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बिनाका गीतमाला: जादू था, नशा था, शशांक दुबे की कलम से….

Posted on: 22 Jun 2018 16:53 by krishnpal rathore
बिनाका गीतमाला: जादू था, नशा था, शशांक दुबे की कलम से….

एक जमाना था, जब हर बुधवार की शाम 8 बजे सड़कों से ट्रैफिक गायब हो जाता था, दुनिया ठहर जाती थी, दक्षिण एशियाई देशों के तमाम फिल्म संगीतप्रेमी अपने रेडियो सेट से सट कर साँसे रोके `बिनाका गीतमालामय हो जाते थे. बिनाका गीतमाला में हर हफ़्ते के सबसे ज्यादा लोकप्रिय सोलह गीतों को चढ़ते क्रम में सुनाया जाता था. गीतों की लोकप्रियता देश के प्रमुख म्युजिक स्टोर्स से रेकॉर्डों की बिक्री और देश भर में फैले लगभग डेढ़ हजार रेडियो श्रोता संघों की राय के आधार पर तय की जाती थी.यह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत का एक अनूठा लोकतांत्रिक प्रयोग था, जिसमें गीतों के हिट-फ्लॉप की वर्टिकल परेड की बागडोर श्रोताओं के हाथ में थी. झुमरी तलैया, बेगुसराय और भाटापारा जैसे एटलस के हाशिये पर धकेल दिए गए टप्पों से लगाकर जूनागढ़, राँची, इंदौर, हजारीबाग और भावनगर जैसे मध्यम शहरों के फरमाइशी कार्यक्रमों के स्थायी फरमाइशकर्ताओं ने अपने-अपने शहरों में रेडियो श्रोता संघ बना लिए थे. यही श्रोता हर हफ़्ते अपनी बैठकें आयोजित कर तत्कालीन गीतों पर लंबे बहस-मुबाहिसे के बाद आम सहमति से लोकप्रियता का क्रम देते थे और उस सूची को तत्काल रेडियो सिलोन रवाना कर देते थे. इन्हीं सूचियों का समेकन करने के बाद गीतों को फाइनल काउंट डाउन दिया जाता था. रेडियो श्रोता संघ की ताकत को शंकर जयकिशन और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने बखूबी पहचाना था. वे न सिर्फ इन श्रोता संघों के सालाना जलसों में शिरकत करते थे, बल्कि उनके छमाही बुलेटिन के प्रकाशन में अपनी ओर से आर्थिक सहयोग भी करते थे.

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उस जमाने में गायकों और संगीतकारों की हैसियत दिलीप, शम्मी, देव की ही तरह सेलिब्रिटी की थी और इन संगीतकारों के दोस्ताना व्यवहार का असर यह होता था कि गीतों की पायदान तय करते वक्त इन संगीतकारों के प्रति श्रोता संघों में सौफ़्ट कौर्नर होता था. यही कारण है कि बिनाका गीतमाला में साठ के दशक में जहाँ शंकर-जयकिशन का वर्चस्व रहा, वहीं सत्तर के दशक में यह ताजपोशी लक्ष्मी-प्यारे को मयस्सर हुई. श्रोता संघ की ताकत को बतलाने के लिए इतना जानना ही काफी होगा कि बिनाका गीतमाला के 1961 के सालाना कार्यक्रम में सबसे बड़ा हिट गीत “क्या हुआ हो मुझे क्या हुआ” (फिल्म: जिस देश में गंगा बहती है) था, जबकि इसी फिल्म के शेष गीतों “होठों पे सच्चाई रहती है”, “ओ बसंती पवन पागल” और “मेरा नाम राजू घराना अनाम” सहित अन्य फिल्मों के गीतों को निचली पायदान से संतोष करना पड़ा था.गीतों की लोकप्रियता तय करने में रेकॉर्डों की बिक्री भी भूमिका अदा करती थी. जब राज कपूर ने फिल्म `बॉबी’ से अपने परंपरागत संगीतकार शंकर-जयकिशन को हटाकर लक्ष्मी-प्यारे को लिया था, तो जिस दिन फिल्म के रेकॉर्ड रिलीज हुए, शंकर ने गुस्से में आकर सभी म्युजिक स्टोर्स से फिल्म के रेकॉर्ड इकट्ठे कर रातों-रात समुद्र में फिकवा दिए. शंकर को यह गुस्सा उलटा पड़ा. अगले ही दिन संगीत कंपनी ने टाइम्स में विज्ञापन छपवाया – बॉबी के दस हजार रेकॉर्ड एक ही दिन में बिके. अगले हफ़्ते `बौबी’ के गीत “हम तुम इक कमरे में बंद हों” की सीधे ही तीसरी पायदान पर एंट्री हुई और तीन हफ़्तों में यह टॉप पर पहुँच गया.

