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विजयवर्गीय के साथ न हो जाए ‘गढ आला पण सिंह गेला’

Posted on: 01 Dec 2018 15:46 by Ravindra Singh Rana
विजयवर्गीय के साथ न हो जाए ‘गढ आला पण सिंह गेला’

कीर्ति राणा की कलम से

सिर्फ इंदौर ही नहीं, पूरे प्रदेश और देश की नजर इंदौर की तीन नंबर विधानसभा सीट पर लगी हुई है। यह सीट इतनी चर्चित नहीं होती यदि भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय अपने पुत्र आकाश का टिकट यहां से ओके नहीं करवाते। आकाश को दो नंबर से यदि टिकट मिलता तो सट्टाबाजार भी उनकी पराजय का सट्टा नहीं खाता लेकिन तीन नंबर के रिजल्ट को लेकर खुद भाजपा के लोग भी दावा करने से बचने के लिए यह गली निकाल लेते हैं कि भले ही अधिक लीड न मिले पर जीतेंगे तो सही।

ऐसा क्या हुआ कि टिकट घोषित होने वाले दिन पचास हजार से जीत का दावा अब ‘जीतेंगे तो सई’ में सिमट गया।आकाश का टिकट तय होने के बाद जब घरेलु रिश्तेदार ललित पोरवाल ही मुंह फुला कर, पार्टी छोड़ कर बैठ गए तो कैसे मान लिया जाए कि सुमित्रा ताई की जत्रा-मंडली ने पूरी लगन से काम किया होगा।बेटे को आग के दरिया से पार कराने के इस खेल में तीन नंबर के मठाधीशों पर भरोसा भी कहां किया गया। मतदाताओं को रिझाने के लिए काली रातों में जिनसे भी वादे पूरे करने की सूची बनी उसमें तीन नंबर के प्रमुखों को आगे रखा भी तो साथ में चार जासूस भी लगा दिए कि कहीं कोई गड़बड़ न कर दे।

जिन लोगों ने पूरी निष्ठा से काम करने का मन बना रखा था वे भी इस अविश्वास वाली हरकतों से खुद को अपमानित महसूस करते रहे।इन लोगों ने अपने अपमान का बदला भी अनूठे अंदाज में लिया- इधर दो नंबरी टीम वोटरों को रिझाने रवाना होती और उधर तीन नंबरी मोबाइल पर ही पानी वाले बाबा के नजदीकियों को इत्तला कर देते।यही कारण रहा कि इस क्षेत्र में मतदान पूर्व की रातों में जितनी भी घटनाएं हुईं उनमें पुलिस को सर्वाधिक सूचनाएं कांग्रेस खेमे से प्राप्त हुईं।

जिले के इस सबसे छोटे विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम, मराठा, ब्राह्मण वोटों की अधिकता है। इस बार के चुनाव में यहीं नहीं पांच नंबर से लेकर पूरे प्रदेश में मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में अभूतपूर्व मतदान हुआ है।वैसे भी तीन नंबर के मुस्लिम परिवारों में महेश जोशी जितनी पैठ तो खुद अश्विन की भी नहीं है। ऐसे में लगता नहीं कि तीन तलाक या राम मंदिर मसले से खुश होकर अल्वोपसंख्टयक समाज ने भाजपा के पक्ष में वोट दिए होंगे।एट्रोसिटी एक्ट की आग भड़कने के बाद से सवर्ण समाज की एकजुटता भी मजबूत हुई है।

तीन नंबर क्षेत्र में अग्रवाल, माहेश्वरी ( वैश्य समाज) ने यदि आकाश को सितारा बनाने का संकल्प लिया तो ‘जय परशुराम’ सुन कर ही गदगद हो जाने वाले ब्राह्मण समाज ने भी एक नंबर में संजय शुक्ला और तीन नंबर में अश्विन जोशी के प्रति सहानुभूति दिखाई है।वैसे तो हर चुनाव में सुमित्रा महाजन मराठी बहुल रामबाग, नारायण बाग में मीटिंग लेती रहीं लेकिन इस बार वे अमित शाह के रोड शो से लेकर तीन नंबर से ऐसे गायब रहीं जैसे इंदौर नहीं इस्तांबुल में जाकर बैठी हों। नतीजा यह रहा कि इस बार मराठी बहुल क्षेत्रों में अपेक्षाकृत मतदान कम रहा है।

पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कैलाश जी को मालवा-निमाड़ की 66 सीटों में भाजपा का पुराना आंकड़ा (56 सीटें) कम न हो इसकी जिम्मेदारी सौंप रखी है, ऐसा उनकी टीम ने ही प्रचारित किया। यह सही भी माना गया क्योंकि मालवा-निमाड़ में जहां भी भाजपा के बागी खड़े हुए थे उन्हें समझाने के लिए विजयवर्गीय ने खूब भागदौड़ भी की थी, यह अलग बात है कि वो लोग हठी साबित हुए। उठापटक, जोड़तोड़ से लेकर प्रेम-मोहब्बत की राजनीति के जादूगर कैलाश विजयवर्गीय पर भाजपा नेताओं ही नहीं उनके विरोधियों की भी नजर लगी हुई है कि 11 दिसंबर को वे पुत्र की विजय के समाचार से खुश होंगे या मालवा निमाड़ में भाजपा की सीटें कम होने के कारण गिनाने के लिए कोई अन्य चेहरा तलाशेंगे।क्षेत्र क्रमांक तीन के निवासी और ताई भाई में चली टसल के जानकार और इस बार भाजपा को वोट न डालने का कारण गिनाने वाले मराठी मतदाता ने व्यंग्योक्ति में कहा उनके साथ कहीं ’गढ आला पण सिंह गेला’ जैसी स्थिति ना बन जाए कि बेटा जीते तो मालवा निमाड़ में गड्डा बढ़ जाए और वहां स्थिति सुधरे तो यहां अंधियारा न छा जाए-दोनों हाथ में लड्डू जैसी स्थिति बनना किसी चमत्कार से कम नहीं होगा।

’गढ आला पण सिंह गेला’ का मतलब
तानाजी मालुसरे शिवाजी के घनिष्ठ मित्र और मराठा साम्राज्य के वीर निष्ठावान कोली सरदार थे। वे छत्रपति शिवाजी महाराज के साथ हिंदवी स्वराज्य स्थापना के लिए सुभादार (किल्लेदार) की भूमिका निभाते थे । वे १६७० ई. में सिंहगढ़ की लड़ाई में अपनी महती भूमिका के लिए प्रसिद्ध हैं। अपने बेटे के विवाह जैसे महत्वपूर्ण कार्य को महत्व न देते हुए उन्होने शिवाजी महाराज की इच्छा का मान रखते हुए कोंढाणा किला जीतना ज़्यादा जरुरी समझा। इस लडाई में क़िला तो “स्वराज्य” में शामिल हो गया लेकिन तानाजी मारे गए थे। छत्रपति शिवाजी ने जब यह ख़बर सुनी तो वो बोल पड़े “गढ़ तो जीता, लेकिन “सिंह” नहीं रहा (मराठी में कहा जाता है गढ आला पण सिंह गेला)।

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