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क्या सादगी की होड़ नहीं हो सकती?

Posted on: 13 Jul 2019 11:10 by Surbhi Bhawsar
क्या सादगी की होड़ नहीं हो सकती?

डॉ गरिमा संजय दुबे

पिछले दिनों मशहूर फैशन डिज़ाइनर सव्यसाची मुखर्जी के एक बयान से फेमिनिस्ट तबके में एक भूचाल सा आ गया था | उनका कहना बस इतना था कि महंगे कपडे और गहने केवल बाहरी ख़ुशी देते हैं , कुछ देर की , अगर आप अंदर से खुश हैं तो जो आपके पास है उसमें भी आप खुश रहेंगें | इसका अर्थ जैसा अक्सर होता है गलत तरीके से लिया गया और कहा गया स्त्री कब क्या पहने , क्या नहीं यह उसका निर्णय है और यह नारी विरोधी बयान है जिसके लिए एक बहुत गहरी बात कहने वाले को माफ़ी भी मांगनी पड़ी | मैं अक्सर किसी भी वाद के इस तरह के विकृतीकरण से हैरान रह जाती हूँ, अफ़सोस नारीवाद भी उस विकृति से बचा नहीं है | स्त्री आलोचनाओं से परे की शै नहीं है , यदि हम इंसान होने की लड़ाई लड़ रहे हैं तो अपने को देवी या आदर्श मानने का दुराग्रह छोड़िए और पुरुष की बुराईयों पर चर्चा की तरह अपनी कमजोरियों पर खुलकर बोलिए आखिर आप इंसान हैं सम्पूर्ण हो नहीं सकतीँ | खैर, इस पर बात फिर कभी आज बात इस बयान की |

हालांकि सव्यसाची इसे इंसान (जिसमें स्त्री पुरुष दोनों आते हैं) के संदर्भ में कहते तो ज्यादा प्रभावी होती क्योंकि यह मनोवैज्ञानिक बीमारी तो मानवीय है इसे लिंग सापेक्ष बताना जरूर गलत है | निश्चित रूप से सव्यसाची का बयान स्त्री के पहनने ओढ़ने की स्वतन्त्रता पर नहीं था वह, उस भौतिकतावादी प्रवृत्ति की तरफ था जिसमें बाहरी साधनों को सुख का पर्याय मान लेने की लत के बारे में था जो आधुनिक समाज में बिमारी की तरह फ़ैल रही है | यह आधुनिक मानव के आतंरिक खालीपन , खुशी के कुपोषण पर टिपण्णी थी जहाँ हर दिन नए रूप में अपने को प्रस्तुत करने का दबाव रहता है | यह सेलिब्रिटी सिंड्रोम अब केवल सेलिब्रिटी तक सिमित नहीं रहा बल्कि आम इंसान के जीवन में भी पैर जमा चुका है | बढ़ती सुविधाओं , बढ़ते साधन , बढ़ती सम्पन्नता हमारी आतंरिक खालीपन को और तीव्र कर रहें हैं |

ऐसा होना नहीं चाहिए था लेकिन यह हो रहा है | अक्सर आपने कुछ पुराने लोगों को कहते सुना होगा कि हम कम कपड़ों और साधनों में भी आज से ज्यादा खुश थे, क्यों ? क्योंकि साधन सुख देते हैं आनंद नहीं , सुख क्षणिक है आनंद स्थाई और हमने उस आनंद की कीमत पर सुख अपना लिए जो घाटे का सौदा है। चलिए अपना लिए तो अपना लिए , फिर तो खुश होना चाहिए लेकिन ख़ुशी फिर नदारद क्यों ? वस्तुओं पर निर्भर रहने वाली ख़ुशी कभी एक वस्तु की प्राप्ति से पूरी नहीं होती उसे हर दिन नया चाहिए | आप देखिए ढेर कपड़े , गहने घड़ियाँ होते हुए भी लोग यह कहते पाए जाते हैं अब क्या पहनें, यह तो एक बार पहन लिया, खूब गहने, मेकअप , और महंगे कपड़ों से हर समय सजे रहने , आकर्षण का केंद्र बने रहने और तारीफों से घिरे रहने की यह आदत आपके भीतरी खालीपन को उजागर करती है |

