भँवर में डगमगाती CBI : एन के त्रिपाठी | CBI scandals in Bhanwar N. K. Tripathi

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CBI

पिछले कुछ दिनों से जिस तरीक़े से CBI हेडक्वार्टर में घमासान मचा हुआ है उससे न केवल सरकार मे बल्कि पूरे देश में चिंता व्याप्त हो गई है ।भारत सरकार ने समय रहते कोई कारगर क़दम नहीं उठाये थे इसलिए उसकी इस मामले में किरकिरी होना अवश्यंभावी था। CBI के डायरेक्टर आलोक वर्मा और स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना के बीच जिस तरीक़े से खुला युद्ध छिड़ा हुआ है उससे लगता है कि सरकार के सख़्त नियंत्रण वाला चेहरा अब ढीला होता जा रहा है । CBI के बारे में विगत दो तीन दिनों में बहुत कुछ कहा और लिखा जा चुका है लेकिन फिर भी मैं यहाँ पर कुछ तथ्य रखना चाहूंगा।
CBI न तो संवैधानिक संस्था है और नहीं वैधानिक संस्था है। CBI की पूर्ववर्ती संस्था का 1941 में लाहौर में स्पेशल पुलिस स्टेब्लिशमेंट के रूप में गठन हुआ था।इसके गठन करने का उद्देश्य द्वितीय विश्व युद्ध में युद्ध की सप्लाई में हुए भारी भ्रष्टाचार की जाँच करना था ।1946 में यह संस्था दिल्ली आ गई और इसका नाम डेलही स्पेशल पुलिस स्टेब्लिशमेंट कर दिया गया ।इसका क्षेत्राधिकार बढ़ाकर केंद्र सरकार के सभी विभाग इसके अधीन कर दिए गए । CBI अपने वर्तमान रूप में 1963 में आयी जब गृह मंत्रालय के एक रिजोल्यूशन के द्वारा इसे नया रूप दिया गया परन्तु इसकी क़ानूनी शक्तियां पूर्ववर्ती संस्था के समान ही रही ।

कोई आश्चर्य नहीं है कि 2013 में गौहाटी उच्च न्यायालय ने CBI को एक असंवैधानिक एवं ग़ैर क़ानूनी संस्था घोषित कर दिया। उसके इस आदेश पर फ़िलहाल सुप्रीम कोर्ट का स्टे चल रहा है ।
CBI की स्थापना से ही सत्तारूढ़ दल द्वारा इसका खुला दुरुपयोग किया जाता रहा है। इंदिरा गाँधी के समय में यद्यपि विपक्ष बहुत कमज़ोर और विभाजित था फिर भी उन्होंने इसका दुरुपयोग उनके विरुद्ध करने मैं हिचक नहीं दिखाई।मुलायम सिंह और मायावती के विरुद्ध चल रहे अनुपातहीन संपत्ति के मुक़दमे तो हास्यास्पद स्थिति में आ गये थे जब बार बार राजनीतिक दांवपेंच के अनुसार CBI द्वारा कोर्ट में विरोधाभासी कार्रवाई की जाती रही । 2013 में भी जैसे ही DMK पार्टी द्वारा UPA सरकार से समर्थन वापस ले लिया गया तो तत्काल CBI ने करुणानिधि और उनके परिवार के लोगों के ऊपर छापे डाले थे। मोदी सरकार आने के बाद भी यह क्रम जारी रहा और CBI के साथ साथ ED का प्रयोग विपक्षी नेताओं के विरुद्ध किया गया है। वास्तविकता यह है कि सभी राजनीतिक दलों में यह पूर्ण सहमति है कि जो भी दल सत्ता में आए वो CBI का दुरुपयोग करें।
वर्तमान संकट का प्रारंभ लगभग एक साल पूर्व हुआ जब CVC की बैठक में CBI डायरेक्टर आलोक वर्मा ने राकेश अस्थाना की एडिशनल डायरेक्टर से स्पेशल डायरेक्टर के पद पर पदोन्नति का विरोध किया था। CVC ने डायरेक्टर की बात नहीं मानी और यह पदोन्नति कर दी गई। राकेश अस्थाना गुजरात कैडर के अधिकारी हैं और उन्हें प्रधानमंत्री का पूरा आशीर्वाद प्राप्त था। उन्होंने अनेक प्रशासकीय कार्यों में डायरेक्टर के निर्णयों में हस्तक्षेप करने का प्रयास किया। हद तो तब हो गई जब 24 अगस्त उन्होंने कैबिनेट सेक्रेटरी के समक्ष डायरेक्टर आलोक वर्मा की शिकायत की और आरोप लगाया कि वर्मा ने मोइन क़ुरैशी प्रकरण के एक गवाह सतीश साना से दो करोड़ रुपये प्राप्त किये है ।

