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कलंक | ‘Kalank’

Posted on: 20 Apr 2019 10:45 by Surbhi Bhawsar
कलंक | ‘Kalank’

आनंद शर्मा

महाभारत में लाक्षागृह की कहानी तो आपने सुनी ही होगी | लाख के इस महल की रचना दुर्योधन के कहने से पुरोचन ने की थी | वरणावत में बने इस महल की भव्यता तो ग़ज़ब की थी पर बना ये ख़ाक होने के लिए था , करण जौहर और साजिद नाडियाडवाला के संयुक्त प्रोडक्शन में अभिषेक वर्मन की ताज़ा फ़िल्म कलंक कुछ ऐसी ही भव्य और विराट पृष्ठभूमि के साथ रची गयी है पर देखें तो परिणाम में हासिल कुछ नहीं है |

फ़िल्म की शुरुआत के सेट इतने भव्य हैं की थोड़े देर तो दर्शक उसके आकर्षण में ही खो जाता है , पर जब थोड़ी देर बाद ही कहानी का बेतुकापन लचर सिलसिले से आगे बढ़ता है और हर अगला संवाद दर्शन शास्त्र की किताब से निकले हर्फ़ों से लबरेज़ परदे पर गूँजता है तो फ़िल्म भारी लगने लगती है |

फ़िल्म की कहानी कुछ इस तरह है , रूप ( आलिया भट्ट ) राजस्थान के एक संगीत शिक्षक की बेटी है , जिसे सत्या ( सोनाक्षी सिन्हा ) उसकी बहनों की शादी के ख़र्च उठाने का आश्वासन दे अपने पति देव चौधरी ( आदित्य रॉय कपूर ) की दूसरी पत्नी बनाने के लिए ले आती है | सत्या केन्सर के रोग से ग्रस्त है और चाहती है की उसकी मौत के बाद रूप उसके पति का साथ दे | देव अपनी पत्नी की ज़िद से शादी के लिए तो हाँ कर देता है पर पहली ही रात रूप से स्पष्ट कर देता है की उनका रिश्ता औपचारिक रहेगा |

हुस्नाबाद की विशाल हवेली में तनहा रूप अपना समय काटने के लिए हीरामंडी की तवायफ़ बहार बेगम ( माधुरी ) से संगीत सीखने जाने लगती है जहाँ उसकी मुलाक़ात ज़फ़र ( वरुण धवन ) से होती है और वो उससे प्यार करने लगती है | लेकिन ज़फ़र जो की दरअसल चौधरी ( संजय दत्त ) और बहार बेगम का बेटा है और जिसे समाज के डर से चौधरी ने अपनाया नहीं था रूप के प्यार के ज़रिए अपने पिता से इन्तक़ाम लेना चाहता है | रूप को अपने प्यार में शामिल करने के साथ साथ वह अपने साथी अब्दुल ( कुणाल खेमू ) को भी देव चौधरी के ख़िलाफ़ भड़काता है जिसकी परिणिति दंगे में होती है | पर आख़िर में उसे अहसास हो जाता की वो तो रूप से सच्चा प्यार करता था और इस अहसास के बाद वो अपनी जान देकर रूप और उसके पति को बचाता है |

फ़िल्म की कहानी में कई झोल हैं , कहानी का कालखंड स्वतंत्रता के ठीक पूर्व का है , पर देश विभाजन के गम्भीर विषय को बड़े ही सतही ढंग से फ़िल्माया गया है | आलिया बेशक बेहद ख़ूबसूरत लगी हैं , पर उनकी ख़ूबसूरत अदाकारी भी कहानी की रवानगी को क़ायम नहीं रख सकी है | फ़िल्म में सत्या का किरदार असरकारक हो सकता था , पर उसे बोझिल कर दिया गया है | आदित्य रॉय कपूर शुरुआत में आकर्षक लगे हैं पर वरुण के साथ दोस्ती के दृश्य से ही हल्के लगने लगते हैं | दर असल कहानी के संदर्भ आपस में एक दूसरे के सिरे को गूँथ नहीं पाते हैं और घटनाएँ भारी भरकम डायलाग के बोझ तले सरल-सहज नहीं रह जाती | माधुरी सदैव की तरह सुंदर हैं , और उनके तथा आलिया के नृत्य की बाज़ीगरी कुछ हद तक आपकी कोफ़्त को कम करती है | निर्देशक तय नहीं कर पाए हैं कि कुणाल खेमू को नृशंश दिखाना है या संजीदा लीडर |

सेट अत्यंत भव्य हैं और रामायण की नृत्य नाटिका ग़ज़ब रची गयी है | वरुण ने अपने तयीं पूरी कोशिश की है , पर उनके किरदार को सही रंग फ़िल्म में भरा नहीं गया तो वे मध्यांतर तक आपको बोर करने लगते हैं | कुलमिला कर इस भारी भरकम और आलीशान इमारत में शिल्प तो कमाल का हो सकता था पर उसमें जान डालने और क़सीदाकारी से सजाने में निर्देशक चूक गए।

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