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वाकई फिल्मी दुनिया में अच्छी कहानियों का नितांत अभाव नजर आता है इसका उदाहरण है फिल्म “कलंक” | Indeed, there is a great lack of ‘Good Stories’ in the film world, For Example, Kalank Movie

Posted on: 18 Apr 2019 10:00 by Pawan Yadav
वाकई फिल्मी दुनिया में अच्छी कहानियों का नितांत अभाव नजर आता है इसका उदाहरण है फिल्म “कलंक” | Indeed, there is a great lack of ‘Good Stories’ in the film world, For Example, Kalank Movie

आज के पाकिस्तान के ” हुस्नाबाद ” शहर की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म ” कलंक ” बेहद उबाऊ , बेवजह लंबी और हिचकोले खा कर चलती फिल्म है । हुस्नाबाद में हीरा मंडी है , जहां तवायफ के कोठों के , साथ साथ , लोहारों के हथियार बनाने के चिमनी वाले कारखाने हैं । हुस्नाबाद में मिस्त्र के प्राचीन खेल कूद वाले खुले स्टेडियम भी है जिसकी एक तरफ पूरे पहाड़ है नदियां है , खुले स्टेडियम में बकायदा बुल फाइटिंग भी होती है । संजय दत्त (बलराज चौधरी ) का बेटा देव चौधरी (आदित्य राय कपूर) विदेश से पढ़ाई कर देश लोटता है और एक इगंलिश अखबार निकालता है । आदित्य राय कपूर की पत्नी सत्या चौधरी (सोनाक्षी सिन्हा ) के पास एक साल की उम्र बची है उसे कैन्सर है । वह पता नहीं कहां से एक संगीत शास्त्री की बड़ी बेटी रुप (आलिया भट्ट )को चुनती है और अपनी सौत बना कर ले जाती है ताकि उसकी मृत्यु के बाद पति की देखभाल वाली पत्नी बन सके ।

बलराज चौधरी का भी भूतकाल है ।हीरा मंडी की तवायफ बहार (माधुरी दीक्षित) के नाजायज बेटे जफर (वरुण धवन) की अम्मी है । आलिया भट्ट , बहार से संगीत शिक्षा लेने के लिए जाती है और वहां लोहार , जफर से इश्क करने लगती है| आदित्य राय कपूर मुल्क की तरक्की लिए अपने अखबार में स्टील फैक्ट्री लाने की हिमायत करता है , हथियार बनाने वाले लोग मुस्लिम हैं जो विरोध करते हैं नतीजा हिंदू मुस्लिम दंगा , प्रेमियों का मिलन , जुदाई , मुल्क का बंटवारा । बाप रे बाप इतनी भारी भरकम कहानी और फिल्म देखकर भाई दिमाग चकराने लगता है ।

आलिया भट्ट , सोनाक्षी सिन्हा , आदित्य राय कपूर ने अच्छा अभिनय किया है । वरुण धवन बद्रीनाथ की इमेज से बाहर ही नहीं हो पा रहे हैं । उनकी संवाद अदायगी गलत हिंदी उच्चारण से कमजोर हो जाती है । तवायफों के द्वारा भी संगीत की तालीम दी जाती थी , पहली बार पता चला । हुस्नाबाद के बाजार का सेट अच्छा बन पड़ा है । बहार का कोठा इतना भव्य और विशाल है कि महल भी छोटा पड़ जाए । इंदौर के पूर्व राजाओं का राजप्रासाद लाल बाग में कई दृश्य फिल्माए गए हैं । महेश्वर के नर्मदा घाट की , किले की लोकेशन को भी फिल्म में दिखाया गया है । फिल्म की शूटिंग राजस्थान में भी हुई है ।

फिल्म के कई दृश्य अतिश्योक्तिपूर्ण है । अलबत्ता हुसैन दलाल के संवाद जानदार हैं | पतंग लुटने की दीवानी आलिया भट्ट पतगं लुटने पहाड़ों पर कैसे पहुंच जाती है । नायक अपनी प्रेमिका और उसके पति के लिए अपना बलिदान देकर फिल्म का अंत सुखद बना देता है ।  इतनी भारी भरकम स्टार कास्ट होने के बावजूद भी निर्माता को आइटम सांग भी डालना पड़ा अफसोस है । फिल्मी गानों की भरमार है जब भी फिल्म झोल खाती है , गाना डाला गया है जो और बोरियत से लाता है । बड़े-बड़े कलाकारों की डायलॉग फाइटिंग के बावजूद फिल्म कोई खास प्रभाव पैदा करने में नाकामयाब है ।  मेरे अनुमान से फिल्म बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप साबित होगी अभिषेक बर्मन एक अच्छी फिल्म नहीं बना सके । करण जोहर की बतौर निर्माता सबसे बेकार फिल्म है|
चंद्रशेखर बिरथरे&एक दर्शक

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