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बोलना है तेरा हक, तू हक न अपना छोड़ना…गिरीश उपाध्‍याय की टिपण्णी

Posted on: 29 May 2018 09:04 by Munmun Verma
बोलना है तेरा हक, तू हक न अपना छोड़ना…गिरीश उपाध्‍याय की टिपण्णी

आज की बात मैं भारत से कोसों दूर आयरलैंड से शुरू करना चाहता हूं। आप यह कह कर मुझे कोस सकते हैं कि कल तक यह आदमी विशुद्ध रूप से अपनी बस्‍ती और मोहल्‍ले के मुद्दे उठाने की बात करता हुआ राष्‍ट्रीय और अंतर्राष्‍ट्रीय मसलों पर लिखे जाने की आलोचना कर रहा था और आज खुद ही मीडिया की उस ‘अपने वाली’ पर उतर आया है।

लेकिन मेरी गुजारिश है कि थोड़ा रुक जाइए, जरा सांस ले लीजिए और जब अच्‍छी तरह सांस ले चुकें तो सांस को थाम कर उस बात पर गौर करिए जो मैं अब कहने जा रहा हूं। यह बात शुरू जरूर हमसे करीब 8 हजार किलोमीटर दूर बसे आयरलैंड से होती है, लेकिन इसके तार हमारे अपने भारत और भारत की गांव बस्तियों से बहुत गहरे जुड़े हैं।

26 और 27 जून को आयरलैंड से दुनिया भर में एक खबर चली। खबर वहां बसी भारतीय मूल की एक महिला सविता हलप्पनवार की थी जिसका छह साल पहले मिसकैरेज हो गया था। आयरलैंड के कड़े कैथोलिक क़ानून के चलते, वहां के डॉक्‍टरों ने कई बार अनुरोध करने के बावजूद सविता को गर्भपात की इजाज़त नहीं दी थी और आखिरकार इसी वजह से उनकी मौत हो गई।

28 अक्तूबर 2012 को हुई सविता की मौत के बाद वहां बवाल मचा और यह मामला अदालत तक गया। अदालत में ज्यूरी ने घटना को ‘चिकित्सकीय हादसा’ करार दिया। जबकि परिवार वालों का कहना है कि अगर गर्भपात की अनुमति दी जाती तो सविता की जान बचाई जा सकती थी।

इस घटना के बाद सविता की मौत आयरलैंड में एक मुद्दा बन गई और मामला इतना बढ़ा कि वहां की सरकार को गर्भपात संबंधी कानून में संशोधन के लिए जनमत संग्रह कराने पर मजबूर होना पड़ा। 25 मई को कराए गए इस ऐतिहासिक जनमत संग्रह में लोगों ने गर्भपात क़ानूनों में बदलाव के समर्थन में वोट किया और अब यहां की महिलाएं भी गर्भपात करा सकेंगी।

इस घटना के जरिए जो बात मैं कहना चाहता हूं वह यह है कि सविता हलप्‍पनवार दरअसल एक प्रतीक बन गईं और उनके बहाने आयरलैंड में जनआंदोलन खड़ा हुआ और एक कट्टर कैथोलिक देश को भी अपने कानून में बदलाव करना पड़ा। आयरलैंड की यह घटना इस बात का जीवंत उदाहरण है कि यदि जनता किसी मुद्दे पर एक साथ उठ खड़ी हो तो बड़े से बड़े बदलाव के लिए भी शासकों को झुकाया जा सकता है।

अब हम आयरलैंड से भारत लौट आएं। पिछले कुछ सालों पर नजर डालें तो आपको क्‍या दिखाई देता है? क्‍या आज देश में किसी भी… किसी भी मुद्दे पर ऐसा जनआंदोलन खड़ा करने लायक स्थितियां बची हैं? छुटपुट, स्‍थानीय या क्षेत्रीय आंदोलनों की बात छोड़ दीजिए। मैं बात कर रहा हूं ऐसा देशव्‍यापी आंदोलन जिससे पूरे देश की जनता भावनात्‍मक रूप से जुड़ी हो और एकसाथ खड़ी हो जाए।

