सदमे में कांग्रेस, नाथ से छिंदवाड़ा मॉडल की दरकार… | Chhindwara Lok Sabha Seat: Need of ‘Chhindwara Model’ to Kamal Nath Government…

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न काहू से बैर/राघवेंद्र सिंह

सूबे में लोकसभा की 29 में से 28 सीटें हारने के बाद प्रदेश कांग्रेस और कमलनाथ सरकार सदमे में है। जब 6 महीने पहले प्रदेश में नाथ के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार बनी थी तब राहुल गांधी ने कहा था कि 10 दिन में किसानों का कर्जा माफ, नहीं तो सीएम साफ। इसके साथ उन्होंने यह भी कहा था कि प्रदेश सरकार के मंत्रियों के दरवाजे कार्यकर्ताओं के लिए खुले रहेंगे।

कांग्रेस की पराजय में मोदी फैक्टर कितना भी हो, इसमें किसानों की कर्जमाफी और कांग्रेस कार्यकर्ताओं की सरकार में अनदेखी के साथ तबादला उद्योग में सरकार की बदनामी भी बड़ी वजह बनकर उभरे हैं। ऐसे में कमलनाथ ने छिंदवाड़ा मॉडल का जो ढोल पीटा था अगर सरकार और प्रशासन में वह नजर नहीं आया तो आने वाले दिन आग के दरिया में डूबकर गुजरने जैसा हो तो किसी को हैरत नहीं होगी। 

देशभर में कांग्रेस की करारी शिकस्त के बाद जिन राज्यों में उनके मुख्यमंत्री हैं, वहां नेतृत्व पर राहुल गांधी की तरह पद छोड़ने का प्रस्ताव देने का दबाव है। राहुल बाबा को तो लोग शायद पद न छोड़ने दें, लेकिन राज्यों में ऐसे बहुत से होंगे जो हार के लिए मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष को पद से रुख्सत करने के लिए जोर दें। विधायकों से लेकर मंत्रियों और पार्टी के जिलाध्यक्षों से लेकर प्रदेश पदाधिकारियों तक मुख्यमंत्री से मुलाकात करना आसान न हो, तो समझ लेना चाहिए सरकार को सच्ची बातें पता करने में दिक्कत जाएगी।

इतना ही नहीं इसके बाद अधिकारियों से भी मुख्यमंत्री का संवाद बहुत ही औपचारिक हो तो समझ लीजिए कि मामला करेला और नीमचढ़ा जैसा है। यह बात इसलिए भी अब और मुखर होगी क्योंकि जो कद और ताकत लोकसभा चुनाव के पहले मुख्यमंत्री की थी उसमें नतीजों के बाद गिरावट दर्ज की गई है। कमलनाथ की प्रतिष्ठा का पारा पार्टी और सरकार दोनों में गिरा है। इस हकीकत को नहीं जाना गया तो जल्द ही कांग्रेस में सरकार और पार्टी विरोधी सुर तीखे होने के साथ कर्कश भी होते दिखाए देंगे। एक उदाहरण से इसे समझा जा सकता है।

लोकसभा चुनाव से पहले एक वरिष्ठ नेता पार्टी कार्यालय पहुंचते हैं। उनसे लोग कहते हैं कि सरकार को बने महीने गुजर गए आप अब आ रहे हैं। जवाब हिला देने वाला था। वह कहते हैं कि मैं तो इतने महीने से सरकार को ढूंढने में लगा था। नहीं मिली तो यहां आया। इसके बाद चुनाव के नतीजे बताते हैं कि मोदी की सुनामी तो ठीक, सरकार के अपयश ने भी नेताओं को लाखों वोटों से हराने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। इस बात को जितने जल्दी समझा जाए नुकसान उतना कम होगा। 

