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बाबा रामदेव की ‘नेक सलाह’ और गृहस्थ हिंदू का धर्म संकट..?

Posted on: 05 Nov 2018 10:20 by Pinki Rathore
बाबा रामदेव की ‘नेक सलाह’ और गृहस्थ हिंदू का धर्म संकट..?

लगता है योग गुरू बाबा रामदेव और हिंदू संतान वादियों के बीच कम से कम एक मुद्दे पर ठन गई है। बाबा रामदेव ने हरिद्वार में एक कार्यक्रम में फरमाया ‍कि जो हिंदू दो से ज्यादा बच्चे पैदा करे, उससे वोटिंग का ‍अधिकार वापस ले लेना चाहिए। साथ ही मेरी तरह जो व्यक्ति शादी न करे, उसका विशेष सम्मान होना चाहिए। बाबा ने एक तार्किक बात भी बोली। उन्होने कहा कि ‘पुरातन काल में जनसंख्या कम थी तो वेदों में तो 10-10 संतानें पैदा करने तक कहा गया। अब तो वैसे ही देश की आबादी 125 करोड़ से ज्यादा है…!’ कुछ लोगों का कहना है कि बाबा ने यह बात मजाकिया अंदाज में कही। यानी वो ऐसा चाहते तो नहीं थे, लेकिन फिर भी ‘हिंदू समाज के व्यापक हित’ के मद्देनजर यह सलाह दे गए। बाबा की सलाह इसलिए भी चौंकाने वाली है कि बाबा की दवा कंपनी ‘पतंजलि’ खुद ‘पुत्र जीवक बीज’ नामक आयुर्वेदिक औषधि बेचती है। जिसके सेवन से महिला को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। हालांकि इस बारे में पंतजलि की सफाई यह है कि दवा संतानोत्पत्ति के लिए है न कि पु‍त्र रत्न के लिए।

बहरहाल मुद्दा यह है कि बाबा ने हिंदुअों को कम बच्चे पैदा करने की समझदारी भी सलाह क्यों दी? क्या इसके पीछे कोई दूरंदेशी है या फिर मोदी सरकार और हिंदू संगठनों से कोई नाराजी है? बाबा का बयान इसलिए भी हैरत में डालने वाला है, क्योंकि केन्द्र में मोदी सरकार सत्ता में आने के एक साल पश्चात और वर्ष 2011 में देश में हुई जनगणना के आंकड़ों का विश्लेषण सामने आने के बाद भरतखंड में कई हिंदू नेता अपने हिंदू भाइयों को पूरी ताकत से आबादी बढ़ाने की सलाह देने में जुट गए थे। सबसे पहले विहिप के पूर्व अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष ( अब संगठन से निकाले गए) प्रवीण तोगडिया का बयान आया कि हिंदू जब तक संगठित नहीं होगा, तब तक हिंदुओं के साथ अन्याय होता रहेगा। ऐसे में हिंदू की आबादी बढ़ना अति आवश्यक हो गया है। वे ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करें। ऐसा न हुआ तो मुसलमान हिंदुअोंपर हावी हो जाएंगे। अखिल भारतीय हिंदू महासभा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष साध्वी देवा ठाकुर ने चेतावनी दी कि दूसरे धर्म के लोग 8 से 10 बच्चे पैदा कर अपनी जनसंख्या को बढ़ाने में लगे हुए हैं। गजब तब हुआ जब नागपुर में आयोजित धर्म संस्कृति महाकुंभ’ में हिंदुअों से 10-10 बच्चे पैदा करने का आह्वान किया गया ताकि देश में हिंदुओं की संख्या बढ़ाई जा सके। स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती ने कहा कि हिंदू बेझिझक 10-10 पैदा करें। इन्हें भगवान पालेगा। इसी साल आगरा में आयोजित एक कार्यक्रम में संघ प्रमुख ने भी देश में हिंदू आबादी घटने पर चिंता जताई और ज्यादा बच्चे पैदा करने की सलाह दी। ऐसे कई बयानों की प्रतिक्रिया में जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी नेता मोहम्मद कासिम ने मुसलमानों से कहा कि वे एक से ज्यादा शादियां और ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करते रहें ताकि राज्य में उनकी बहुसंख्या बनी रहे।

मजे की बात यह है कि हिंदू क्या करें क्या न करें, यह तय करना अब आम हिंदू के हाथ में नहीं रह गया है। बावजूद इसके कि हिंदू समाज जितना परंपरावादी है, उतना ही समय के ‍िहसाब से बदलने की भी पूरी कोशिश करता है। बच्चे पैदा करने और कितने करने के मामले में भी आम हिंदू की सोच समय सापेक्ष और अपनी चादर के हिसाब से पैर फैलाने की रहती है। क्योंकि वह बच्चों का रेवड़ हांकने की बजाए उन्हें पाल पोस कर बड़ा करने और बड़ा बनाने में ज्यादा यकीन रखता है। लेकिन लगता है कि प्रजनन जैसा यह नितांत निजी कर्म भी धार्मिक फतवों से संचालित होने लगा है। हालांकि एक हिंदू दंपति ठीक-ठीक कितने बच्चे पैदा करे, इसको लेकर भी साधु-संतों में एका नहीं है। पिछले दिनों भाजपा नेता साध्वी प्राची ने एक कार्यक्रम में कहा कि ‘प्रत्येक हिंदू 4 बच्चे पैदा करे, 40 पिल्ले नहीं। इसका अर्थ यह हुआ ‍कि अगर कोई हिंदू स्वामी वासुदेवानंद के ‍िहसाब से 10 बच्चे पैदा करेगा तो साध्वी प्राची के मुताबिक बाकी के 6 पिल्लों की श्रेणी में होंगे। ज्यादा बच्चे पैदा करने के इन बयानों पर कुछ राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी आईं। मसलन बसपा’ सुप्रीमो मायावती ने पूछा है कि ‘‘यदि हिंदू अधिक बच्चे पैदा करना शुरू कर देंगे तो क्या भाजपा उन्हें नौकरियां देगी?’ सपा नेता आजम खान ने कहा कि ऐसी सलाह तो ‘शहंशाह’ ( मोदी) को देनी चाहिए।

