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भाजपा के ‘दलित घर भोजन’ से आने वाली खट्टी डकारें, वरिष्ठ पत्रकार अजय बोकिल की टिप्पणी

Posted on: 07 May 2018 05:42 by Ravindra Singh Rana
भाजपा के ‘दलित घर भोजन’ से आने वाली खट्टी डकारें, वरिष्ठ पत्रकार अजय बोकिल की टिप्पणी

बुनियादी तौर पर एक अच्छा विचार भी महज वोट कबाड़ने के टोटके में कैसे तब्दील हो जाता है, यह जानने के लिए भाजपा का दलित घर भोजन कार्यक्रम समझना जरूरी है। यह पूरा अभियान इतनी चतुराइयों और सतही सहानुभूति से भरा हुआ है कि यह समझना कठिन है कि पार्टी को इससे क्या और कैसे हासिल हो रहा है। इस अभियान की जमीनी हकीकत उजागर होने के बाद संघ प्रमुख डाॅ. मोहन भागवत को भी कहना पड़ा कि भाजपा नेता दलितों के घर भोजन करने की ‘ड्रामेबाजी’ बंद करें। सामाजिक समरसता के लिए जरूरी है कि हम खुद दलितों को अपने घर बुलाएं और उन्हें आदर के साथ खाना खिलाएं।

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केन्द्रीय मंत्री उमा भारती ने भी दलित घर भोजन की ‘नौटंकी’ पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि मैं उनके घर खाने के लिए जाने के बजाए उन्हें ही अपने घर बुलाकर भोजन कराती हूं। दलितों के घरों में खाना खाकर सुर्खियां बटोरने की होड़ के बीच केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान ने कहा कि राजनेताअों को पिछड़े समुदायों को कृपा दिखाने से बचना चाहिए।

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दलितों के घरों में नेताओं के खाना खाने से छुआछूत दूर नहीं होगी। भाजपा के दलित सांसदों उदितराज और सावित्री बाई फुले ने भी इस अभियान की आलोचना करते हुए कहा कि इससे कुछ ह‍ासिल नहीं होगा। मजे की बात यह है कि दो साल पहले जब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने यूपी के बस्ती ‍जिले में एक दलित के घर खिचड़ी खाई थी तो भाजपा ने उसका खूब मजाक बनाया था।

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भाजपा का दलितों के घर भोजन अभियान बीते दो सालों में देश में दलितों पर अत्याचार की बढ़ती घटनाअों के बाद दलित वोटों को साधने की सामाजिक- राजनीतिक मुहिम है। इसकी शुरूआत सबसे पहले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने देश के कई राज्यों में दलितों के घर जाकर भोजन करने से की। अमित शाह के बाद देश में कई स्थानों पर भाजपा के मुख्यमंत्री और मंत्री भी दलित भोजन करते दिखने लगे। एससी/एसटी एक्ट के सुप्रीम कोर्ट द्वारा शिथिलीकरण के बाद दलित भोजन मुहिम और जोर पकड़ती दिखी।

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कोशिश यही है कि हाथ से फिसलते दलित वोटों को कैसे थामा जाए। हालांकि समाज सुधार की यह मुहिम पहले ही दिन से विवादों में घिरने लगी थी। तेलंगाना में तो यह राजनीतिक मुद्दा ही बन गया। सवाल इस बात पर उठने लगे कि जिसके घर भोजन किया, क्या वह सचमुच दलित था? दलित था तो जो भोजन अतिथियों को परोसा गया क्या वह भी दलित के हाथों ही बना था? और इस ‘भोजन यात्रा’ से किसका भला हुआ? क्योंकि मीडिया में ये खबरें आईं कि भाजपा नेताअों ने दलित के घर जाकर जो भोजन किया था, ज्यादातर मामलों में वह किसी होटल से मंगाया गया था।

यानी केवल स्थान दलित का घर था। मीनू और प्रिपरेशन कहीं और की थी। यूपी में योगी आदित्यनाथ के दलित भोजन की कहानी तो और भी आंखे खोलने वाली है। योगी एक दलित के यहां भोजन के लिए गए तो वहां उनकी कैबिनेट मंत्री स्वाति सिंह पहले ही जा पहुंची थीं और उसने घर का किचन अपने कब्जे में ले लिया। कहते हैं कि स्वाति ने अपने हाथ से जो भोजन तैयार किया, उसे ही दलित के हाथों बना खाना बताकर योगी को परोसा गया।

