बाला

कुदरत ने हर एक इंसान को बहुत सी नेमतें बरती हैं फिर भी कुछ लोग अपनी किसी ना किसी कमी को लेकर परेशान होते हैं और जब मामला ज़ुल्फ़ों का हो तो क्या कहना।

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कुदरत ने हर एक इंसान को बहुत सी नेमतें बरती हैं फिर भी कुछ लोग अपनी किसी ना किसी कमी को लेकर परेशान होते हैं और जब मामला ज़ुल्फ़ों का हो तो क्या कहना। बुंदेलखंड के गौरव और ओरछा की शान कवि केशव दास बहुत पहले ही “केशव केसन अस करी” कह के इंसान के लिए बालों के महत्व को बता चुके हैं और बशीर बद्र साहब भी कहते हैं “ फिर याद बहुत आएगी ज़ुल्फ़ों की घनी शाम , जब धूप में साया कोई सर पे ना मिलेगा”। बालों का साया जब सर पे ना हो तो नवजवानों को कैसी कैसी मुसीबतों का सामना करना पड़ सकता है इस वाक़ये पर ही बनी है अमर कौशिक की कामेडी से भरपूर फ़िल्म “बाला” जिसमें आयुष्मान खुराना के साथ मुख्य भूमिकाओं में हैं भूमि पेंढारकर और यामी गौतम।

फ़िल्म की कहानी कुछ यूँ है की बाल मुकुंद उर्फ़ बाला शुक्ला ( आयुष्मान ) बचपन में अपनी दोस्त लतिका ( भूमि ) के नोट्स ले कर कर लड़कियों पे अपना रोब झाड़ता है और जब लतिका उसे पकड़ लेती है तो उसे उसके काले रंग का ताना देकर अपनी खीज निकालता हुआ अपने सुदर्शन व्यक्तित्व से उसकी तुलना करता है। संयोग से व्यक्तित्व तो बहु प्रतिभाशाली बना रहता है पर जवान होते होते बाल उड़ने लगते हैं। बाला एक कम्पनी में लड़कियों को गोरा बनाने की दवा बेचने की मार्केटिंग करता है लेकिन ख़ुद के गंजेपन से परेशान रहता है। इससे निपटने के लिए बाला सैकड़ों जतन करता है पर नतीजा सिफ़र ही रहता है। बाला का पिता हरी ( सौरभ शुक्ला ) घरजँवाई है और वो भी गंजा है। कभी कभी अपने गंजे पन का दोष बाला उस पर भी डालता है। बाला का एक दोस्त है जो नाई है ( अभिषेक बेनर्जी ) और पिता के कहने पर बाला उससे विग लगवाता है।

विग लगाने के बाद बाला का स्वरूप ही बदल जाता है और उसे फिर अपने केरियर में प्रसिद्धि मिलने लगती है और तभी उसकी मुलाक़ात कम्पनी की माडल परी ( यामि गौतम ) से होती है जो टिक टाक वीडियो बनाने की शौक़ीन है। नक़ली बालों को लगाए हरफ़नमौला बाला पर परी फ़िदा हो जाती है और दोनों शादी करने की सोचने लगते हैं। बाला सोचता तो है की शादी से पहले उसे सच्चाई बता दे पर किन्ही कारणों से ये टलता जाता है और उसके गंजेपन पता परी को शादी के दूसरे दिन चलता है। परी इस धोखाधड़ी से चिढ़ कर उस पर मुक़दमा ठोक देती है और बाला के पास यही विकल्प रहता है की वो अपनी बचपन की मित्र लतिका जो अब वकील हो गयी है की मदद ले। क्या इस मुक़दमे में बाला उसे वापस पा पाता है या अपनी बचपन की मित्र से ही उसका जुड़ाव जुड़ जाता है इस सब के लिए आपको ये फ़िल्म देखनी होगी।

अमर कौशिक इसके पहले राजकुमार राव के साथ स्त्री बना चुके हैं और उनकी फ़िल्म में एक संदेश हमेशा रहता है। भूमि जो इस फ़िल्म में वकील बनी है उससे तब बड़ी पते की बात कहती है जब वो अपनी गोरे होने की क्रीम बेच रहा होता है की बदलना क्यूँ है हमें हम जैसे हैं वैसे ही अच्छे हैं और फ़िल्म के क्लाईमेक्स में ये संदेश आयुष्मान ख़ुद देता है की ईश्वर के इस संसार में हर एक में कुछ ना कुछ कमी रहती है कोई मोटा है कोई दुबला है कोई नाटा है कोई लम्बू है कोई काला है कोई चितकबरा पर शरीर के रंग रूप और बनावट से इंसान में कमी बेशी नही होती है। ईश्वर ने उसे जैसा शरीर दिया है उसे उसे वैसा ही स्वीकार करना चाहिए और ख़ुश रहना चाहिए क्योंकि व्यक्तित्व का निर्माण शरीर के आकार प्रकार या रंग रूप से नहीं बल्कि गुणों से होता है।

मुझे याद आता है हमारी प्रशासनिक सेवाओं में भी अनेक ऐसे अफ़सर हैं जिनके बाल जवानी में ही उड़ गए थे पर वे इससे परे अपने काम के लिए जाने गए। फ़िल्म में भूमि और यामी दोनों ने ही अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है, बल्कि यामी ने भूमि को टक्कर ही दी है। सौरभ शुक्ला और अभिजीत बनर्जी फ़िल्म में छाए हुए हैं और फिर जावेद जाफ़री हैं लेकिन फ़िल्म है आयुष्मान की, वे इसमें छाए हुए हैं, हर एक दृश्य पर वे आपके ज़ेहन पर छाए रहते हैं। कुल मिलाकर हर कलाकार एकदम फ़िट है अपने रोल में और इन सब का संयोग ऐसा है की आप कह सकते हो की बड़े दिनों बाद ऐसी ग़ज़ब की कामेडी फ़िल्म देखी है।
लेखक आंनद शर्मा

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