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चित्तौड़गढ़ किला है वीरता की मिसाल, जानिए क्या है इसका इतिहास

Posted on: 01 Feb 2019 22:32 by Amit Shukla
चित्तौड़गढ़ किला है वीरता की मिसाल, जानिए क्या है इसका इतिहास

राजस्थान के बारे में आपने तो सुना ही होगा यह भारत का एक बहुत ही खूबसूरत राज्य है और राजस्थान अपने किलो के मामले में काफी पसिद्ध है वैसे तो यह अनेको प्रकार के किले और दुर्ग है जो बहुत ही भव्य और सुन्दर है जिनकी कहानियाँ का इतिहास गवह है. लेकिन हम आज बात करेंगे राजस्थान के चित्तौडगढ़ किलो की, यह किला चित्तौडगढ़ में चारों ओर फैला है इनमें से एक पद्मावती का किला जो अपना एक अलग ही इतिहास बयां करता है. पद्मावती का किला 700 एकड़ में फैला है इसकी ऊंचाई जमीन से 180 मीटर से लेकर पहाड़ तक है ये दुर्ग पहाड़ो पर बना हुआ है. ऐसा कहा जाता है कि भीम ने इस किले का निर्माण सन् 1303 में किया था. इस किले में ही बना है जौहर कुंड। बताया जाता है कि रानी पद्मावती ने इसी कुण्ड में जौहर किया था।

जाने रानी पद्मावती का इतिहास

पद्मिनी चित्तौड़ के राजा रत्नसिंह (रतनसेन) [1302-1303 ई०] की रानी थी। भारतीय लेखक मलिक मोहम्मद जायसी ने अपने काव्य पद्मावत में 1303 ईस्वी में चित्तौडगढ पर हुए आक्रमण और ऐतिहासिक विजय का वर्णन किया है। इसमें उन्होंने रानी पदमिनी का नाम पदमावती रखा और उनकी सुन्दरता का वर्णन किया है. इस काव्य में जायसी ने बताया कि अल्लाउद्दीन खिलजी ने पदमावती की सुंदरता के बारे में सुना तो अपने काबू में नहीं रहा और उसने पद्मावती को देखने कि इछा जताई और चित्तौड़ को चारों ओर से घेर लिया और रावल रतन सिंह के पास पदमावती से मिलने का संदेश भिजवाया साथ ही यह भरोसा दिया कि पदमावती से मिलकर वह चित्तौड़ को छोड़कर चला जाएगा और आक्रमण नहीं करेंगे।
खिल्जी के पैगाम की ये शर्त राजा रावल रतन सिंह को मंजूर नहीं थी और उन्होंने इस बारे में पदमावती से बातचीत की और रानी ने युद्ध टालने के लिए एक उपाय निकाला और समझदारी से फैसला लिया कि,खिलजी हकीकत में उनको नहीं बल्कि वो कमल के तालाब में रानी पद्मावती कि परछाई देखेगा. रानी की सुंदरता पर मोहित खिल्जी ने रानी को पानी में देखा और उन्हें पाने के लिए महल पर आक्रमण कर दिया.युद्ध में रावल रतन सिंह और उनके सैनिक मारे गए,और खिल्जी अपनी सेना लेकर चित्तौडगढ़ के दुर्ग पर पहुंचा लेकिन उसके पहुचने से पहले ही रानी और उनकी हजारों दसियों ने जौहर कर लिया था। कहते है उस समय इस कुण्ड में 24 घंटे आग भभकती रहती थी और आज भी इसमें से आती है रानी की पायल कि आवाज़।

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