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ज़िन्दगी के रंग- कुछ बकवास करें,राजेश बादल की विशेष टिप्पणी

Posted on: 08 May 2018 05:47 by Ravindra Singh Rana
ज़िन्दगी के रंग- कुछ बकवास करें,राजेश बादल की विशेष टिप्पणी

ज़िन्दगी के रंग भी कितने अजीब हैं। उम्र के अलग अलग पड़ाव पर इंसान के अंदर और बाहर के रूप भी बदलता जाते है। कुछ समझ में आते हैं कुछ समझ से परे । मसलन बचपन, जवानी और बुढ़ापे में शरीर और चेहरे को देखकर पता लग जाता है । बचपन का चेहरा और त्वचा अंकुरित होते पौधे की तरह तो जवानी का चेहरा और त्वचा खिली हुई ताज़ा धूप की तरह । और बुढ़ापे का तो क्या कहूँ । लटकी हुई खाल और झुर्रियों भरा चेहरा सब कुछ बयान कर देता है । जगजीतसिंह ने सुदर्शन फ़ाक़िर की एक लोकप्रिय नज़्म गाई है –

वो चेहरे की झुर्रियों पे सदियों का फेरा
यानी इसमें झुर्रियों के साथ एक सदी का अनुभव बड़े गर्व से गाया गया है । दिल पर हाथ रखकर कहिए कि आप वाकई ये सम्मान पाना चाहते हैं कि चेहरे पर झुर्रियां घर बना लें । शायद नहीं । कड़वी हक़ीक़त सामने होती है। और दिल दिमाग उसे नकारता रहता है।

दूसरी बात ये है कि कभी ऐसे हालात भी बनते हैं कि आदमी की परिस्थितियां उसका रूप बदल देतीं हैं ।जब हम अच्छे हाल में होते हैं, अच्छा पैसा कमा रहे होते है ,मर्ज़ी से खा पी रहे होते हैं तो चेहरा चमकता है । नूर झलकता है । लेकिन जब इसके उलट बुरे हाल में होते हैं सितारे गर्दिश में होते हैं तो कुछ महीनों में ही हाल बिगड़ जाता है । यार लोग कहते हैं आप तो अचानक बूढ़े लगने लगे ।

कई बार ज़िम्मेदारियाँ भी इंसान की चमक पर असर डालती हैं । माता पिता के होने पर दिल अपने को बेटा समझता है लेकिन जब पेरेंट्स ज़िन्दगी से चले जाते हैं तो अचानक आप बुजुर्ग हो जाते हैं । जिन्हें पता नहीं होता तो मिलने पर कहते हैं -अरे बीमार थे क्या ? हालात पर तो हमारा बस नहीं मगर क्या कुछ ऐसा हो सकता है कि ज़िन्दगी के झटकों से हमारे लुक पर असर न पड़े ।

