ओबीसी के बंटवारे पर क्यों ठहर गई केंद्र सरकार? नीरज राठौर की कलम से

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ओबीसी बंटवारे के लिए बेहद धूमधाम से आयोग बना। आयोग के एक साल पूरे हो गए. लेकिन अब इसकी कोई चर्चा भी नहीं कर रहा है।एक साल पहले यानी 2017 को गांधी जयंती के दिन सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया था, जिसने खूब सुर्खियां बटोरी थीं. सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत एक आयोग का गठन किया और उसे तीन काम सौंपे।

एक, ओबीसी के अंदर विभिन्न जातियों और समुदायों को आरक्षण का लाभ कितने असमान तरीके से मिला, इसकी जांच करना. दो, ओबीसी के बंटवारे के लिए तरीका, आधार और मानदंड तय करना, और तीन, ओबीसी को उपवर्गों में बांटने के लिए उनकी पहचान करना. इस आयोग को अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए 12 हफ्ते का समय दिया गया. इस आयोग की घोषणा करते समय यह दावा किया गया कि अति पिछड़ी जातियों को न्याय दिलाने के लिए एनडीए सरकार प्रतिबद्ध है. आयोग की अध्यक्षता रिटायर्ड जस्टिस जी. रोहिणी को सौंपी गई।

गौरतलब है कि अनुच्छेद 340 के तहत अब तक सिर्फ तीन आयोग बने हैं. दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग, जिसे मंडल कमीशन कहते हैं, की सिफारिश के आधार पर केंद्र सरकार की नौकरियों में ओबीसी को 27 फीसदी का आरक्षण दिया जाता है. इस अनुच्छेद के तहत बना तीसरा आयोग रोहिणी कमीशन है. इससे रोहिणी कमीशन के महत्व का अंदाजा लगाया जा सकता है. साथ ही इसके यह भी पता चलता है कि केंद्र सरकार ओबीसी के बंटवारे को कितना महत्वपूर्ण मानती है।

देश में कई राज्य पिछड़ी जातियों को एक से ज्यादा श्रेणियों में बांटकर आरक्षण देते हैं. ऐसे राज्यों में बिहार, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक प्रमुख है. इस विभाजन के पीछे तर्कपद्धति यह है कि पिछड़ी जाति की एक ही श्रेणी में सभी पिछड़ी जाति को साथ रख देने के जो अपेक्षाकृत कमजोर जातियों का समूह होगा, वह आरक्षण से वंचित रह जाएगा. सिद्धांत के तौर पर, पिछड़ी जातियों को एक से ज्यादा समूह में बांटकर आरक्षण देना एक न्यायसंगत कदम है. इसलिए जब बीजेपी ने ओबीसी के राष्ट्रीय स्तर पर बंटवारे के लिए आयोग बनाया तो इसका किसी ने विरोध नहीं किया।

लेकिन अब यह काम रुक गया है या कहें तो बेहद सुस्त चल रहा है. जिस आयोग को 12 हफ्तों में अपनी रिपोर्ट सौंप देनी थी, उसकी अंतरिम रिपोर्ट 12 महीने बाद भी कहीं नहीं है. सरकार इस आयोग का कार्यकाल लगातार बढ़ा रही है. तीसरी बार इसका कार्यकाल जुलाई महीने में बढ़ाया गया और काम पूरा करने के लिए रोहिणी आयोग के पास अब नवंबर, 2018 तक का समय है. सरकार ने जिस काम को 12 हफ्ते में पूरा होने लायक माना, वह काम 12 महीने में भी पूरा क्यों नहीं हो पाया, यह एक बड़ा सवाल है. लेकिन इसे लेकर सरकार भी किसी जल्दबाजी में नहीं दिखती.

अभी जो स्थिति है, उसमें लगता नहीं है कि वर्तमान सरकार अपना कार्यकाल पूरा होने से पहले ओबीसी के विभाजन का काम कर पाएगी. चूंकि अब तक अंतरिम रिपोर्ट भी तैयार नहीं है तो आयोग को, जाहिर है, अपनी फाइनल रिपोर्ट बनाने के लिए और समय की जरूरत होगी. फाइनल रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपी जाएगी, फिर सरकार उस पर विचार करेगी और कैबिनेट के फैसले के बाद एक विधेयक तैयार होगा, जिसे कानून मंत्रालय समेत कई मंत्रालय देखेंगे. इसके बाद संसद में विधेयक पेश होगा. चर्चा के बाद विधेयक दोनों सदनों में पारित हो गया, तो फिर उसे संस्तुति के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा और मंजूरी मिलने के बाद उसका गजट नोटिफिकेशन आएगा.

