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लौकी का हलवा हो जाना | ‘Big Star Hotel’ Hospitality

Posted on: 20 Apr 2019 12:32 by Surbhi Bhawsar
लौकी का हलवा हो जाना | ‘Big Star Hotel’ Hospitality

विश्वास व्यास

बड़ी स्टार होटल, अपने लिए रास्ता बताने का लैंड मार्क और ज्यादा से ज्यादा किसी शादी-पार्टी के निमंत्रण पर जाने की घटना को दो-चार दिन तक लोगों को बताने के काम आती है। किसी बड़े साहब की सेवा में, मैं भी एक बड़ी होटल में पहुंचा। वहां के माहौल में अलग ही रंग। भारी मेकअप और खुशबू से सराबोर स्वागतकर्ता से लेकर थ्री पीस सूट (बाहर तापमान 42 डिग्री था ) पहने वेटर तक, सब कुछ मशीनी लग रहा था। रेस्टोरेंट में पहुंचा तो देखता हूं चार पांच जोड़े, जो सूरत शक्ल और पहनावे से उच्च वर्ग का बिजनेस कैटलॉग लग रहे थे, धीरे-धीरे बात करते हुए खाने में बड़ी गंभीरता से मशगूल थे और ऐसा लग रहा था कि जैसे चोरी से खा रहे हो या चोरी करके।

वरना अपन तो ढाबो-भोजनालयो के देसी कल्चर के आदमी है। जहां सामने की टेबल पर बैठे व्यक्ति के मोबाइल पर चल रही चर्चा भी सुनी जा सकती है। यहां तो बड़ा उठावने सा माहौल है चुप चाप बैठे लोग, मनहूस सी धुन का संगीत और इशारों में बात करते लोग। मुझे लगा कि शायद यहां हंसने और बोलने पर भी जीएसटी लगता होगा।

होटल के गेट से यहां तक के सजे संवरे तरह-तरह के चेहरों जैसा सजा हुआ सलाद बिल्कुल सामने था। कहीं फल में दही है, कहीं सब्जी में क्रीम! सब कुछ इतना सलीके से लगा हुआ कि बिगाड़ने का मन न करें। अपने यहां, ऐसी सजावट केवल रंगोली तक सीमित है और रंगोली बिगाड़ने की सजा मैं कई बार भुगत चुका हूं इसलिए सलाद से बचना बेहतर लगा।

आज जानकारी में भी इजाफा हुआ कि आलू, पपीता, मूंग और मूंगफली जैसी अलग अलग स्वाद, आकार, रंग और हैसियत वाली चीजें यदि क्रीम के साथ मिल जाए तो बड़ी आसानी से पहचान बदलकर मामूली सब्जी फल से, “रशियन सलाद” हो सकती हैं। बड़ी होटल के बड़े मीनू में, मुझ जैसे छोटे आदमी के सामने बड़ी झांकी भी जमा सकती है।

सुस्त से माहौल में “नाजुक ज्यादा या महंगे ज्यादा” की प्रतियोगिता कर रहे, बर्तनों में सजे मूंग, मूंगफली और आलू, मुझे कई मामूली चेहरों का, क्रीम के साथ चिपक कर ” रशियन सलाद ” होना याद दिला रहे है। यहां हर चीज के साथ अलग अलग कटोरी, चम्मच, छुरी, कांटा, तश्तरी मतलब प्लेट, छोटी , मझौली बड़ी, उपलब्ध थी। ऐसा भी कह सकते है कि क्रॉकरी परिवार सकुटुंब मौजूद था।

जैसा जमे उठा लो और खाओ। अपन तो भाई, शादियों के बूफे के आदी हैं । जहां एक प्लेट को खतरे के निशान से ऊपर तक सजा कर, 10 लोगों के साथ, वहीं खड़े होकर ,बातचीत करते हुए खाने की परंपरा है। यहां बात थोड़ी अलग है। बड़ी असमंजस की स्थिति कि कटलेट छोटी प्लेट में लूं या मँझली में! मेरे साथी छोटी प्लेट में कांटे के साथ, एक कटलेट ले चुके थे । अब इतना तो मेरी पत्नी नमक मिर्च का स्वाद पता करने के लिए खिला देती है इसलिए यह मुझे अपने संस्कार के विपरीत लगा। मैं, सामाजिक समरसता और भाईचारे में भरोसा रखता हूं। मैंने तो चटनी भी ली, सॉस भी लिया और साइड में श्रीखंड जैसा दही भी। मैं स्वभाव से, फूलों को चाहने वाला, नाजुक मिजाज आदमी हूं। सो कांटे तो मुझे यूं ही पसंद नहीं और छूरी तो बिल्कुल भी नहीं इसलिए मैंने छूरी कांटे से खाई जाने वाली चीजों के सदन से वाकआउट कर दिया। वैसे भी अपने को हाथ से ही खाना आता है।

