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दिल्ली में जनगणना से पहले बंदर गणना की नौबत !

Posted on: 12 Jul 2019 09:40 by Mohit Devkar
दिल्ली में जनगणना से पहले बंदर गणना की नौबत !

इसे किसी और संदर्भ में न भी देखें तो देश की राजधानी नई दिल्ली में ( दो साल बाद होने वाली) जनगणना के पहले वानर (बंदर) गणना की नौबत आन पड़ी है। दिल्ली प्रदूषण के अलावा आज जिस गंभीर समस्या से जूझ रही है, वह हैं बंदर। मामला इस हद तक संगीन हो चुका है कि बंदरों को काबू करने के तमाम तरीके विफल होने के बाद अब बात उनकी बाजाब्ता ‍गिनती तक आ गई है। गरज यह कि बंदरों पर कोई ठोस कार्रवाई हो, इसके पहले यह तो पता चले कि इस ऐतिहासिक शहर में आखिर (पूंछ वाले) बंदर हैं कितने? वैसे भारत उन अनोखे मुल्कों में है, जहां देश और प्रदेशों की भी राजधानियां किसी न किसी प्राणी समस्या से त्रस्त हैं। दिल्ली के बरक्स भोपाल की बात करें तो यहां बंदर उतने पावरफुल भले न हों, लेकिन आवारा कुत्तों का टेरर है।

बहरहाल करीब दो करोड़ की आबादी और देश की राजनीतिक-प्रशासनिक धड़कन दिल्ली के सामने बड़ा मसला बंदरों का है। आजादी के बाद यहां मनुष्यों के साथ-साथ बंदरों की आबादी भी बढ़ती गई है। यानी दिल्ली जितनी दिलवालों की है, उतनी ही बंदरों की भी है। ऐसा शायद ही दुनिया में किसी और देश की राजधानी में होता होगा। यहां बंदर कई बार हिंसक हो जाते हैं। बाकी ‘बंदरगिरी’ ‘तो आम बात है। बंदरों पर काबू पाने में नाकामी की वजह इस मामले में सरकारी एजेंसियों का एक न होना भी है। अभी भी तय नहीं है कि बंदरों पर नकेल कसने का काम दिल्ली नगर निगम का है या वन विभाग का। इस झमेले में जो थोड़े बहुत बंदर पकड़ू विशेषज्ञ हैं, वो भी काम ठीक से नहीं कर पा रहे हैं। कहने को बंदरों को पकड़ने में दिल्ली में करोड़ो खर्च भी हो गए, लेकिन बंदरों की सेहत पर इसका कोई असर शायद ही पड़ा हो। वो अपनी जिंदगी उतनी ही उद्दंडता और बिंदास तरीके से जी रहे हैं। बंदरों पर नियंत्रण का यह गंभीर मामला दिल्ली हाई कोर्ट तक गया था।

हाई कोर्ट ने बंदरों को पकड़ने के लिए दिल्ली के तीनों नगर निगमों को ‍पिंजरे उपलब्ध कराने ( यह काम भी कोर्ट को करना पड़ता है) तथा इन पिंजरों को अलग-अलग स्थानों पर रखने के निर्देश दिए। तीनों नगर निगमों की बैठक के बाद खुलासा हुआ कि पहले यह तो पता चले कि शहर में आखिर बंदर हैं कितने ? तय हुआ कि यह बंदर गणना देहरादून स्थित वाइल्डलाइफ इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया की मदद से की जाए। हालांकि यह काम आसान नहीं है। क्योंकि जिस देश में राजनीतिक पार्टियां अपने कार्यकर्ताओं पर भी कंट्रोल नहीं पर पातीं, वहां बंदरों की ठीक ठीक गिनती हंसी खेल नहीं है। हालांकि इसके पूर्व दिल्ली से करीब 23 हजार बंदर रिहायशी इलाकों से पकड़कर पास के असोला अभयारण्य में भेजे जा चुके हैं। लेकिन अभी भी सैंकड़ों बेलगाम बंदर रिहायशी इलाकों में डेरा डाले बताए जाते हैं।

