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परिवारों की नई चुनौतियों से निपट सकेगी बीएचयू ट्रेंड ‘आदर्श बहू’? अजय बोकिल की कलम से….

Posted on: 04 Sep 2018 15:37 by krishnpal rathore
परिवारों की नई चुनौतियों से निपट सकेगी बीएचयू ट्रेंड ‘आदर्श बहू’? अजय बोकिल की कलम से….

इसे वक्त की जरूरत कहें या बनारस हिंदू विश्वविद्यालय ( बीएचयू) की अभिनव पहल कि विवि के आईआईटी विभाग ने भारतीय परिवारों में लड़कियों को आदर्श बहू बनाने के उद्देश्य से तीन माह का कोर्स शुरू करने का फैसला किया है। आईआईटी इसे एक स्टार्ट ग्रुप यंग स्किल्ड इंडिया के साथ मिलकर शुरू कर रहा है। यंग स्किल्ड इंडिया के सीईओ नीरज श्रीवास्तव के मुताबिक इस तरह के पाठ्यक्रम की शुरूआत समाज में बढ़ते तनाव और समस्याअों को देखते हुए की जा रही है। इसे ‘डाॅटर्स प्राइड-बेटी मेरा अभिमान’ नाम दिया गया है। तीन महीने की इस ट्रेनिंग में आत्मविश्वास, पारस्परिक कौशल, समस्या को सुलझाने के कौशल, तनाव संभालने के गुण के साथ ही कंप्यूटर की जानकारी, फैशन के बारे में ज्ञान के अलावा मैरेज स्किल्स और सामाजिकता के भी गुण सिखाए जाएंगे। कोर्स के लिए छात्राअों का चयन जल्द ही किया जाएगा। चयनित महिलाअों को सेल्फ कांफिडेंस, इंटरपर्सनल स्किल, प्रॉब्लम सॉल्विंग स्किल, स्ट्रेस हैंडलिंग, मैरिज स्किल के साथ कंप्यूटर व फैशन स्किल सिखाया जाएगा।

कोर्स शुरू करने के पीछे सोच यह लगती है कि भारतीय समाज में बदली परिस्थिछतियों में परिवारों में बहू के सामने मौजूद चुनौतियों से निपटना, सास और उसके बीच तनाव, दोनो में समझदारी के बिंदु, परिवारों को टूटने से बचाना और नए जमाने के हिसाब से सास-बहू के शाश्वत झगड़े को समझदारी के निपटाना। समाज चाहे भारतीय हो या पश्चिमी, सास और बहू का झगड़ा उतना ही पुराना है, जितनी कि परिवार संस्था। फर्क इतना है कि कहीं यह तनाव बेहद तल्ख है तो कहीं धीमी आंच की तरह सुलग रहा होता है। कम ही परिवार ऐसे हैं, जहां सास और बहू के रिश्ते एकदम‘आदर्श’हैं, जिनकी बहुएं एकदम ‘सुलक्षणी’ हैं।  नया कोर्स शुरू करने के पहले शायद यह मान लिया गया है कि परिवार को बचाने, उसे संस्कारित करने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका बहू की ही है। इसीलिए भारतीय परिवारों में बहू ‘देखभाल कर’लाने और घर में बहू बनकर आने के बाद उससे कई जमीनी और आसमानी अपेक्षाएं करने पर सारा जोर है। ये अपेक्षाएं ज्यादातर इकतरफा ही हैं।

भारतीय संस्कारों में आज्ञाकारिता, विनम्रता, शुचिता, आदर, सम्मान, त्याग, अतिसहनशीलता और गरिमा जैसे ज्यादातर मानदंड बहू के साथ ही जोड़े गए हैं। उससे अपेक्षा है कि वह अपना सर्वस्व निछावर कर दे, बदले में कुछ न मांगे। मरते दम तक परिवार में त्याग, समर्पण और निष्काम भाव की प्रतिमूर्ति तक बनी रहे। अपनी छवि को संभालती रहे। उसे दाग न लगने दे। इसी कोशिश में वह अंतिम सांस ले। ऐसा करेगी तो ही वह आदर्श बहू के पैमानों पर खरी उतर पाएगी। उसके द्वारा इहलोक में दूसरों के लिए जीया गया जीवन ही परलोक में उसकी सीट स्वर्ग में रिजर्व करेगा। पारंपरिक भारतीय मान्यताअों के मुताबिक आदर्श बहू वो है, जो वंश बढ़ाए, घर तक सीमित रहे, सास सहित पूरे परिवार को खुश रखे, विदुषी हो, कमाऊ हो, लेकिन उसका अभिमान न करे, वह खाए-पीए लेकिन पूरे परिवार का पेट भरने के बाद, वह अपने सुखों का विचार तभी करे, जब सुख की परिभाषा का अंत हो जाए। वह परिवार की नींव बने, लेकिन स्वयं कलश बनने की न सोचे। विष्णु पुराण में आदर्श पत्नी की परिभाषा देते हुए कहा गया है ‘सा भार्या या गृहे दक्षा सा भार्या या प्रियंवदा। सा भार्या या पतिप्राणा सा भार्या या पतिव्रता’ अर्थात, जो पत्नी गृहकार्य में दक्ष है, जो प्रियवादिनी है, जिसके पति ही प्राण हैं और जो पतिपरायणा है, वास्तव में वही पत्नी है। इसे थोड़ा और बढ़ा दें तो बहू के रूप में उससे यही बनने की अपेक्षा है।