हमारा चेहरा उम्र की गवाही न दे ।बात दिल से हो रही है तो सारी बात दिल की ज़ुबान में होनी चाहिए और दिल ये कहता है कि कोई भी बूढा नहीं होना चाहता । हालांकि ये भी सब जानते हैं कि उसे रोकना नामुमकिन है पर कितने दिन बुढ़ापे को हम अपनी चारपाई से बाँध कर रख सकते हैं – ये देखने वाली बात है। शेरोशायरी में आजकल बुढ़ापे की हकीकत कोई बयान नहीं करता । हाँ क़रीब क़रीब दो सौ बरस पहले जनाब नज़ीर अकबराबादी ने बुढ़ापे की पोल ज़रूर खोली थी । कुछ लाइनें पढ़िए
बुढापा
——-
क्या क़हर है यारो,जिसे आ जाए बुढ़ापा/और ऐशे जवानी के तईं खाए बुढ़ापा /
इशरत को मिला ख़ाक़ में,ग़म लाए बुढ़ापा/हर काम को हर बात को तरसाए बुढ़ापा /
सब चीज़ को होता है ,बुरा हाय बुढ़ापा /आशिक़ को तो अल्लाह न दिखलाए बुढ़ापा /
थे हम भी जवानी में बहुत इश्क़ के पूरे /वो कौन से गुलरू हैं ,जो हमने नहीं घूरे /
अब आके बुढ़ापे ने किए ऐसे अधूरे / पर झड़ गए ,दुम उड़ गई ,फिरते हैं लँडूरे /
सब चीज़ को होता है ,बुरा हाय बुढ़ापा/आशिक़ को तो अल्लाह न दिखलाए बुढ़ापा /
बूढ़ों में अगर जावें , तो लगता नहीं वां दिल / वां क्यों कर लगे ? दिल तो है मह्बूबों का घायल /
मह्बूबों में गर जावें तो , सब छेड़ें हैं मिल मिल / क्या सख्त मुसीबत है पडी आन के मुश्किल /
सब चीज़ को होता है ,बुरा हाय बुढ़ापा /आशिक़ को तो अल्लाह न दिखलाए बुढ़ापा /
ग़र नाच में जावें ,तो ये हसरत है सताती /जो नाचती है क़ाफ़िर , वो नहीं ध्यान में लाती /
औरों की तरफ जा जा के देखो आँखें है लड़ाती / पर हमको तो क़ाफ़िर / वो अंगूठा है दिखाती /
सब चीज़ को होता है ,बुरा हाय बुढ़ापा / आशिक़ को तो अल्लाह न दिखलाए बुढ़ापा /
थे जैसे जवानी में किए धूम धड़क्के / वैसे ही बुढ़ापे में छूटे आन के छक्के /
सब उड़ गए क़ाफ़िर , वो नज़ारे ,वो झमक्के / अब ऐश जवानों को हैं और बूढ़ों को हैं धक्के /
सब चीज़ को होता है ,बुरा हाय बुढ़ापा / आशिक़ को तो अल्लाह न दिखलाए बुढ़ापा /
ये होंठ जो अब पोपले यारो हैं हमारे/इन होंठों ने बोसों के बड़े रंग हैं मारे /
होते थे जवानी में तो,परियों के नज़ारे/और अब तो चुड़ैल आन के इक लात न मारे /
सब चीज़ को होता है,बुरा हाय बुढ़ापा/आशिक़ को तो अल्लाह न दिखलाए बुढ़ापा /
ज़नाब नज़ीरअकबराबादी ने तो जवानी के अहसास पर भी क़लम चलाई । लिखते हैं –
जवानी
——-
क्या ऐश की रखती है सब आवाज़ जवानी /करती है बहारों के तईं ,दंग जवानी /
हर आन पिलाती है मय , और भंग जवानी / करती है कहीं सुबहा , कहीं जंग जवानी /
इस ढब के मज़े रखती है ,और ढंग जवानी /आशिक़ को दिखाती है अज़ब रंग जवानी /
लड़ती है कहीं आँख ,कहीं दृष्टि ,कहीं सैन / झूठा है कहीं प्यार ,किसी से लगे हैं नैन /
वादा कहीं, इक़रार कहीं, सैन कहीं नैन / नै जी को फ़राग़त है ,नै आँखों के तई चैन /
इस ढब के मज़े रखती है , और ढंग जवानी /आशिक़ को दिखाती है अज़ब रंग जवानी /
जाते हैं तवाइफ़ में ,तो वां होती है ये चाव / कहती है कोई -इनके लिए पान बना लाव /
कोई कहती है -याँ बैठो,कोई कहती है -याँ आव/नाचे है कोई शोख़, बताती है कोई भाव /
इस ढब के मज़े रखती है ,और ढंग जवानी/आशिक़ को दिखाती है अज़ब रंग जवानी /
हँस हँस के कोई हुस्न की ,छलबल है दिखाती /मिस्सी कोई सुरमा कोई काजल है दिखाती /
चितवन की लगावट ,कोई चंचल है दिखाती/कुरती कोई ,अंगिया कोई काजल है दिखाती /
इस ढब के मज़े रखती है,और ढंग जवानी/आशिक़ को दिखाती है अज़ब रंग जवानी /
कहती है कोई रात मेरे पास न आए / कहती है कोई,हमको भी ख़ातिर में न लाए /
कहती है कोई किसने तुम्हें पान खिलाए /कहती है कोई घर को जो जाए,हमें पाए /
इस ढब के मज़े रखती है ,और ढंग जवानी/आशिक़ को दिखाती है अज़ब रंग जवानी /
महान कवि रामधारी सिंह दिनकर ने कहा है-देह प्रेम की जन्मभूमि है । ऐसे में हों अगर कामनाएं प्रबल और इन्द्रियाँ शिथिल तो यक़ीनन गंभीरता से सोचना होगा !

राजेश बादल

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