आज की युवा पीढ़ी की याददाश्‍त में यूपीए सरकार के दौरान 2011 में हुआ अण्‍णा आंदोलन और 2012 में हुआ निर्भया आंदोलन ऐसे थे जिसमें पूरे देश की जनता एकसाथ उठ खड़ी हुई थी। अण्‍णा आंदोलन का बाद में चाहे जो भी हश्र हुआ हो लेकिन उसने यूपीए सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए वह पुख्‍ता जमीन तैयार कर दी थी जिस पर बाद में भाजपा ने अपनी फसल ली। इसी तरह निर्भया मामले को लेकर भी कानून में कई बदलाव हुए।

लेकिन जिस समय हम सविता हलप्‍पनवार केस की बात कर रहे हैं वह समय भारत की वर्तमान सरकार के चार साल पूरे होने का भी है। यदि हम इन चार सालों पर नजर डालें तो यह तथ्‍य उभर कर सामने आता है कि इस अविध में देश में ऐसा कोई आंदोलन खड़ा नहीं हुआ जिसे देशव्‍यापी कहा जा सके और जिसकी तुलना अण्‍णा जैसे आंदोलन से हो सके।

इस स्थिति को क्‍या माना जाए? इस प्रश्‍न के दो ही उत्‍तर हो सकते हैं। पहला तो यह कि तमाम विरोधों और आलोचनाओं के बावजूद इस सरकार की लोकप्रियता की पैठ को विपक्ष हिला नहीं पाया है और यही कारण है कि पूरे देश की जनता किसी एक मुद्दे पर संगठित होकर विरोध में खड़ी नहीं हुई।

दूसरा जवाब यह आ सकता है कि इस सरकार ने ऐसे जनदबावों को पनपने लायक स्थितियां ही नहीं छोड़ी हैं और यही कारण है कि मुद्दे उठाए जरूर जाते हैं लेकिन पानी के बुलबुलों की तरह या तो वे स्‍वयं कुछ देर बाद फूट जाते हैं या फिर फोड़ दिए जाते हैं।

यदि ऐसा नहीं होता तो क्‍या कारण है कि पेट्रोल और डीजल की बढ़ती दरों पर इतने हल्‍ले के बावजूद पूरे देश में कोई संगठित विरोध खड़ा नहीं हो सका है। इसी कॉलम में भोपाल में एक बोरवेल पर दबंग के कब्‍जे की जिस घटना का मैंने जिक्र किया था, क्‍या कारण है कि उस बस्‍ती के लोग सामूहिक रूप से विरोध में सामने नहीं आए।

राजनीतिक व्‍यवस्‍थाएं या तंत्र इस बात को अपनी उपलब्धि या सफलता मान सकते हैं लेकिन लोकतंत्र में जनदबावों और जनआंदोलनों का अपना महत्‍व है। उनके लिए समाज में जगह बची रहनी चाहिए। जनता में विरोध की इच्‍छाशक्ति का बने रहना राजनीतिक व्‍यवस्‍था के लिए भी बहुत जरूरी है। पार्टियों की सरकारें तो आती जाती रहेंगी।

आज कहीं किसी दल की सरकार है तो कल किसी और दल की होगी। गुजरात में कांग्रेस चाहती है कि लोग उठ खड़े हों तो केरल और पश्‍िचम बंगाल में भाजपा चाहती है कि लोग चुप न रहें। लोगों का बोलना और अपने हक की मांग करना, अंतत: लोकतंत्र की मजबूती की ही तो निशानी है। इतिहास गवाह है कि जनदबाव ने बड़े बड़े निजाम बदल दिए।

यूपीए सरकार के देशव्‍यापी विरोध की स्थिति नहीं बनती तो क्‍या एनडीए या मोदी सरकार को सत्‍ता में आने का अवसर मिल सकता था? जनदबाव और जनआंदोलन ही उस सरकार के जाने का प्रमुख कारण बने। हां केवल विरोध के लिए विरोध न हो, लेकिन सार्थक मुद्दों पर विरोध, आलोचना या असहमति को स्‍थान जरूर मिलना चाहिए। यदि ऐसा नहीं हो पाता तो लोकतंत्र के स्‍वरूप और उसके जिंदा रहने पर सवाल खड़े होना लाजमी है।

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