बुनियादी सवाल यह है कि आखिर हिंदुअों को यह जनसांख्यिकीय सलाह अथवा चेतावनी देने का क्या मतलब? बताया जाता है कि इसकी बुनियाद में वो आंकड़े हैं, जिनमें हिंदुअोंकी जनसंख्या को तुलनात्मक रूप से घटता हुआ बताया गया है। अगर वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़े देखें तो देश कुल आबादी में हिंदुअों का प्रतिशत 79.80 और मुसलमानों का 14.23 है। लेकिन हिंदुअों की आबादी घटने के पीछे वह 1951 की जनगणना की वह तुलनात्मक स्थिति है, जिसमें कुल जनसंख्या में हिंदुअों की आबादी 84.5 तथा मुसलमानों की 9.8 आबादी 9.8 प्रतिशत थी। यानी‍ प्रतिशत के हिसाब से हिंदुअों की आबादी देश में घटी और मुसलमानों की बढी। लेकिन यही आंकड़े अगर आबादी की वृद्धि दर में नापें तो हिंदुअों के साथ-साथ मुसलमानों की आबादी वृद्धि दर भी घटी ही है। यानी कि 1991-2001 के दशक में देश में मुसलमानों की आबादी वृद्धि दर 29.52 थी, जो 2001-2011 के दशक में घटकर 24.6 रह गई। इसी दशक में हिंदुअों की आबादी वृद्धिं दर भी कम होकर 16.82 रह गई है। हिंदू आबादी घटने के पीछे एक चिंता यह भी है कि जिन क्षेत्रों में हिंदू अल्पसंख्यक हुए, वहां अलगाववादी ताकतें सक्रिय हो गईं। देश के धर्म के आधार पर बंटने का खतरा बढ़ा। इसीिलए हिंदुअो से कहा जा रहा है कि वे कुछ भी करें, लेकिन ज्यादा बच्चे जरूर पैदा करें ताकि बाकी दूसरे मामले में वो कहीं भी रहें लेकिन आबादी वृद्धि की दौड़ में पीछे न छूट जाएं।

अब बहुसंख्यदक हिंदुअोंकी परेशानी यह है कि आबादी बढ़ाने की तमाम नेक सलाहें उन हल्कों से आ रही हैं, जिनका बच्चे पैदा करने जैसे निहायत सांसारिक और प्राणी मात्र के नैसर्गिक कर्तव्य से कोई खास लेना-देना नहीं है। इन ‘सलाहकारों’ का इस महत कार्य में कोई जैविक योगदान भी नहीं है। तो फिर अकेला गृहस्थ हिंदू आज की कठिन आर्थिक और सामाजिक परिस्थि‍ितयों में इस चुनौती को कैसे और किस के दम पर स्वीकार करे? वह देश की फिकर करे या फिर अपने बच्चों की परवरिश की चिंता करे? भगवान पर भरोसा रखें अथवा अपने ‘पुरूषार्थ’ की सीमा ंमें हिंदुत्व को बचाने का आह्वान स्वीकार करे? अपने गृहस्थ धर्म की लाज रखे या धर्म की खातिर ‘पिल्लों’ की फौज पाल कर खुश हो? इस ‘सलाह’ के राजनीतिक संदेश को बूझे या फिर अपनी पारिवारिक हैसियत को यह सोच कर दावं पर लगाए कि वह बचे न बचे धर्म तो बचेगा?

आम हिंदू के ‍िलए यह समझना भी मुश्किल है कि बाबा रामदेव की सलाह सामयिक और व्यावहािरक है या स्वामी वासुदेवानंद की दूरदर्शी नसीहत भविेष्य की दृष्टि से ज्यादा आश्वस्तिकारक है? सरकारी ‘परिवार ‍िनयोजन’ में उसका भविष्य ज्यादा सुरक्षित है अथवा सन्यासियों और अविवाहितों की सुलझी सलाह में उसका आज महफूज है। हिंदू के सामने यक्ष प्रश्न यही है कि वह धर्म और धर्माधिकारियों के ‍िलए जीए या धर्म के हिसाब से जीए? वह देश को बचाने के लिए जीए या फिर यह भूल कर जीए कि वह बचेगा तो ही देश और धर्म बचेगा?

 

अजय बोकिल की कलम से 

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