किसान कर्जमाफी के मामले में भाजपा ने िवधानसभा चुनाव के चलते कहा था कि कांग्रेस 2 लाख तक का कर्जा माफ नहीं कर पाएगी। मगर राहुल गांधी का यह नारा असर कर गया था कि 10 दिन में कर्जा माफ नहीं तो सीएम साफ। इसके चलते ग्रामीण इलाकों में भाजपा समर्थक किसानों ने भी कांग्रेस को वोट दिए थे। लेकिन लोकसभा चुनाव आते-आते भाजपा ने फिर कर्जमाफी को मुद्दा बनाया और कहा कि कांग्रेस ने किसानों से ठगी की है। इस पर कमलनाथ की सफाई असरदार साबित नहीं हुई। यही वजह है कि छिंदवाड़ा लोकसभा सीट पर नाथ के चिरंजीव नकुलनाथ एक अनाम से प्रत्याशी नत्थन शाह से हारते-हारते बच गए।

कह सकते हैं कि बाल-बाल बचे नकुल लगभग 37 हजार से बमुश्किल इज्जत बचा पाए। इसके साथ खुद कमलनाथ छिंदवाड़ा क्षेत्र से ही बतौर मुख्यमंत्री विधानसभा का उपचुनाव लड़े और विवेक साहू को करीब 24 हजार वोटों से हराया। हालांकि कमलनाथ ने प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष पद से त्याग पत्र की पेशकश की है। यह तो आज नहीं तो कल उन्हें वैसे भी छोड़ना है। वह दो पदों पर लंबे समय तक पदस्थ रह भी नहीं सकते। विधानसभा का सत्र शुरू होने के पहले कांग्रेस की सियासत में कई उतार-चढ़ाव आने हैं। मसलन दिग्विजय सिंह को भोपाल सीट से फंसा कर कमलनाथ ने एक तरह से अपना कांटा निकाल दिया है। वहीं गुना से ज्योतिरादित्य सिंधिया के हारने से सिंधिया समर्थक नाराज हैं।

इधर प्रशासन में मंत्रियों की पकड़ नहीं होेने से जल्द ही असंतोष फूटने के आसार हैं। विकास कार्यों के लगभग ठप होने के कारण जनता में मामा की सरकार को याद करने का दौर चल पड़ा है। किसान कर्ज के मामले में ठगा सा महसूस कर रहा है क्योंकि खरीफ की फसल के लिए उसे बैंकों से नोड्यूज और सहकारी समितियों से खाद-बीज के लिए कर्जा मिलने में दिक्कत आ रही है। अगले महीने से स्कूल खुलने वाले हैं और मास्टरों की कमी पूरी होने की कोई संभावना नहीं है। इन सबके साथ कानून व्यवस्था को लेकर भाजपा आएदिन जनता के बीच इसे मुद्दा बना रही है। ऐसे में कांग्रेस के लोगों में ही इस बात की चर्चा है कि अब कमलनाथ का छिंदवाड़ा मॉडल कसौटी पर है उसे लागू करना और प्रशासन को गुड गवर्नेंस में बदलना सबसे बड़ी चुनौतियां हैं। आर्थिक रूप से कंगाल प्रदेश के लिए यह सब आग के दरिए में डूबने जैसा है।

ऐसे चर्चा में आया था छिंदवाड़ा मॉडल

विधानसभा चुनाव से पहले छिंदवाड़ा का विकास मॉडल तब चर्चा में आया, जब नामचीन लेखक भास्करराव रोकड़े ने अपनी पुस्तक में कमलनाथ द्वारा छिंदवाड़ा में कराए गए दो नेशनल हाइवे मुलताई-छिंदवाड़ा-सिवनी व नरसिंहपुर-छिंदवाड़ा-नागपुर के निर्माण का उल्लेख किया। वहीं छिंदवाड़ा-नागपुर व छिंदवाड़ा-मंडला फोर्ट ब्राडगेज, मॉडल रेलवे स्टेशन, छिंदवाड़ा से सीधे दिल्ली तक ट्रेन, मेडिकल कॉलेज तथा स्किल्स डेवलपमेंट सेंटर समेत अन्य काम को देश-प्रदेश में सामने लाया। इस पर पूरे चुनाव में बहस छिड़ी रही। यहां तक कि शिवराज सिंह चौहान के विधानसभा क्षेत्र बुधनी और छिंदवाड़ा की सडक़ों की तुलना होने लगी। कमलनाथ ने यह भी कह दिया कि वे चुनाव जीतने पर इस मॉडल को पूरे प्रदेश में लागू करेंगे।

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