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आज एक परिवार ही नहीं लाखों लाखों अरमान बेघर हो गए साहेब

Posted on: 12 Jun 2018 17:42 by Lokandra sharma
आज एक परिवार ही नहीं लाखों लाखों अरमान बेघर हो गए साहेब

आज एक परिवार ही नहीं लाखों लाखों अरमान बेघर हो गए साहेब क्यों की आप तो लाखों लाखों दिलो की धड़कन थे आप ही से तो ना जाने कितनी बेटियों की किसानो की अरमान पल रहे थे जिन कामों को करने की ज़िम्मेदारी सरकार की होती थी वह एक संत करता था आप ही तो भूले भटकें को राह दिखाते थे आपका धीर गम्भीर स्वभाव वो दादा साहेब का संभोधन आप ही के मुँह से अच्छा लगता था आपका वह लिनेन का सफ़ेद कुर्ता पायजमा लाल सुर्ख़ मुखमंडल पर केसर चंदन का तिलक सबको नाम से पुकारने की आपकी अदभुध याददाश्त सबका मन मोह लेती थी जो भी आपकी दहलीज़ पर आता कभी ख़ाली हाथ नहीं जाता ऊर्जा से मनोबल से झोली भर कर ही वापस जाता था किसी को सम्मान देने की तहज़ीब भी हर कोई ही से सीखता था आप ही ने तो सिखाया था की धीरज और धर्म की राह पकड़े रखो इनकी जड़े गहरी होती है।

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नर सेवा ही नारायण सेवा का सूत्र भी आप ही ने तो सिखाया आप भले ही महँगी कारो में सफ़र किया करते थे लेकिन आदिवासी आँचल की बेटियों की शिक्षा चिकित्सा की चिंता भी तो आप ही किया करते थे दूर दराज़ क़स्बों में लाखोंअन्नदाताओ को अनाज खाद पानी बिजली की व्यवस्था भी आप ही करवाते थे सत्ता के गलियारो में आपकी गहरी पैठ थी लेकिन आपकी विनम्रतापूर्वक शैली के आगे बोनी नज़र आती थी आप ही में तो वह जादू था की जो भी आप से मिलता उसे यही लगता मुझ से ज़्यादा ख़ास कोई आपका है ही नहीं।

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जब अन्ना हज़ारे ने अन्न जल त्याग दिया था तब भी आप ही सरकार के संकट मोचक बनकर आए थे मोदी जी के सत्याग्रह पर भी आप ही साबरमती पहुँचे थे किसी को सुनने की धिरजाइ की मिसाल भी आप ही तो थे फिर अचानक यह धीरज का बाँध आज कैसे टूट गया आप तो प्रसाद में भी बच्चों को चौकलेट दिया करते थे आज अपने बच्चों को इतनी बड़ी सज़ा कैसे दे सकते हो ?

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यक़ीन नहीं होता वह कौन सा ग्रहण योग आया था की आप ने ख़ुद से हार मान ली आप तो मराठा के वंसज थे वीर शिवाजी को बाल ठाकरे को अपना आदर्श मानते थे तलवार भाले आपके आभूषण हुआ करते थे कभी कभी आप हमें अपनी तलवार बाज़ी का हुनर भी दिखाया करते थे आप कर्म से संत तो मन से योद्धा थे एक योद्धा कैसे हथियार डाल सकता है परेशानी घर की भी हो सकती है और बाहर की भी आप के क़द पद के सामने किसी परेशानी की क्या मजाल जो सर उठाए आप हमेशा कहा करते थे शिष्य प्रश्न है तो गुरु उसका उत्तर है मेरे लिए यह प्रश्न हमेशा हमेशा के लिए बरक़रार रहेगा की एक सेना पति योद्धा ने आख़िर इतनी आसानी से हार क्यों मान ली और किसके आगे मान ली।
( लेखक – संतोषसिंह डी एच एल इंफ्राबुल्स के डायरेक्टर है )

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