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बिनाका की लोकप्रियता में सबसे बड़ी भूमिका इसके प्रस्तुतिकार अमीन सयानी की थी. “बहनों और भाइयों” जुमले से अपने कार्यक्रम की शुरुआत करने वाले अमीन सयानी गीतों के क्रम को इतने रहस्यमय तरीके से पेश करते थे कि श्रोता घंटे भर के लिए उन्हीं का होकर रह जाता था. सफलता की ओर बढ़ रहे गीत के लिए उनका “इस बार पिछले हफ़्ते के मुकाबले छ: पायदानों की छलांग लगाकर तीसरे नंबर पर आ पहुँचा है यह गीत ” कहना या पच्चीस हफ़्ते तक बजने के बाद उसे सरताज का खिाताब देते हुए विदा करते हुए खास किस्म का बिगुल बजाना, बीच-बीच में दो या तीन श्रोताओं के पत्रों के चुटीले उत्तर देना और लोकप्रियता की दृष्टि से सामान्य लेकिन गुणवत्ता की दृष्टि से शालीन गीत का प्रवेश होने पर उसकी तारीफ«î करते हुए जनरुचि का परिष्कार करने की कोशिश करना; इन्हीं चीजों ने बिनाका को चोटी पर पहुँचाया.बिनाका की लोकप्रियता का आलम यह था कि बुध की शाम 8 से 9 के दरम्यान लोग अव्वल तो अपने घर से निकलते नहीं थे और यदि निकलते भी, तो घर से लेकर मंजिल तक के रास्ते के बीच हर नुक्कड़, हर घर और हर दुकान में रखे रेडियो सेट से निकली आवाजें उन्हें कार्यक्रम की इंच-दर-इंच जानकारी बिना किसी जतन के स्वाभाविक रुप से मुहैया करा देती थी. शॉर्ट वेव पर बजने वाले रेडियो सिलोन के इस कार्यक्रम से दुनिया भर के तमाम रेडियो चैनल रश्क करते थे. हद तो तब हो गई थी जब 1976 के सालाना कार्यक्रम को बिगाड़ने के लिए प्रतिस्पर्धी चैनलों ने लंगर डाल डालकर इसकी फ्रिक्वेन्सी को घंटे भर के लिए जाम कर दिया और सारा देश गीतों की वार्षिक परेड जानने के लिए अपने दोस्तों-परिचितों और पड़ोसियों की ओर भागने लगा. लेकिन सभी दूर एक ही जवाब था – “क्या करें? बिनाका लग ही नहीं रहा!” तब टेलिफोन इतना सुलभ नहीं था और तार की ही तरह इसका प्रयोग जनम, मरण, परण जैसे खास मामलों में ही किया जाता था. सारे देश में हाहाकार मच गया. संयोग से इंदौर के एक महँगे रेडियो संपन्न संगीतप्रेमी को आखिरी के तीन गीत जैसे-तैसे सुनने को मिल गए और उसने इस जानकारी को उस समय के हिंदी के चोटी के अखाबार `नईदुनिया’ में `पत्र, संपादक के नाम’ कॉलम में लिखकर बाँटा और बताया कि इस साल के चोटी के तीन गीत “कभी कभी मेरे दिल में खायाल आता है” (कभी कभी), “इक दिन बिक जाएगा माटी के मोल” (धरम करम) और “मैं तो आरती उतारुँ रे” (जय संतोषी माँ) रहे. बहरहाल रेडियो श्रोता संघों समेत पूरे देश के संगीतप्रेमियों की सुनवाई हुई और अगले हफ़्ते इस कार्यक्रम को रिपीट किया गया.

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तो यह आलम था बिनाका की लोकप्रियता का. लेकिन हर चीज का समय होता है. अस्सी का दशक आते-आते भारतीय फिल्म संगीत में मेलडी का स्थान बप्पी लहरी के डिस्को ने ले लिया, दूसरी ओर टेलीविजन में क्रांति आ जाने के कारण लोग रेडियो की बजाए टीवी पर चित्रहार की ओर आकृष्ट हुए. रेडियो सिलोन ने अपने कार्यक्रमों को समेट लिया और दिन भर “वंदना करते हैं हम” टाइप के ईशू प्रचार में जुट गया. बिनाका सिलोन से शिफ़्ट होकर विविध भारती पर आ पहुँचा, नाम भी बदल कर सिबाका हो गया और एक घंटे से घटकर आधा घंटे और फिर घटकर पंद्रह मिनट तक सिमटते-सिमटते अंतत: यह भी `धर्मयुग’ की गति को प्राप्त हुआ. वक्त के बेरहम थपेड़ों ने भले इसे काल कवलित कर लिया हो, लेकिन पचास, साठ और सत्तर के दशक की संगीतप्रेमी पीढ़ी आज भी बिनाका को अतीत की किताब के सबसे खूबसूरत सफे के रुप में सुस्मृत करती है.

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