चॉपस्टिक्स -कम बजट फिल्म सन्देश माकूल

0
40

कलाकार: अभय देओल,मिथिला पलकर, विजय राज,अचिंत कौर, अभिषेक भालेराव
निर्देशक: सचिन यर्दी
संगीत: प्रदीप मुखोपाध्याय
समय: 100 मिनट

बड़ी मुश्किल होती है जब कोई फिल्म कम बजट की होती है और फिल्म धीमे से जहन से होती हुई दिल तक पहुच जाती है। चॉपस्टिक्स के देखते वक्त यही हुआ। एक और असमंजस की फिल्म को समानांतर,कला या यथार्तवादी फिल्म की श्रेणी में रखु या व्यवसायिक।

बेहद छोटी कहानी को बड़ी सादगी से गूँधा गया-

एक लड़की निरमा (मिथिला) मध्यमवर्गीय परिवार से होती है जिसकी नौकरी मुम्बई की एक बड़ी एड एजेंसी में होती है, जहाँ वह चीनी भाषा अनुवादक होती हैं, वह अपनी बचत से एक कार खरीदती है वह कार उसी शाम को कारचोर पार्क करने के बहाने से चुरा लेते है, पहला दिन कार चोरी, मध्यमवर्गीय परिवार के लिए कार एक सपना होता है, जो सपना कि चोरी हो जाता है । अब तलाश सपना वापस लाने की।

निरमा पुलिस स्टेशन जाती है लेकिन भारतीय पुलिस अपने कर्म परायणता का बोध उसे करा देते है, वही उसे एक चोर मिलता है जो उसे आश्वस्त कर देता है कि एक महाचोर है जो कार खोज देगा, उस महाचोर का नम्बर दे देता है, वह महाचोर 18 साल में एक बार भी पुलिस द्वारा पकड़ा नही जा सका उसका नाम है आर्टिस्ट (अभय देओल)।

शाम को निरमा के माता-पिता का फोन आता है वह कार को देखने आने वाले हैं सप्ताहंत पर, अब निरमा मजबूर होकर आर्टिस्ट को फोन लगा कर मिलने जाती है, आर्टिस्ट की अपनी खूबियां है वह खानसामा (शेफ) बनना चाहता है साथ ही वह हर तरह के ताले तोड़ने में माहिर भी है, साथ ही उसकी एक गैंग है जो भिखारियों से चिल्लर (सिक्के) जमा करता है, जिससे उसका अपना काली दुनिया मे नेटवर्क तंत्र होता है जिसकी मदद से आर्टिस्ट कार मालिक निरमा को लेकर चोरी की कार खरीदने वाले के अड्डे पर पहुचता है। वहा एक कार के पुर्जे-पुर्जे अलग अलग मिलते है जिसमे से एक नट को उठा कर निरमा देखती है तो ख्वाब के बिखरने पर भावनात्मक होकर रो देती है।
लेकिन अगले दिन पता चलता है कि कार किसी दूसरे फय्याज भाई (विजय राज) को बेची गई है, फय्याज भाई डॉन तो है ही साथ ही बकरों को लड़ाने का धंधा भी करता है जिसके लिए उसके पास एक बड़ा बाहुबली नाम का बकरा भी है जिसे वह जी जान से रखता है। फय्याज भाई का बाहुबली निरमा की चोरी की गई कार में बैठ जाता है तो फय्याज भाई उस कार को न तोड़ते है न बेचते है, परन्तु आर्टिस्ट और पुलिस के लिए फय्याज भाई से कार निकलना नामुमकिन है।

फय्याज भाई के वहां बकरों की कुश्ती से पहले एनिमल प्लेनेट वाले साक्षात्कार के लिए पहुचते है, जिससे खुश होकर फय्याज भाई बकरे और चैनल वालो का फोटो अपनी बिरादरी के उर्दू अखबार में छपवा देते है, जिसमे बाहुबली बकरा चैनल वालो के साथ खड़ा है पीछे निरमा की कार खड़ी है।

निरमा यह अखबार सिटी बस में एक पाठक के हाथ मे देख कर अपनी कार पहचान लेती है आर्टिस्ट की मदद से वह चैनल शूट वाले दिन बाहुबली का मेकअप करने के बहाने से पंहुच कर बाहुबली को अगवा कर के दूसरे बकरा छोड़ देते है।

फय्याज भाई अपना आपा खो देते है। लेकिन कुछ समय बाद निरमा खुद बाहुबली को लेकर फय्याज भाई के पास पहुच जाती है। फय्याज भाई को एहसास होता है अपनी प्रिय चीज के खोने का, फय्याज भाई नादिम (आत्मग्लानि) होकर कार वापस दे देते है साथ ही बकरों की कुश्ती भी बन्द करने का ऐलान कर देते है।

दोस्तो मैं हमेशा लिखता हूँ कि फिल्म छोटी की जा सकती थी, लेकिन पहली बार लिख रहा हूँ फिल्म की समय सीमा बड़ाई जा सकती थी क्योकि पूरी फिल्म में आपका ध्यान कभी घड़ी पर जाता है नही यह निर्देशक का कमाल था।

फिल्म का बजट बमुश्किल 4 करोड़ होगा (जो कि किसी सीरियल के एक एपिसोड का बजट होता है) लेकिन फिल्म आपको बांधने में पूरी तरह कामयाब होती है।

अदाकारी पर बात करे तो अभय देओल नैसर्गिक अभिनय पाठशाला के विद्यार्थी है, यानी बलराज साहनी साहब की तरह या फरहान अख्तर की तरह, अभय ने पूरे किरदार को इतनी संजीदगी से गड़ा हैकि वही आर्टिस्ट किरदार लगने लगते है मिथिला पलकर का चयन उनकी मौलिक भावभंगिमाओ और हावभाव को देख किया गया लगता है।

विजयराज राष्ट्रीय नाट्य विधालय और पृथ्वी थियेटर की शान रहे उनकी उपस्तिथि ही दर्शक को बांध देती है। अचिंत कौर को जो किरदार मिला उसे बीसियों बार निभा चुकी है। निर्देशक सचिन यर्दी लेखक से निर्देशक बने है क्या सुपर कूल है हम, सी कम्पनी, का निर्देशन कर चुके ही यह तीसरी फिल्म थी उनकी, जिसमे वह दर्शक को बांधने में सफल हुए।

निर्देशक का एक कलात्मक पहलू होता है जिसमे वह निपुण लगे। कार पर देश मे टार्जन द वंडर कार, मेरे डेड की मारुति भी आ चुकी है लेकिन यह फिल्म कलात्मक फिल्म मानी जाएगी।

अब देश मे मल्टीप्लेक्स सिनेमा घर कर गया है जहां ऐसी छोटे बजट फिल्मो के प्रदर्शन पर आसानी होती है फिर फिल्म को सेटेलाईट अधिकार बेच कर मुनाफा निकाल लिया जाता है। फिल्म को न प्रचार प्रसार किया गया नही कोई बड़ी स्टारकास्ट परन्तु फिल्म बड़ी सहजता से सन्देश देने में सफल रही है। रेटिंग की बात बेईमानी होगी ।

यदि आप एक स्वस्थ फिल्म देखने के शौकीन है तो फिल्म आपका पूरा मनोरंजन करेगी। न रोमांस न खूब सारे गाने फिर भी फिल्म बांधे रखती है।

फिल्म समीक्षक
इदरीस खत्री

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here