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उपचुनाव के संकेत, एन के त्रिपाठी की टिप्पणी

Posted on: 01 Jun 2018 04:27 by Ravindra Singh Rana
उपचुनाव के संकेत, एन के त्रिपाठी की टिप्पणी

उप चुनावों के नतीजे बीजेपी के लिये ख़तरे की घंटी बजा रहे हैं। यदि कुछ माह पूर्व हुए उप चुनावों के परिप्रेक्ष्य मे इन्हें देखा जाय तो स्थिति बीजेपी के लिये और ख़तरनाक दिखायी देती है। हालाँकि अभी से २०१९ मे इस पार्टी के लिये उल्टी गिनती घोषित कर देना थोड़ी जल्दबाज़ी होगी। आज के उपचुनावों मे यदि सारे परिणामों को दरकिनार कर केवल कैराना लोकसभा व नूरपुर विधान सभा की बात की जाय तो अधिक सार्थक होगा।

यहाँ पर क्रमश: रालोद और सपा बीजेपी से सीटें छीन कर जीती हैं। उत्तर प्रदेश से ७१+२ सीटें जीत कर २०१४ मे बीजेपी अपने बूते पर सरकार बनाने मे सफल हुई थी।उसके प्रभाव के अन्य राज्यों से भी उसे भरपूर सीटों की फ़सल मिली थी। २०१४ की बीजेपी की उ प्र की जीत हिन्दू ध्रुवीकरण तथा जातिगत पार्टियों के वोट बँट जाने से सम्भव हुई थी।हमेशा साम्प्रदायिक तापमान घटते ही उ प्र मे बीजेपी नीचे आ जाती है। उ प्र का जाट अब हिन्दू से फिर जाट मे परिवर्तित हो गया है ।पूर्वी उ प्र के गोरखपुर और फूलपुर की करारी पराजय के बाद अब यह पश्चिम की हार बीजेपी को हलाकान कर देगी । धार्मिक उन्माद जातिगत गिरोहबंदी के आगे कमज़ोर पड़ता दिखाई दे रहा है।

मेरे मत से आज के अन्य महत्वपूर्ण परिणाम भंडारा लोकसभा मे एनसीपी द्वारा बीजेपी से तथा जोकीहाट विधान सभा मे आरएलडी द्वारा जेडीयू से सीटें छीनना है।पालघर मे शिवसेना की बीजेपी से हार भी विचारणीय है। समग्र रूप से इन चुनावों के भविष्य की राजनीति मे पड़ने वाले प्रभाव मेरे मत से संक्षेप मे निम्नानुसार है।

बीजेपी अब बहुत सतर्क हो जायेगी। राज्यों के आगामी चुनावों के लिये उसका सशंकित हो जाना स्वाभाविक है।केन्द्र सरकार अब राष्ट्रहित की आर्थिक नीतियों को छोड़कर कांग्रेसी ढर्रे पर लोकलुभावने कार्यक्रमों पर पैसे लुटाना शुरू कर देगी । किसानों के लिये बड़ी घोषणाएँ होंगीं क्योंकि पिछड़ा वर्ग मुख्यतया किसान है और विपक्ष से सहानुभूति रखता है।बीजेपी का सहयोगी दलों के प्रति व्यवहार नरम होगा और बचे खुचे दलों को सहयोगी बनाने का उसका प्रयास प्रारम्भ होगा । उसे शिवसेना का फूला मुँह ठीक करना होगा । सबसे महत्वपूर्ण बात होगी कि आमचुनाव के पहले साम्प्रदायिक तनाव को उसके द्वारा हवा दी जायेगी।

कांग्रेस का मनोबल कुछ बढ़ेगा। जहाँ उसकी बीजेपी से सीधी टक्कर है वहाँ पर वह संगठित होकर वह पूरी ऊर्जा से लड़ेगी । जहाँ विपक्षी पार्टियाँ बलशाली है वहाँ उसे मैदान ख़ाली करना पड़ेगा। दो तथ्य स्वयंसिद्ध है। पहला यह कि तरह तरह की विपक्षी दलों की आपस मे बैठने के लिये जो शर्म और झिझक थी वह अब कम हो रही है। अस्तित्व के लिये यह उनके लिये आवश्यक है। दूसरा कांग्रेस अब अपना चक्रवर्ती रूप छोड़ कर अब अपनी वर्तमान क्षमता के अनुसार व्यवहार करेगी और मोदी को हटाने के लिये राहुल गांधी अपना प्रधानमंत्री का दावा तक छोड़ सकते हैं।

कुछ दिन पहले मैंने कहा था कि २०१९ के चुनाव काँटे के होंगे। संघर्ष अब विकट हो गया है । तमाम प्रयासों के बाद भी बीजेपी के लिये उसका एकमात्र अमोघ अस्त्र मोदी ही हैं । सारे नेताओं से काफ़ी ऊँचे क़द से निकली उनकी आवाज़ भारतीय जनमानस को कितना प्रभावित कर पायेगी यह अभी भविष्य के गर्त में छिपा है।

एन के त्रिपाठी 

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