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दोनों ही दल और उनके समर्थकों में कहीं खुशी तो कहीं गम है

Posted on: 01 Mar 2019 18:28 by mangleshwar singh
दोनों ही दल और उनके समर्थकों में कहीं खुशी तो कहीं गम है

डॉ सुभाष खंडेलवाल की कलम से

पिछले सप्ताह भर से भाजपा और उनके समर्थकों की कहीं छुपी तो कहीं उजागर खुशियां उनके चेहरों पर पढ़ी जा सकती हैं। इसमें देशभक्ति का प्रेम दिखता है, तो उससे ज्यादा गुरुर भी दिखता है। सबसे ज्यादा वोट से देश में सत्ता की लाटरी का टिकट नंबर खुलने वाला दृश्य दिखता है। जिसकी पुष्टि येदुरप्पा कर रहे हैं। कांग्रेस में इससे ठीक उलटा दृश्य उपस्थित है। वहां पर छुपे-छुपे गम हैं। तो कहीं उजागर गम हैं। जो उनके चेहरों पर पढ़े जा सकते हैं। देशभक्ति का प्रेम जिस उत्साह से भाजपा दिखा रही है। कांग्रेस वैसे नहीं दिखा पा रही है। कांग्रेस की स्थिति वैसी है, जैसे उसकी खुली लाटरी का टिकट फट गया है।
दोनों ही दल और उनके समर्थकों में कहीं खुशी तो कहीं गम है। भाजपा इस माहौल का लाभ लेने के लिए चुनाव करवा सकती है। वहीं कांग्रेस दबाव में अपने दबे हुए गुरुर को छोड़कर गठबंधन की ओर अग्रसर हो सकती है। कांग्रेस ने केजरीवाल की गठबंधन की पहल को ठुकराया है। मीडिया ने केजरीवाल से प्रश्न पूछा कि आप कांग्रेस से गठबंधन की पहल कैसे कर रहे हैं। उनका उत्तर था, देश में लोकतंत्र को बचाना ज्यादा जरूरी है।
पिछला गुजरा सप्ताह प्रतिपक्षी दलों को रास्ता दिखा गया है। शहादत और उस पर की गई कार्यवाही ने एक का मनोबल बढ़ाया है, तो दूसरे का घटाया है। आज देश की जरूरत लोकतंत्र है। भाजपा हो या कांग्रेस कोई भी खुदा न बनें। खुदा के बंदे अर्थात् जनता सर्वोपरि रहे। इसी से लोकतंत्र और देश दोनों जिन्दा हैं।

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सेना लड़ती है, सैनिक मरता है, देश लड़ता है, देश मरता है। इस लड़ने मरने में कुछ की कुर्बानी होती है, शहादत होती है। कुछ की दुकान खुलती है, कुछ को सत्ता मिलती है। कुछ की सत्ता छीनती है। आजादी में अंग्रेजों से लड़ाई हो या द्वितीय विश्वयुद्ध कितने ही धन्नासेठों ने कालाबाजारी कर धन कमाया था। कितने ही मुलाजिमों ने अंग्रेजों की नौकरी कर देशवासियों पर हंटर, गोली बरसाए थी। कितने ही रायरत्न, रायबहादुर, जागीरदार, जमींदार, राजा, नवाबों ने अपनी किस्मत चमकाई थी। दौर बदला नहीं है।

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युद्ध लगता है रुक सा गया है। बहुत सो के दिल में ठंडक तो बहुत सो के दिल में दर्द दे गया है। इस ठंडक में देशभक्ति की, एकता की लहर है, जिसने पूरे देश को एक कर दिया था। इसी दर्द में देश पर कुर्बान हुए शहीदों की कुर्बानी और उनके परिवार की हुई ता-जिन्दगी की तकलीफ का दर्द है। तो बहुत सो की अधूरी हसरतें छुपी हुई हैं। वो देशभक्ति की भी है, और सत्ता को चाहने वालों की भी है।
इसका नजारा हम आने वाले कल में देखेंगे। जब युद्ध का अनुशासन नहीं होगा। लोकतंत्र का महापर्व चुनाव होगा। जो सामने है, वो पूरा सच नहीं है, वो तो आना बाकी है। एक चेहरे पे कही चेहरे लगा लेते हैं लोग, यह हमारे लोकतंत्र की विडम्बना है, लेकिन ये पब्लिक है सब जानती है, यह हमारे लोकतंत्र की उपलब्धि भी है

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