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शब्दों की झाड़ियां बनाकर अनुचित विचारों का जंगल मत बनाइये, सुरेंद्र बंसल की टिप्पणी

Posted on: 14 Jun 2018 06:07 by Ravindra Singh Rana
शब्दों की झाड़ियां बनाकर अनुचित विचारों का जंगल मत बनाइये, सुरेंद्र बंसल की टिप्पणी

बहुत कुछ लिख पढ़ लिया बीते त्रासदायक दो दिनों में, जो भय्यूजी महाराज को जानते थे वे भी और जो नहीं जानते वे भी किसी विशेषज्ञ की तरह जैसी चली कलम घसीटते चले गए , कुछ शीलवान अशालीन से शब्दों की हेराफेरी से गुजरते चले गए। हो सकता है आत्महत्या जैसे प्रसंग जो जीवन को समाप्त करने की खुदगर्ज़ी है उसका संदेश समाज को भयभीत करता हो।

यहां यह सोच जरूरी है कि कोई व्यक्ति अपने को समाप्त कर लेने के लिए किसी मियादभर को नहीं जीता वह भरपूर आनंद और खुशी की जिंदगी का भरपूर मज़ा चाहता है। कुछ जिंदगियां ऐसी होती है जब वह तिरस्कृत उपज से अपने को बहिष्कृत मानने लगती है तब अनहोनी का जन्म होता है।

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जो कुछ हो गया वह नहीं होना था यही तो अनहोनी है, अनहोनी कोई निर्मित नहीं करता फिर जब वह आती है तो किसी घटना या काल का दुश्चक्र होती है ,जो चलते बढ़ते हुए जीवन को दुष्प्रभाव से बाधित कर देती है। यह अनचाहे ही जीवन में आती है और एक घटना की तरह अंकित हो जाती है।

आत्महत्या भी अनहोनी का ही एक हिस्सा है जो परिस्थितिजन्य तात्कालिक क्रिया है, इसमें कभी आवेश है तो कभी भीतर की टूटन और कभी असहाय हो जाने का निराशाजनक भाव भी है। भाव अक्सर मनोयोग से उत्पन्न होते है लेकिन हर तरह के भावों के बीच भावुकता एक प्रधान भाव है जो सदाचरण व्यक्तित्व के लोगों में ज्यादा मिलता है । यही भावुक भाव व्यक्ति की मनोदशा को तत्काल प्रभावित करता है , ऐसे व्यक्ति तुरंत रिएक्टिव होते हैं ,उनके हाव भाव भी उनके अन्तरभावों को परिलक्षित करते हैं हम देखते हैं लोगों के चेहरे और दृष्टि उनकी सोच को जबतब जाहिर कर देती है । व्यक्ति के भाव उसके शारीरिक भाषा से पढ़े और समझे जाते हैं। आत्महत्या ऐसे ही  तात्कालिक लेकिन क्षणिक  अन्तरभावों से निर्मित तिरस्कृत उपज है जो चलती हुई जिंदगी को बहिष्कृत कर पूर्ण विराम कर देती है । ऐसे क्षणिक भाव यदि कुछ पल के लिए रुक जाए तो वह पल भी निकल जाता है जो अनहोनी को उत्पन्न कर जिंदगी को बाधित करता  है।

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भय्यूजी महाराज एक सबल और मजबूत किस्म के इंसानियत से लबरेज़ इंसान थे । उनकी उस वक़्त की एकान्तता यदि किसी तरह कुछ पल के लिए खण्डित हो जाती तो एक प्रबल और प्रभावशाली आध्यात्मिक जिंदगी खण्ड खण्ड होने से बच जाती लेकिन यह पल किसी के भी साथ हो सकता है और भावुक लोगों के साथ यह संभावित अंदेशे की तरह हर पल साथ भी रहता है। यह शून्यात्मक स्थिति ईश्वर के अंदर भी है फिर इंसान तो कुछ भी नहीं है। यह जरूर भय्यू जी महाराज एक पहुंचे हुए आध्यात्मिक गुरु थे जिनकी प्रेरणा और संदेश हज़ारों लोगों की जिंदगी थी वे सब आज मार्गबाधित अवश्य महसूस कर रहे हैं।

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लेकिन इस काल समय भय्यूजी महाराज जरूर मार्ग अवरोधित हुए होंगे , उन्हें दांयें – बाएं, आगे-पीछे सब अवरोधित लग रहा होगा , तिरस्कृत मार्ग से बढ़ने के बजाए उन्होंने शायद जिंदगी को बहिष्कृत कर ऊपर की ओर बढ़ जाने का मार्ग चुन लिया , यह पूर्णतः उनका निज भाव रहा होगा। हम लिखते समय उन्हें इस तरह नहीं देख रहे, हम शब्दों की झाड़ियां बनाकर विचारों का अनुचित जंगल पैदा कर रहे हैं , जबकि उनके विचारों से कितनी ही थमती जिंदगियां आज भी सांस ले रही है। भय्यू जी महाराज को कृपया परिस्थिजन्यता से उत्पन्न हालात से समझने की अपेक्षा अपनी तुकतान से जोड़कर निर्रथक संवाद करने से बचिए और कोशिश कीजिये यह देखने की कि वे अपनी संक्षिप्त जिंदगी में कितने सदकार्यो से राष्ट्र और समाज के लिए कितना कुछ कर गए हैं।

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सुरेंद्र बंसल की कलम से 

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