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अटल, आडवाणी और मुरलीमनोहर जोशी को किनारे कर देना कौनसी संस्कृति है? | Atal, Advani and Murli Manohar Joshi, what kind of culture is there to shore?

Posted on: 10 Apr 2019 16:24 by Mohit Devkar
अटल, आडवाणी और मुरलीमनोहर जोशी को किनारे कर देना कौनसी संस्कृति है? | Atal, Advani and Murli Manohar Joshi, what kind of culture is there to shore?

नीरज राठौर

यह एक नयी संस्कृति है जो भारतीय संस्कृति से बिलकुल अलग है | लेकिन हमें यह स्वीकार ही लेना चाहिए कि अब यही संस्कृति हम भारतीयों पर हावी है | किसी पार्टी के संस्थापको को किनारे कर देना कौन सी संस्कृति है ?
पहले हम भारतीय सनातन यानि प्राकृतिक संस्कृति का अनुसरण करते थे क्योंकि हमारी शिक्षा ऋषियों के गुरुकुलों में हुआ करती थी | उस शिक्षा का परिणाम यह था कि हम संयुक्त परिवार में भी सुखी जीवन जी लेते थे | फिर समय बदला और एकल परिवारों का चलन चल पड़ा | अब एकल परिवारों में भी अनबन होने लगी तो व्यक्ति अकेला ही रहना पसंद करने लगा | यहाँ तक तो ठीक है, लेकिन जब हम बात बड़े परिवार की करते हैं, तब यह ठीक नहीं है |

जैसे एक संस्था या राजनैतिक पार्टी जो समाज सेवा तो कुछ करती नहीं, लेकिन टैक्स में सौ प्रतिशत छूट लेती है स्वयं को समाज सेवी संस्था बताकर | अब ऐसी संस्थाओं के संस्थापक सदस्यों को ही जीते जी उठाकर बाहर फेंक दिया जाए, इससे बड़ी शर्म की कोई बात नहीं संस्था के लिए | लेकिन आजकल यह भी चलन में आ गया | बीजेपी ने अपने घोषणा पत्र में सिर्फ एक आदमी का बड़ा फोटो छापा है, इससे कई लोग आहत हो चुके है|

एक शिष्य कभी भी अपने गुरु का स्थान नहीं ले सकता, चाहे गुरु कितना ही कमीना, धूर्त, मक्कार ही क्यों न हो | क्योंकि शिष्य गुरु की सत्ता हथियान नहीं, अपने ही आस्तित्व के खोज में गुरु के पास आता है | गुरु से वह अपनी योग्यता, अपने महत्व के विषय में जानता है, सीखता है | और उसके बाद वह अपनी अलग आगे की यात्रा पर निकल पड़ता है | जैसे ओशो का शिष्य बोधिधर्मन चीन निकल गया | उसने वहां बौद्ध धर्म की स्थापना की नए रूप में | उसने मार्शल आर्ट्स जोड़ा, बौद्ध ध्यान विधियों में और नया रूप दिया | लेकिन बुद्ध को हटाकर उसने बौद्धधर्म को नया नाम नहीं दिया और न ही उसने अपने गुरु का मान ही कम होने दिया |

लेकिन आधुनिक शिष्य सीधे गुरु की ही सत्ता हथियाने की जुगत लगाने लगते हैं | यही कारण है कि मैं शिष्य नहीं बनाता | अनावश्यक रूप से कोई उपद्रव नहीं पालना चाहता | वैसे भी आजकल शिष्य गुरु के लिए सहयोगी नहीं होते, उलटे गुरुओं पर ही बोझ बनते हैं, गुरुओं की ही टांग खींचकर गिराने के चक्कर में लगे रहते हैं | क्योंकि हर शिष्य को यह भ्रम हो जाता है कि वह गुरु से अधिक योग्य है |बीजेपी में यही हुआ, नया नेतृत्व किसी की भी सुनना नहीं चाहता, वो सिर्फ सुनाना चाहता है.

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