क्या हम भी अपनी सेनाएं तैयार कर लें

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अमित मंडलोई

आजादी के 13 महीने बाद देश ने ऑपरेशन पोलो के नाम से हैदराबाद के खिलाफ युद्ध लड़ा था। इतने सालों बाद केंद्र और बंगाल के बीच फिर आमने-सामने की लड़ाई देखने को मिल रही है। एक के हाथ में राज्य का कानून और पुलिस है तो दूसरे के पास सीबीआई और पैरामिलिट्री फोर्स। किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि आजाद भारत में सियासी संघर्ष इस हद तक जा पहुंचेगा।

सवाल यह है कि आखिर बंगाल ही क्यों। ऐसा क्या हुआ है, जो पिछले कुछ सालों में वहां सियासी संघर्ष चरम पर पहुंच गया है। कभी नेताओं पर चाइल्ड ट्रैफिकिंग के मामले ठोंके जाते हैं तो कभी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में सरे आम हत्या कर दी जाती है। सीपीएम की बरसों से जमी जड़ें उखाडऩे वाली योद्धा ममता बैनर्जी की बढ़ती ताकत इस संघर्ष की वजह है या यह हिन्दी राज्यों में घटती लोकप्रियता का हिसाब चुकता करने की जद्दोजहद का नतीजा। विपक्ष की एकजुटता की धुरी बनने की कोशिशों पर तुषारापात का प्रयास भी बड़ी वजह हो सकती है।

बंगाल का यह संघर्ष आधुनिक राजनीतिक दुस्साहसों की नई कहानी लिखता जान पड़ता है। चुनावी आंकड़ों के लिहाज से देखें तो राज्य में तृणमूल कांग्रेस ने लगातार अपना जनाधार साबित किया है। लोकसभा में भी राज्य की 42 में से 34 सीटों पर तृणमूल कांग्रेस का कब्जा है और इस लिहाज से वह देश की चौथी सबसे बड़ी पार्टी है। इसके बाद सीपीएम हाशिए पर है, लोकसभा में चार सीट होने के बाद भी राज्य की राजनीति में कांग्रेस का रसूख लगातार कम हुआ है। इसके विपरीत भाजपा की ताकत बढ़ी है, 2014 के आम चुनाव में पार्टी ने 2 सीटें जीतीं और 3 पर वह दूसरे नंबर पर रही थी। वोट शेयर 16.8 फीसदी तक जा पहुंचा।

इसके बाद के चुनावों में भी भाजपा ने बढ़त बनाई। यहां तक कि पंचायत चुनाव में उसका रसूख बढ़ा। आदिवासी बहुल क्षेत्र जहां कभी तृणमूल कांग्रेस का राज होता था, ऐसे पुरुलिया और झाडग़्राम की जिला परिषद पर भी भाजपा के कब्जे ने नए संघर्ष को जन्म दे दिया। हालांकि बंगाल का पूरा इतिहास राजनीतिक संघर्ष की गाथाओं से भरा पड़ा है, लेकिन इस बार सियासत जिस स्तर पर उतर आई है, उसकी कल्पना शायद ही किसी ने कभी की होगी। यह भी बड़ा मजेदार इत्तेफाक है कि यहां संघर्ष एन चुनाव के पहले ही होते हैं। विधानसभा चुनाव के समय एक मिनिस्टर को गिरफ्तार करने की कोशिश की गई थी। इस बार पुलिस कमिश्नर के बहाने सरकार निशाने पर है।

चिटफंड घोटाला ममता की बड़ी कमजोरी भी है। 50 फीसदी सालाना तक के रिटर्न का झांसा देने वाली शारदा के दो दफ्तरों का शुभारंभ ममता दी के ही हाथों हुआ था। गरीबों की खून-पसीने की कमाई से बंगाली फिल्में फाइनेंस की गई, आईपीएल टीम कोलकाता नाइट राइडर्स का पोषण किया गया। बेहतरी की उम्मीद लगाए बैठे गरीबों के हाथ कुछ नहीं आया। 2013 से मामला कागजों पर दौड़ रहा है। हर बार चुनाव के ऐन पहले चराग घिसकर उसका जिन्न बाहर निकाल लिया जाता है। लोग सवाल पूछ रहे हैं कि अगर पुलिस कमिश्नर चार साल से नहीं आ रहा था, तो फिर तब सीबीआई कोर्ट क्यों नहीं पहुंची। उसे कोर्ट के माध्यम से तलब करने में क्या परेशानी थी।

ममता बैनर्जी ने सवाल उठाया है कि गब्बर स्टाइल में सीबीआई को पुलिस कमिश्नर के घर जाने की जरूरत क्यों आन पड़ी। हालांकि सवाल यह भी है कि क्यों ममता दी ने योगी को सभा के लिए हैलीकॉप्टर उतारने की अनुमति नहीं दी। इसके पहले वे अमित शाह के लिए भी ऐसा ही कौतुक कर चुकी हैं। क्यों उन्हें पंचायत चुनाव के बाद सैकड़ों कार्यकर्ताओं को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाना पड़ा। मोदी की सभाओं की भीड़ भी बेचैनी की एक वजह हो सकती है। हालांकि लोग यह कह रहे हैं कि भाजपा ऐसे ही राज्य में दूसरे नंबर की पार्टी नहीं बनी है। खूब पैसा बांटा गया है। क्योंकि संगठन उतना मजबूत नहीं है। अब भी पार्टी बाहरी नेताओं के भरोसे पर ही है।

यानी, हवा दोनों की ही टाइट है। भाजपा ने हाल ही में तीन राज्यों की सत्ता खोई है। यूपी, बिहार जैसे हिन्दी राज्यों में और नुकसान की आशंका है। ऐसे में वह बंगाल, असम, ओडिसा, केरल जैसे राज्यों में एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। इधर, समूचे विपक्ष के सामने भी अस्तित्व की लड़ाई छिड़ी हुई है। ममता उसका बड़ा चेहरा हैं। इनके बीच सबसे बड़े डर हमारे घर के दरवाजे पर दस्तक दे रहा है कि ये लड़ाई ऐसे ही चलती रही तो क्या बाकी रह जाएगा। आज सीबीआई गिरफ्तार हो रही है, पुलिस कमिश्नर सवालों के जवाब देने के बजाय धरने पर बैठ जाता है। राज्य में स्थित केंद्रीय दफ्तर की सुरक्षा के लिए पैरामिलिट्री फोर्स लगाना पड़ रही है। क्या कल हमें अपनी सुरक्षा के लिए भी सेना बनाना पड़ेगी।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। फेसबुक वॉल से साभार।

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