आप अंदर से खुश नहीं हैं तो बाहर की और दौड़ लगाते हैं , जो अंदर से जितना खाली होगा बाहर की तरफ उतनी ही तेजी से दौड़ेगा , होड़ लगाएगा सबसे अच्छा दिखने की , सबसे अच्छा होने की | हालाँकि इसका यह मतलब भी नहीं है कि सादे कपड़े और फूहड़ तरीके से रहने वाला हर व्यक्ति संतुष्ट ही होगा, और घर घुस्सू प्राणी बहुत सुखी , किन्तु संतुष्टि एक किस्म की सहजता लाती है, व्यक्तित्व में अस्थिरता , दिखावा और बनावट नहीं | आप किसी भी भीड़ में सहज होते हैं, अपनी तरह से , कई बार पहने कपड़े को भी सहजता से दोहरा देते हैं , आपका आत्मविश्वास से दमकता चेहरा किसी भी गहने से बड़ी चीज़ है | यह सहजता और सादगी बड़ी चीज़ है और होड़ ही करनी हो तो सादगी की कीजिए , सहजता की कीजिए ज़िन्दगी ज्यादा आसान हो जाएगी |

मार्क जुगरबर्ग एक ही तरह की नीले रंग की शर्ट पहनते हैं, कई बड़ी कंपनी के सीए ई ओ ने अपने कपड़ों का एक पैटर्न तय किया हुआ है, कंपनी के यूनिफॉर्म भी इस श्रेणी में आते है। पिछले दिनों मैंने एक पोस्ट की थी जिसमें एक बेटी के फोटो पर उसे सोशल मीडिया पर डालने से रोकती है क्योंकि पिछली वाली फोटो उसी ड्रेस में थी , क्या है यह ? फिर प्रसिद्द लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ ने भी अपनी कहा कि एक कपडे को कई बार पहना जा सकता है , समारोह में भी , उन्ही की फेशन डिजाइनर बेटी ने इसे बताया कि एक ही कपड़े को बार बार पूरे आत्म विश्वास के साथ पहनना पॉवर ड्रेसिंग कहलाता है।

गुलज़ार साहब , नाना पाटेकर और सुषमा स्वराज और भी कई उदाहरण हैं हमारे सामने जिन्होंने एक तय पैटर्न को अपना सिग्नेचर स्टाइल बनाया , वे उसे बराबर दोहराते रहते हैं , इससे उनके कद में कोई कमी आई क्या? हमने बेवजह अपने को कितनी सीमाओं में बाँध लिया है और उसमें सबसे बड़ी सीमा है लोग क्या कहेंगे | अरे ऐसे खाली लोग जो आपको केवल आपके कपड़े, गहने , सुंदरता , गाडी , से आपको आंकते हों ऐसे लोगों की नज़रों में बने रहने का प्रयास भी क्यों किया जाए | वो पहनिए जो आपको सहज दिखाए , अपनी आर्थिक स्थिति का प्राइज टैग लेकर मत घूमिए | कई लोग तो बड़ी बेशर्मी से हर चीज़ का दाम बढ़ा चढ़ा कर दिखाते हैं | यह रोग फिल्मों , अमीर तबके से लेकर मध्यमवर्गीय परिवार का हिस्सा भी बन रहा है जो उनकी आय का बड़ा हिस्सा इन दिखावटी साधनों पर खर्च करवा रहा है |

अच्छे रहने, अच्छा पहनने या अच्छा खाने पर किसी तरह का प्रतिबन्ध नहीं हमें खुश होने का पूरा हक़ है , महँगे संसाधन खरीदने का भी हक़ है लेकिन केवल उनसे ही हम खुश रह सकें, केवल उसी का चिंतन हो , केवल उस पर ही ध्यान हो और वह हमारी ख़ुशी का साधन बनने के बजाय तनाव का कारण बन जाए यह गलत है, इसलिए थोड़ी सादगी , थोड़ी सहजता ,थोड़ी स्वाभाविकता , थोड़ी कम भौतिकतावादी प्रवृत्तियों को अपने जीवन में जगह दीजिए दिल से खुश होने के लिए ख़ुशी की पोषण का यह तरीका रामबाण औषधि है |क्यों न सादगी का प्रचार हो , सहजता से खुश हो सके इतने मजबूत हों, सच ही तो कहा है सव्यसाची ने कि जब आप सचमुच खुश होते हो तो किसी बाहरी साधन की जरूरत नहीं होती।

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