मैंने तपेली और कटोरे के बीच के बर्तन में कड़छी की छोटी बहन के साथ, एक चाइनीस सूप ले लिया। जिसका नाम अंग्रेजी में लिखा था सो जानने में मेरी कोई रुचि नहीं थी पर सुप में फरियाली मिक्चर जैसा कुछ डाला था । तब तक मेरे साथी चाउमीन के साथ “पड़ी लकड़ियां” उठा चुके थे। मनुष्य के चंचल मन का इतना जीवंत उदाहरण मैंने देखा की इतने महंगे और तरह-तरह के छूरी, कांटे, चम्मच होते हुए भी आदमी का दिल “लकड़ी” पर आ सकता है।

जैसे तैसे सुप को निभा कर, मैं खाने की मेज के सामने था । किसी पॉलीटिकल पार्टी के घोषणापत्र सी, हर वर्ग को संतुष्ट करती इस टेबल ने, चयन की समस्या खड़ी कर दी। अपने तो महीने भर के मीनू से ज्यादा आइटम सामने थे और देख कर ही मन भर आया था। यह भी था कि कल खाए कड़क भुट्टे कि सर्जिकल स्ट्राइक से मेरे दांतों की किलेबंदी हिल गई थी । आधे फुट के भुट्टे सेंक कर सीधे मुंह से खाने वाला मैं, छोटे-छोटे भुट्टो को तरी के सागर में गोते लगाता देख रहा था।

मैं इस जीवन दर्शन को सीख पाया कि ज्यादा अकड़ और कड़क पन से, आप न ‘सेंकने’ के रहते हैं, न ‘कीसने’ के! आपको, आपसे बड़ी अकड़ वाले, तल कर, उबालकर, चरखे पानी मे डूबने के लिए छोड़ देते हैं। मैं जैसे-तैसे कोई भी सब्जी लेकर खाने की चेष्टा करूं, उससे पहले ही वो साहब हंस पड़े “माड़साब, यहां भी लौकी खाओगे ! हम तो घर पर भी ना खाएं कभी ,बीमार का भोजन है । मैं , लौकी और अपने लिए ‘एहसास ए कमतरी’ लेकर शाही पनीर से इस तनावपूर्ण स्थिति को नियंत्रण में लाने की कोशिश करने लगा।

तभी क्या देखता हूं कि सामने रखी अंग्रेजी नाम वाली, चांदी के वरक और सूखे मेवों की ‘जेड प्लस सुरक्षा’ में रखी मिठाई उनकी प्लेट में सजी थी। वे बड़े स्वाद और संतुष्टि के साथ उस का आनंद ले रहे थे। मैंने पास खड़े वेटर से पूछा, “भाई ,यह क्या है?  वह भी इतनी देर से मेरा देसी व्यवहार ताड गया था। मुस्कुरा कर बोला कुछ नही भैया, यूँ समझो कि ” लौकी का हलवा” है। मैंने मन में सोचा की ,हे लौकी! तूने किस व्रत को किया था की आज तेरे दिन फिरे।

मैं, वही खड़ा रह गया और लौकी, फाइव स्टार में, मावे और घी के साथ हलवा बनी, अपनी अंग्रेजी पहचान पर इतरा रही थी। हमारी मानसिकता ही कुछ ऐसी है ।जैसे ही हमारे यहां कोई समय, परिस्थिति या संगति के प्रभाव से ‘आम सब्जी से हलवा’ होकर वीआईपी बनता है, उसके प्रति हमारी नापसंदगी, पसंद में बदल जाती है।

कुल मिलाकर आप कहां, किस हैसियत में है, से आपके प्रति लोगों का व्यवहार निश्चित होता है । यहां भी वही दिखा कि मैं अपनी सूरत में ‘लौकी की सब्जी’ और साहब लोगों में ‘लौकी का हलवा’ देख पा रहा था।

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