कैबिनेट सेक्रेटरी ने यह शिकायत जाँच के लिये CVC को भेज दी। इस शिकायत के कुछ ही दिनों बाद CBI ने सतीश साना को मजिस्ट्रेट के सामने प्रस्तुत किया जहाँ उसने पलटते हुए यह बयान दिया कि उसने राकेश अस्थाना को तीन करोड़ रुपये की रिश्वत दी है। बिना समय गंवाए डायरेक्टर आलोक वर्मा ने 15 अक्टूबर को इसमें F IR करा दी तथा अस्थाना के एक विश्वस्त DSP को गिरफ़्तार कर जेल भेज दिया। अस्थाना को स्वयं अपने गिरफ़्तार होने की आशंका हो गई और उन्होंने हाई कोर्ट से एक सप्ताह के लिए अपनी गिरफ़्तारी रुकवा ली । इन घटनाओं से हुई जगहँसाई को देखते हुए सरकार ने तत्काल कार्रवाई करते हुए दोनों अधिकारियों को देर रात ज़बरन छुट्टी पर भेज दिया ।

शासन को यह निर्णय लेने में CVC द्वारा 23 अक्टूबर को रात साढ़े आठ बजे भेजा गया वो पत्र काम आया जिसमें उसने शासन को लिखा कि आलोक वर्मा जिनके विरुद्ध जाँच हो रही है उन्होंने संबंधित दस्तावेज़ CVC को प्रस्तुत नहीं किये हैं। इस आधार पर CVC ने अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए वर्मा के समस्त अधिकार निरस्त कर दिये। शासन द्वारा ज़बरन छुट्टी पर भेजे जाने के आदेश को आलोक वर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जिस पर आज शुक्रवार को सुनवाई हुई।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में भारत सरकार के वर्मा को छुट्टी पर भेजने के आदेश को निरस्त नहीं किया ।सुप्रीम कोर्ट ने CVC को दो हफ़्ते में आलोक वर्मा की जाँच पूर्ण करने के लिए कहा और CVC के ऊपर पर्यवेक्षण के लिए एक सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट के जज पटनायक को नियुक्त कर दिया ।भारत सरकार द्वारा बनाये गये CBI के कार्यवाहक डायरेक्टर नागेश्वर राव के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वे कोई महत्वपूर्ण फ़ैसला नहीं लेंगे और विगत दिनों में जो उन्होंने निर्णय लिए हैं उन्हें सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करें। सरकार और कांग्रेस दोनों ने इसे अपनी जीत बताई है।
कांग्रेस एवं अन्य विपक्षी दलों ने CBI की स्वायत्तता पर मोदी सरकार द्वारा किए गए हमलों की तीखी आलोचना की है। उल्लेखनीय है कि कांग्रेस द्वारा पूर्व में CBI का दुरुपयोग करने का एक लंबा इतिहास रहा है। लेकिन कांग्रेस ने यह सोचते हुए कि जनता सब भूल चुकी होगी मोदी सरकार पर प्रहार प्रारंभ कर दिये हैं। राहुल गांधी ने इस घटनाक्रम को नाटकीय मोड़ देते हुए सीधे सीधे रफाल फाइटर जेट की ख़रीदी से ज़ोड़ दिया है और एक काल्पनिक आरोप लगा दिया है कि राफ़ेल की जाँच को रोकने के लिए आलोक वर्मा को हटाया गया है । कुछ समय पूर्व तक आलोक वर्मा के तमाम विरोधी रह लोग आज उनके पक्ष में लामबंद हो गए हैं।
भारत के भविष्य के हित को ध्यान में रखने वाले लोगों को यह चिंता होना स्वाभाविक है कि ऐसी परिस्थितियां भविष्य में न हो। इस समस्या का एकमात्र हल यही है कि CBI को अमेरिकी जाँच एजेंसी FBI की तर्ज़ पर पूरी तरह से स्वायत्त कर दिया जाए। सभी राजनीतिक दल CBI और राज्यों में पुलिस पर से अपना नियंत्रण नहीं समाप्त होने देना चाहते हैं ।

इसलिए CBI की स्वायत्तता की आशा केवल सुप्रीम कोर्ट से ही की जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में भी CBI डायरेक्टर का दो वर्ष का निश्चित कार्यकाल कर दिया था । परंतु यह एक बहुत छोटा क़दम था और जब तक CBI का मूलभूत वैधानिक ढाँचा बदला नहीं जाता तब तक इसमें कोई सुधार होने की गुंजाइश नहीं है। आज जो विपक्षी दल लोदी रोड पर गरज रहा है वो सत्ता में आते ही निश्चित इसी CBI का मोदी समर्थकों के विरुद्ध प्रयोग करेगा और हम उसी पुराने नाटक का एक बार फिर मंचन होते हुए देखेंगें।

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