धार में भाजपा फिर छतर के ही दरबार में | BJP in Dhar

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भोजशाला विवाद के लिए सारे देश में चर्चित और पर्यटन के लिए लाखों लोगों के प्रिय डेस्टिनेशन मांडव जैसी ऐतिहासिक नगरी को दामन में समेटे धार में लोकसभा चुनाव की हलचल तेज हो चली है। भारतीय जनता पार्टी(BJP) ने बुजुर्ग नेता और दो बार सांसद रहे छतरसिंह दरबार पर दांव लगाया है तो कांग्रेस ने एक लो प्रोफाइल नेता दिनेश गिरेवाल पर जो बदनावर विधानसभा सीट के गांव रुपाखेड़ा से आते हैं। मैदानी राजनीति(Politics) में उनकी स्थित जो भी बने कांग्रेस की गुटीय राजनीति के लिहाज से वे सिंधिया खेमे के माने जा रहे है। वैसे उन्होंने आज तक विधानसभा स्तर का भी कोई चुनाव नहीं लड़ा है।

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उधर, दरबार भी भाजपा(BJP) के लिए मजबूरी के ही प्रत्याशी हैं। कारण, मौजूदा भाजपा सांसद सावित्रि ठाकुर का लगभग निष्क्रिय रहना और पिछली बार भी मोदी लहर के कारण ही चुनाव जीतना रहा। इसके चलते भाजपा को उनका टिकट काटना ही पड़ा। दरबार और गिरेवाल इस बात की भी मिसाल है कि अनुसूचित जनजाति के विकास की बाते जितनी भी हो, इनमें नेतृत्व विकसित करने में किसी भी दल की कोई रुचि नहीं है। इसी कारण कोई नया नेतृत्व उभरता ही नहीं। बहरहाल, चर्चा छतरसिंह दरबार की करें तो वे 1996 और 2004 में इसी सीट से जीतकर लोकसभा में पहुंचे हैं। 1998 में भी उन्होंने नामांकन दाखिल किया था, लेकिन खारिज हो जाने पर पार्टी ने ताबड़तोड़ उनकी पत्नी हेमलता दरबार को टिकट दे दिया और वे चुनाव हार गईं।

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पर्चा खारिज होने का कारण चुनाव आयोग की सख्ती थी। वही चुनाव था जिसमें प्रत्याशियों को पहली बार अपने खिलाफ चल रहे आपराधिक मामलों की जानकारी भी शपथ पत्र पर देना अनिवार्य किया गया था। इसमें ही दरबार उलझ गए। पता चला उन्हें किसी गंभीर आपराधिक मामले में सजा हो चुकी है और वे पेरोल पर छूटकर सांसदी की दावेदारी कर रहे हैं। वह घटनाक्रम तब राजनीतिक हल्कों में काफी चर्चित रहा था।

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बहरहाल, उसके बाद दरबार उस मामले में बरी हुए और 2004 में फिर मैदान संभालकर धार सीट जीत ली। वैसे इस संसदीय क्षेत्र में हुए तेरह चुनाव में से सात कांग्रेस(congress) ने व छह भारतीय जनसंघ, भारतीय लोकदल या भारतीय जनता पार्टी ने जीते हैं। कांग्रेस से चार बार गजेंद्रसिंह राजूखेड़ी जीते और भारतीय जनसंघ के भारतसिंह चौहान भी चार बार संसद में पहुंचे, लेकिन उनके छोटे भाई हर्ष चौहान नहीं जीत सके।

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