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आपातकाल – चलते जीवन को दखल करने का दोष, सुरेन्द्र बंसल का पन्ना की कलम से

Posted on: 26 Jun 2018 10:57 by Ravindra Singh Rana
आपातकाल – चलते जीवन को दखल करने का दोष, सुरेन्द्र बंसल का पन्ना की कलम से

25जून 1975 को देश एक काले दिन की तरह याद करता है। जब सत्ता में बैठे लोगों को जन जागरण का डर सताने लगा तो इस आपात स्थिति से निबटने के लिए रातों रात आपातकाल लगा दिया गया।

मतलब सत्ता के लिए निर्मित आपात् परिस्थितियों से भयमुक्त होने के लिए लगाया गया आपातकाल। 19 महीने इस देश ने ऐसी निरंकुश व्यवस्था देखी और भोगी है जो तंत्र की सारी लोकलाज़ और मर्यादा को तोड़कर भय, दबाव,ज्यादतियों के तहत बेखबर चलती रही।

उन दिनों अपन लड़कपन में थे स्कूल से कॉलेज में प्रवेश किया ही था विज्ञान विषय था । कॉलेज के इस प्रवेशकाल में ही आपातकाल का सामना हुआ। महसूस हो रहा था सामान्य जीवन एक अनियंत्रित दाब के तले चल रहा है और जिसके पास जो कुछ पावर है उसका वह बेज़ा इस्तेमाल कर रहा है।

आपातकाल की यह टीस आज भी कायम है आखिर चलते जीवन को दखल करने का दोष आपातकाल पर ही है।

surendra bansal

सुरेन्द्र बंसल

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