारा दर्द बयान करती है,ऐसे जैसे मानों कोई अपनी मां के सामने दर्द बयान करता हो। इसलिए भगवान विठ्ठल को माऊली कहा जाता है। साने गुरूजी के अनुसार तर्क वितर्क से है यह भक्ति। इस भक्ति को धर्मिक से अधिक सामाजिक नजरिए से देखा जाना चाहिए।विठ्ठल माऊली को अपने दर्द बयां कर एक गरीब मन से हलका हो जाता है और दुगने उत्साह से जीवन के संघर्ष में खुद को झोंक देता है। भय्यू महाराज को भी मैं धार्मिक से अधिक सामाजिक सरोकार वाला व्यक्तित्व मानता था। वे खुद भी अपना ट्रस्ट एक एनजीओ की तरह चलाना चाहते थे। ऐसे में उनका कायरता भरा कदम बताता है कि यदि हमे आस्तिक रहना ही है,तो कम से कम सीधे ईश्वर से संबंध रखें। बीचवाल की आवश्यकता क्या है। उनके इस कदम से मुझे मजबूरन कहना पड़ रहा है कि जिन्हें हमे भय्यू महाराज समझते थे,वे महज उदयसिंह देशमुख ही निकले,जो औसत मनुष्य से भी कमजोर थे। हालांकि गलती हमारी है कि इस सच को हमे पहले ही समझ जाना था। बहरहाल,उन्होंने ऐसा उदाहरण पेश किया कि उन्हें महाराज कहने की इच्छा नहीं होती।हलांकि हमारी परंपरा में दिवंगत के प्रति श्रध्दा व्यक्त की जाती है, इसलिए उन्हें श्रध्दांजलि भी अर्पित कर रहा हूं।244896-bhayyiyuji-maharaj-152

उनकी साफगोई प्रभावित करती थी। 2008 में महू के महाराष्ट्र समाज के गणेशोत्सव को 100 साल पूरे हुए थे। इस कारण शताब्दी समारोह मनाया जा रहा था। शुभारंभ के लिए भय्यू महाराज को बुलाया गया था। कार्याध्यक्ष सेवानिवृत लेफ्टिनेंट जनरल माधव गोविंद दातार और मुख्य सचिव शरद जोशी ने भय्यू महाराज की अगवानी किशनगंज से करने के लिए मुझे भेजा। वे आए तो उन्होंने अपनी कार में मुझे बैठा लिया। मैने बगल में बैठने से इनकार किया तो उन्होंने जोर देकर कहा कि यहीं बैठे। बैठने के बाद उनका पहला वाक्य था कि मैं संत या संन्यासी नहीं गृहस्थ हूं। उन्होंने कहा कि मुझ पर गुरू की कृपा है और जब मैं आश्रम की गादी पर बैठता हूं तब कुछ और अनुभूति होती है। गादी पर बैठने के बाद मैं जो कुछ कहता हूं। कई बार वह सही निकल जाता है,इसलिए लोगों को लगता है कि मैं चमत्कार करता हूं। जबकि ऐसा नहीं है। उनकी साफगोई और सहजता प्रभावित करने वाली थी। उन्होंने अपना संबोधन भी सामाजिक सरोकारों तक सीमित रखा था। तब लगा कि उनमें कुछ विशिष्टता तो है। अपने आकर्षक व्यक्ति के कारण भी वे प्रत्येक मिलने वाले से रिश्ता बना लेते थे। इसलिए उनका जाना बेहद धक्का दायक था

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