यूं ‘बंदर’ शब्द में ही स्वच्छंदता, अराजकता और मन मौजीपन का भाव छिपा है। इसी के साथ बंदर उन्मुक्त आनंद का प्रतीक भी हैं। भारत में बंदरों को कानूनी संरक्षण मिला हुआ है। वे हनुमानजी का वशंज होने के नाते धार्मिक आस्था का प्रतीक भी हैं। ऐसे में बंदरों से निजात पाने के दो ही तरीके हैं। या तो उत्पाती बंदरों को पिंजरों में बंद किया जाए या फिर उनका वंध्याकरण हो। इस बारे में पशु प्रेमी एक्टिविस्टों का नेक सुझाव है कि बंदरों को मारने के बजाए नसबंदी कर उनकी आबादी पर अंकुश लगाया जाए। लेकिन पेच यह है कि जिस देश में इंसानी आबादी ( जिसका राजनीतिक अर्थ वोट होता है) पर ही नियंत्रण नहीं हो पा रहा है, वहां बंदरों की क्या बिसात। यूं कहने को देश में बंदरों के बधियाकरण वैक्सीन पर भी काम हो रहा है, लेकिन इसे बनने में अभी तीन-चार साल लगेंगे। इसे लगाने में भी प्रति बंदर कम से कम डेढ़ हजार का खर्च पड़ेगा। तब तक देशी उपायों पर ही निर्भर रहना होगा। हालांकि बंदरों को पिंजरे में कैद करना भी कारगर उपाय नहीं हैं। क्योंकि कैद रहना उनका स्वभाव नहीं है। एक और उपाय शहरों में ऊंची दीवार खड़ी करने का है, लेकिन जब हनुमानजी लंका की दीवारें फांद गए थे तो यहां बंदरों के लिए दीवार लांघना मामूली बात है। एक सुझाव बंदरों को जिंदा पकड़ने का भी है। लेकिन इस मामले में हमारे नगर निगम कर्मी बंदरों और कुत्तों की होशियारी और फुर्ती से हमेशा मात खाते रहे हैं।

अपने देश में बंदरों की तादाद करीब 5 करोड़ बताई जाती है। आम तौर पर बंदर जंगलों में ही रहते हैं, लेकिन जब इंसानी आबादी ही जंगलों में घुस गई हो तो बंदर अपने आप रिहाइशी इलाको में रहने पर मजबूर हुए हैं। बदलती मानव सभ्यता के साथ बंदरों ने भी अपनी आदतें बदली हैं। वे अब शहरों में भी उसी दमदारी से रहने लगे हैं, जैसे बीच शहर में झुग्गियां या गुमठियां तनती हैं। फर्क इतना है कि झुग्गियां-गुमठियां रोजगार के साथ-साथ राजनीतिक लाभांश भी देती हैं, जबकि बंदरों का यह शहर-क्रमण केवल पेट और आजादी की खातिर होता है। गनीमत मानिए कि बंदरों को वोट का अधिकार नहीं है, ऐसा होता तो दिल्ली तो क्या किसी भी शहर से उन्हें बाहर करने के बारे में सोचना भी नामुमकिन होता।

यहां सवाल यह है कि जिन बंदरों को हिंदू आस्था से हनुमान का वशंज मानते हों, जो बंदर बच्चों के कौतुक का विषय रहते आए हों, जो बंदर सदियों तक मदारियों की आजीविका का आधार रहे हों, विज्ञान जिन बंदरों को मनुष्य का पूर्वज मानता हो, पर्यावरण एक्टिविस्ट जिन्हें कुदरत की अनुपम देन मानते हों, उन्हें ही हमे हमारी बस्तियों से बाहर खदेड़ने की नौबत क्यों आ रही है? एक तरफ हमारा पर्यावरण प्रेम और उसे संरक्षित करने का आग्रह है तो दूसरी तरफ वन्य प्राणियों से तौबा करने की नौबत है। ऐसा क्यों है? इसलिए कि हम अपनी बस्तियां बसाने के लिए प्राकृतिक प्राणियों से उनके नैसर्गिक आवास बेशरमी से छीन रहे हैं। हमें‍ सिर्फ अपनी चिंता है। मानो पृथ्वीो, प्रांत, शहर, बस्ती या प्लॅाट सिर्फ हमारी बपौती हो। इसमें किसी और के जगह और के लिए जगह है ही कहां? फिर ये तो बंदर हैं…!

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