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चुनाव ड्यूटी से भागने वालो के लिए कलेक्टर ने लिखी कहानी

Posted on: 04 Nov 2018 22:33 by Deepak Meena
चुनाव ड्यूटी से भागने वालो के लिए कलेक्टर ने लिखी कहानी

मुझे अपने जिले में 7500 से ज्यादा कर्मचारियों को लेकर निर्वाचन कराना है। परंतु सच्चे-झूठे बहाने बनाकर निर्वाचन ड्यूटी न करने वालों के आवेदनों की बाढ़ सी आई हुई है। ऐसे ही लोगों को स‍मर्पित है मेरी यह पोस्ट-ब्रह्माण्ड का उद्भव वैज्ञानिकों के लिए पहेली है। बिग-बैंग के पहले क्या हुआ होगा इस पर विज्ञान मौन है परंतु उपनिषदों के अनुसार ब्रह्म को एक से अनेक होने की इच्छा हुई – एकोsहं वहुस्याम: – और इसलिए सृष्टि की रचना हुई। इस प्रकार ब्रह्माण्ड में इच्छा ही है जो क्रिया में बदलती है। इसे ही ओम शांति ओम फिल्म में शाहरूख खान ने डायलॉग के रूप में कहा है – ‘’अगर किसी चीज़ को दिल से चाहो तो पूरी कायनात उसे तुमसे मिलाने की कोशिश में लग जाती है।‘’ तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में कहा है- जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू।। यहॉं भी वही सिद्धांत है कि चाह जितनी तीव्र होगी उसके पूरे होने की संभावना भी उतनी ही अधिक होगी।

सामान्य जीवन में भी हम देखते हैं कि एक ही दवा एक ही प्रकार के रोगियों पर अलग-अलग असर करती है। वास्तव में भीतर से ठीक होने की जितनी तीव्र इच्छा होती है दवा भी उतनी ही तेजी से असर करती है। जब भीतर से जीने की इच्छा समाप्त हो जाती है तो फिर कोई दवा कार्य नहीं कर सकती । जिसे कार्य करने की इच्छा होती है उसे कार्य मिलता है, चुनौतियॉं मिलतीं हैं, उसका व्यक्तित्व निखरता है और उसके समग्र जीवन पर उसका प्रभाव पड़ता है। जो कार्य नहीं करना चाहता है प्रकृति उसके शरीर में भी ऐसे परिवर्तन कर देती है कि उसे कार्य न करना पड़े। वह आलसी हो जाएगा, बीमार पड़ जाएगा, उसकी ग्रहण करने की क्षमता कुंद हो जाएगी आदि-आदि। एक बात और याद रखें आप जो कुछ भी हैं वह समग्रता में हैं, ऐसा नहीं हो सकता कि घर के कार्य में आप बहुत उत्साही व योग्य हों और कार्यालय के कार्य में सुस्त हों। या निजी जीवन में अच्छी योजना बनाकर कार्य करते हों और कार्यालय में अव्यवस्थित रहें। यदि आप कार्यालय में अकर्मण्य, लापरवाह और सुस्त हैं तो इसका प्रभाव आपके घर परिवार पर भी पड़ेगा । ऐसी स्थिति में पारिवरिक निर्णय लेनें, बच्चों की पढ़ाई, विवाह आदि की योजना बनाने, स्वयं की सेवानिवृत्ति के बाद की योजना बनाने में भी आप सक्षम नहीं हो पाऍंगे। आप अपने दुर्गुणों से अपने कार्यालय को जितना बिगाड़ेंगे आपका निजी जीवन भी उतना ही बिगड़ता जाएगा।

अब मैं मुद्दे की बात पर आता हूँ जिस कारण मुझे यह लेख लिखना पड़ रहा है। आजकल मेरे पास निर्वाचन ड्यूटी से छूट पाने के लिए सैकड़ों आवेदन आ रहे हैं। उनमें से कुछ प्रमाणिक कारण वालों को छोड़ दें (जो कुल का 10 प्रतिशत से अधिक नहीं हैं) तो शेष ऐसे लोगों के आवेदन हैं जो एक दिन भी जिम्मेदारी से कार्य नहीं करना चाहते। मैं अपने प्रशासनिक दायित्वों को पूरा करते हुए इन पर उचित निर्णय करुँगा ही, परंतु इन सब को मेरी सलाह है कि वे आत्मावलोकन करें कि क्या वे अपने जीवन में कोई चुनौती स्वीकार नहीं करना चाहते, क्या कुछ भी योजनाबद्ध ढ़ंग से नहीं करना चाहते, क्या थोड़ी भी मेहनत नहीं करना चाहते, क्या वे समाज के लिए कुछ की कष्ट नहीं उठाना चाहते ? यदि उनका उत्तर हॉं है तो वे अब अपने निजी जीवन पर विचार कर लें। वे पाऍंगे कि उनका परिवार भी उनके इन्हीं दुर्गुणों के कारण अपेक्षित प्रगति नहीं कर पा रहा है। एक बात और, आप काम नहीं करना चाहते यह आपकी इच्छा है और इसलिए झूठी बीमारी का बहाना बना रहे हैं। आपकी काम न करने, चुनौतियॉं न लेने की इच्छा बहुत प्रबल है इसलिए प्रकृति आपकी मदद करेगी । भगवान न करे, आप उसी बीमारी से ग्रस्त हो जाऍं जिसका बहाना बनाया जा रहा है ताकि आपको कार्य न करना पड़े । आखिर पूरी सृष्टि आपकी इच्छा की प्रबलता से ही संचालित हो रही है और आपको चयन की पूरी स्वतंत्रता है।

ओमप्रकाश श्रीवास्तव कलेक्टर मंदसौर

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