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इंदौर में मैरिज गार्डन का दस्तूर लाए बसंत खटोड़

Posted on: 28 May 2018 11:44 by Praveen Rathore
इंदौर में मैरिज गार्डन का दस्तूर लाए बसंत खटोड़

इंदौर में जब शादी-ब्याह व मांगलिक कार्य धर्मशालाओं में होते थे, उस दौर में अपनी दूरदर्शी सोच और जुनून के चलते शहर के कारोबारी बसंत खटोड़ ने इंदौर में सबसे पहले दस्तूर मैरिज गार्डन की स्थापना कर इंदौर को मैरिज गार्डन कल्चर से रूबरू कराया। 11 साल की उम्र में पिताजी का साया सिर से उठ गया था, तब अचानक परिवार की जिम्मेदारी इन पर आ गई। तमाम संघर्ष करते हुए उन्होंने जीवन के कई उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन हिम्मत नहीं हारी। आज बसंतजी का नाम शहर के सफल कारोबारियों में शुमार है। घमासान डॉटकॉम ने उनके जीवन से जुड़े कुछ पहलुओं पर बातचीत की। प्रस्तुत है प्रमुख अंश….

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सवाल : इंदौरियंस को मैरिज गार्डन कल्चर से परिचित कराने का श्रेय आपको जाता है, आपको दस्तूर गार्डन शुरू करने का आइडिया कैसे आया?
जवाब : 1989 से पहले मैं अपेक्स बैंक में नौकरी करता था। साथ में प्रॉपर्टी का काम भी करता था, लेकिन इतने से संतुष्ट नहीं था। जीवन में अपना कारोबार करने की इच्छा थी। प्रॉपर्टी का काम करते-करते मैंने एमटीएच कंपाउंड में इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकान शुरू की। इसी दौरान 1997 में मैरिज गार्डन शुरू करने का आइडिया आया। तब मैंने स्कीम 71 में आईडीए से प्लॉट लिया और दस्तूर मैरिज गार्डन की शुरुआत की। उन दिनों मैरिज गार्डन का कल्चर तो नहीं था, लोग शादी या मांगलिक कार्य धर्मशालाओं में ही किया करते थे, लेकिन समय बदल रहा था, लोगों सुविधाओं के नाम पर पैसा चुकाने को तैयार हो रहे थे, तभी मन में विचार आया कि यदि शादी के लिए मैरिज गार्डन बनाया जाए और उसमें तमाम सुविधाएं दी जाए, तो ये कॉन्सेप्ट सक्सेस हो सकता है। बस यही सोचकर सबसे पहले मैरिज गार्डन बनाया और उसके बाद उसमें साल दर साल सुविधाएं बढ़ाते चले गए। फिर चाहे रहने के लिए कमरों की बात हो या शुद्ध पानी के लिए मिनरल वाटर की या लाइटिंग डेकोरेशन या स्टेज की। धीरे-धीरे कर सुविधाओं का विस्तार करते चले गए। आज स्थिति यह हो गई कि शहर के अन्य मैरिज गार्डनों ने भी दस्तूर में मुहैया कराई गई सुविधाओं की शुरुआत अपने यहां करने लगे। basant2
सवाल : पारिवरिक पृष्ठभूमि कैसी रही?
जवाब : पिताजी रामचंद्रजी खटोड़ शेयर कारोबारी थे। परिवार की आर्थिक स्थिति भी अच्छी थी, लेकिन जब मैं 11 वर्ष का था, तब पिताजी का सिर से साया उठ गया। घर की जिम्मेदारी और जीवनयापन के लिए संघर्ष की शुरुआत भी हो गई थी। पिताजी के तीन मकान थे, जो बिक चुके थे। कुछ समय किराये के मकान में रहे।

सवाल : आपके करियर की शुरुआत कैसे और कहां से हुई?
जवाब : मेरिट में एमकॉम करने के बाद मेरी अपेक्स बैंक में नौकरी लग गई। पहली पोस्टिंग अलिराजपुर में मिली और वहां नौकरी करते-करते प्रॉपर्टी का काम किया। इंदौर में भी आना-जाना लगा रहता था, इसलिए प्रॉपर्टी के काम को छोड़ा नहीं। इसबीच इंदौर में महालक्ष्मी कॉलोनी की बुकिंग चल रही थी, तब स्टेट बैंक ऑफ इंदौर के कर्मचारियों के एक साथ बुक कराए, तो उससेे अच्छा कमीशन मिला, इस राशि से एमटीएच में इलेक्ट्रॉनिक की दुकान खोली और एलजी और ओनिडा जैसी कंपनियों की एजेंसी और सीएंडएफ का काम हाथ में लिया। धीरे-धीरे पूंजी जमा होने लगी। 1989 में नौकरी छोड़ी और पूरा समय बिजनेस को दिया। 1987 में वृंदावन पैलेस कॉलोनी विकसित की। इसके अलावा रिलायंस कम्युनिकेशंस से जुडक़र मोबाइल सेवा इंदौर में शुरू की। 2009 तक आरकॉम से जुड़े रहे। बाद में प्रतिस्पर्धा और अपने कारोबार के विस्तार को देखते हुए आरकॉम से नाता तोड़ लिया।

सवाल : नये इंटप्रेन्योर को क्या मैसेज देना चाहेंगे।
जवाब : हर बिजनेस मेहनत मांगती है। नया कॉन्सेप्ट लाना पड़ेगा। पुश्तैनी व्यापार के दिन अब नहीं रहे। यंगस्टर्स को हार्डवर्किंग करना चाहिए, व्यापार बढ़ाने के लिए नई प्लानिंग करने के साथ अपने आपको डे बाय डे अपडेट रखना चाहिए, तभी सफलता मिल सकती है।

सवाल : बिजनेस के अलावा आप किन संस्थाओं से जुड़े हैं?
जवाब : वर्तमान में मैं माहेश्वरी समाज इंदौर जिला एवं माहेश्वरी मेवाड़ा थोक के मंत्री, अभा माहेश्वरी महासभा के कार्यकारियणी मंडल में सदस्य एवं महेश्वरी जनकल्याण ट्रस्ट में ट्रस्टी हूं।

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