यहां विचार का मुददा यह है कि आज जिन तनावों और जटिलताअों से भारतीय परिवार गुजर रहे हैं, क्या बीएचयू का कोर्स उनका‍ ‍िनदान सुझा पाएगा? क्या यहां से ट्रेंड लड़कियां अपने वास्तविक जीवन में पाठ्यक्रम के हिसाब से पूरी तरह तालमेल बिठाकर सुखी जीवन की अंतिम परीक्षा अच्छे नंबरों से पास कर लेंगी? इसकी गारंटी शायद ही कोई दे सके। क्योंकि ऐसी कोशिश पहली नहीं है। भोपाल के पास बैरागढ़ में कई सालों से मंजू संस्कार केन्द्र ऐसा प्रशिक्षण दे रहा है। उद्देश्य यह सिखाना रहा है कि बेटियां अच्छी बहुएं कैसे बनें। एक अहम बात यह है कि भारतीय समाज में रिश्ते केवल ‘इन लाॅ’ भर नहीं हैं। यहां रिश्तों की कानूनी डोर उसके उत्स और पूरे खानदान में उसकी व्यापकता से तय होती है। इसीलिए हर रिश्ते को एक खास नाम है और कुटुंब में उसकी कोई न कोई भूमिका तय है। इस हिसाब से बहू भी केवल ‘‘डाॅटर इन लाॅ’ भर नहीं है। वह पूरे परिवार की धुरी आई है। वह परिवाररूपी टैंक की ऐसी चालक है, जो बाहर से नजर नहीं आती। यह तो हुई किताबी बात। व्यवहार में देखें तो परिवार में तनावों की शुरूआत ही नई बहू के आगमन के साथ शुरू हो जाती है। क्योंकि परिवार में सत्ता और काम का बंटवारा तथा खींचतान नए सिरे से शुरू हो जाती है। ऐसे में आदर्श बहू के साथ कई बार इतना अमानवीय और निकृष्ट व्यवहार होता है कि इंसानियत भी शर्मा जाए। बहू का सर्वाधिक टकराव भी उस सास से ही होता है तो कल तक खुद बहू के रूप में घर में विचरती है।

इसके सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारण खोजें तो सास से बहू तक सत्ता का यह हस्तांतरण जटिलताअोंऔर अहसजता से भरा होता है। किसी भी विवाहित स्त्री का एक ‘मां’ से ‘सास’ में रूपांतरण एक गहरे मनोवैज्ञानिक बदलाव की मांग करता है। सास और बहू में पहली लड़ाई पुत्र और पति पर आधिपत्य की होती है। पुत्र के पति या ‍िपता के रूप में बदलाव को मां का मानस आसानी स मंजूर नहीं करता। यहीं से परिवार में आंतरिक संघर्ष शुरू होता है, जिसमें सास और बहू का अहम तथा अधिकारों का दावा आग में घी का काम करता है। यही परिवार के बिखराव की शुरूआत भी है। तो क्या बीएचयू का नया कोर्स इन्हीं सुराखो को बंद करने का काम करेगा? यह देखने की बात है। 20 वीं सदी के उतरार्द्ध में आर्थिक और अन्य कारणों से भारतीय समाज में संयुक्त परिवारों के टूटने की जो शुरूआत हुई वह अब एकल परिवारो के व्यक्तियों में विभाजित होने पर आ टिकी है। इस हिसाब से आदर्श बहू की पारंपरिक परिभाषा की बहुत ज्यादा उपयोगी और व्यावहारिक नहीं रह गई है।

क्योंकि बहू की भूमिका और व्यापक तथा बहुआयामी हो गई है। उसे कई मोर्चे एक साथ न केवल संभालने हैं, बल्कि उन मोर्चों पर अंतिम विजय तक डटे रहना है। उसे आर्थिक योगदान देना है, परिवार को संस्कारित भी करना है, बच्चों को ठीक से बड़ा करना है, बुजुर्गों का भी ध्यान रखना है। घर का वातावरण सुकून भरा बनाए रखना है। अन्य सामाजिक रिश्ते भी निभाना है। बदलते जमाने के ‍िहसाब हर काम में ‘अप डेट’ भी रहना है। वह अब केवल पुरूष की ‘अर्द्धांगिनी’ भर नहीं है। उससे ‘सर्वांगी’ बनने की अपेक्षा है। फिर भी बीएचयू के नए कोर्स से इतनी उम्मीद तो बांधी ही जा सकती है कि वो परिवार में बहू की चुनौतियों का हल भले न खोजे, उन्हें कम करने में कुछ मदद तो कर ही सकता है।

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