योगी वह ‘स्वादिष्ट’ भोजन खाकर प्रसन्न हुए। मन में तृप्ति रही कि दलित वोट सिद्ध हो गया। यह बताना गैरजरूरी है कि योगी और स्वाति सिंह दोनो जाति से ठाकुर हैं। योगी सरकार के एक मंत्री सुरेश राणा तो बाकायदा घर से भोजन पानी लेकर दलित के घर पहुंचे और उसे खाते हुए फोटो खिंचवाया। जाहिर है कि पूरे अभियान का मकसद केवल दलित के घर भोजन करते हुए फोटो शूटकर उसे मीडिया के माध्यम से प्रचारित करना था। ताकि यह मैसेज जाए कि खुद सरकार ही जातीय समरसता बनाए रखने के लिए क्या कर रही है। दरअसल जिस तरह आए दिन भाजपा नेता किसी न किसी दलित के यहां ‘भोजन’ करने जा रहे हैं, उससे दलित खुद चकित हैं। क्योंकि जो देखो वो ‘पाॅलिटिकल पिकनिक’ की तरह उनके यहां ‘लंच’ करने चला आ रहा है।

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नेताअोंने आने से उसकी दिनचर्या बाधित हो रही है, सो अलग। ऐसे तमाम दौरों केवल दलित रिझाऊ प्रतीकवाद बनकर रह गए हैं। ज्यादातर भाजपाई इसे ‘जबर्दस्ती की राम राम’ ही मानते हैं। चूंकि पार्टी का कार्यक्रम है, इसलिए करना है। उधर दलितों को यह समझ नहीं आ रहा कि उनके घर खाए खाने की राजनीतिक डकार से उनकी कौन सी समस्या हल होनी है या हो रही है? उसकी सामाजिक हैसियत में कौन सा इजाफा हो रहा है।

यही वजह है ‍कि इस चलताऊ दलित भोजन अभियान को संघ प्रमुख को ‘पब्लिसिटी स्टंट’ बताना पड़ा। उन्होने कहा कि बजाए इसके भाजपा के लोगों को नियमित रूप से दलितों से मिलना चाहिए। आरएसएस प्रवक्ता डाॅ मनमोहन वैद्य ने भी कहा कि इस तरह की शो बाजी का कोई मतलब नहीं है। बीजेपी क्या करती है, यह उसका विषय है, लेकिन संघ वर्षों से समसरता भोज का आयोजन करता रहा है। यह अभियान दरअसल हिंदू समाज में दलित और गैर दलितों के बीच एका और समसरता भाव पैदा करने के लिए शुरू किया गया था।

लेकिन जिस बेमन से इसे लागू किया गया, उससे अभियान की पवित्रता पर ही सवाल खड़ा हो गया है। अगर दलित के हाथ का बना खाना खाने को लेकर इतनी हिचक है तो उसके यहां जाकर खाने का अाग्रह करना ही क्यों? हम पहले दलितों के बने खाने पर तो भरोसा करें, उसे पूर्णब्रह्म तो मानें बजाए वोट मानने के। ऐसी तमाशेबाजी से न तो मन मिलेंगे और न ही समरसता का कोई ककहरा लिखा जाएगा।

खाना कोई किसी के यहां भी खाए, उस खाने में जज्बात किसके हैं, यह ज्यादा अहम है, बजाए उस खाने से किसी का पेट भरने के। वैसे भी संघ प्रमुख की कड़ी नसीहत और उमा भारती की टिप्पणी के बाद भी मूलभूत सवाल अनसुलझा है, और वह यह है कि हम दलितों को बराबरी का दर्जा कब देंगे ? उनके हाथ के बने खाने को भी उतना ही ‘शुद्ध’ और ‘पवित्र’ समझेंगे? समाज के हर क्षेत्र में उनकी वाजिब हिस्सेदारी कब देंगे और कब ऐसे प्रायोजित खाने से अाने वाली डकार पूरे समाज की समरसता की डकार साबित होगी बजाए गहरे जातीय विद्वेष की खट्टी डकार के?

अजय बोकिल

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