मौजूदा लोकसभा का कार्यकाल मई 2019 में पूरा हो रहा हो रहा है और उससे कम से कम ढाई महीने पहले चुनाव की अधिसूचना जारी हो जाएगी और उसके बाद ऐसी कोई घोषणा नहीं हो सकती, जिसका चुनाव पर असर पड़े. यानी सरकार के पास ओबीसी विभाजन का कानून पारित करने के लिए सिर्फ संसद का शीतकालीन सत्र है. आप समझ सकते हैं कि इतने कम समय में ओबीसी का विभाजन कितना मुश्किल होगा.

आयोग को अपने काम में एक बड़ी दिक्कत आ रही है. सरकार ने ओबीसी के बंटवारे का काम तो आयोग को सौंप दिया, लेकिन उसे वे आंकड़े नहीं सौपे, जिसके आधार पर आयोग अपना काम करता. ओबीसी की कौन सी जातियां आरक्षण से ज्यादा लाभान्वित हो चुकी हैं और कौन सी जातियां पीछे छूट गई हैं, यह जानने के लिए जातियों से संबंधित आंकड़े चाहिए. मिसाल के तौर पर किसी जाति को अगर आगे बढ़ी हुई जाति साबित करना है तो इसके लिए दो तरह के आंकड़े चाहिए. एक, उस जाति की कुल संख्या कितनी है और दो, क्या सरकारी नौकरियों में उस जाति का आबादी के हिसाब से जितना हिस्सा बनता है, उससे ज्यादा नौकरियों पर वह मौजूद हैं. इन दोनों आंकड़ों के बिना किसी जाति को आगे बढ़ा हुआ और किसी जाति को पीछे छूट गया बताना संभव नहीं है।

आंकड़े न होने की स्थिति में इसका विकल्प अटकलबाजी या अंदाजा लगाना हो सकता है, लेकिन ऐसा करना बेशुमार मुकदमेबाजियों को जन्म देगा. सरकार के पास भारत की सामाजिक, आर्थिक और जाति जनगणना 2011 के आंकड़े हैं, लेकिन वे आंकड़े रोहिणी आयोग को उपलब्ध नहीं कराए गए. यानी रोहिणी कमीशन को अंधेरे कमरे में सूई खोजने का जिम्मा सौंपा गया है।

एक आशंका यह है कि सरकार ने बेशक बेहद जोश के साथ ओबीसी के बंटवारे की योजना तो बना ली और इसके लिए आयोग भी गठित कर दिया, लेकिन चुनाव से पहले जब वह राजनीतिक लाभ-हानि का हिसाब लगाने बैठी, तो उसे यह सब बहुत फायदेमंद नहीं दिख रहा है. बीजेपी ओबीसी के बंटवारे की इससे पहले एक और कोशिश उत्तर प्रदेश में राजनाथ सिंह के कार्यकाल में कर चुकी है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद उसका ये फैसला निरस्त हो गया. बीजेपी का यूपी वाला अनुभव अच्छा नहीं है।

पिछड़ी जातियों का बंटवारा जब अच्छी नीयत से, कमजोर को न्याय देने के मकसद से किया जाता है, तो समाज में उसकी स्वीकार्यता होती है. इसलिए देश के सात राज्य इस समय पिछड़ी जातियों को विभाजित करके आरक्षण दे रहे हैं और इससे किसी को शिकायत नहीं है. लेकिन इसे अगर राजनीतिक कदम के तौर पर लागू किया जाएगा, तो इसका समर्थन और विरोध दोनों होगा। बीजेपी को शायद यह आशंका है कि ओबीसी के विभाजन से ओबीसी की मजबूत जातियां उसके खिलाफ हो जाएंगी। इतना ही भरोसा उसे अति पिछड़ी जातियों के वोट मिलने को लेकर नहीं है. यही उलझन अब उसके कदम रोक रही है।

इन अटकलों के बीच वास्तविक घटनाक्रम पर नजर बनाए रखने की जरूरत है।

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