इस समय एक प्रतियोगिता जबर्दस्त तरीके से चल रही है। जनसाधारण को बेवकूफ कैसे बनाया जाए?

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ऋषिकेश राजोरिया

इस कार्य में आश्चर्यजनक रूप से राजनीतिक और धार्मिक नेता भी शामिल हो गए हैं। राजनीतिक fc नेता अच्छी सरकार देने के नाम पर जनता को बेवकूफ बनाते हैं और धार्मिक नेता ईश्वर से साक्षात्कार करवाने, आत्मा का दर्शन करवाने, मन की शांति आदि के नाम पर जनता को बेवकूफ बनाते हैं। और जनता बेवकूफ बन भी जाती है। जनता को बेवकूफ बनाते हुए अपनी रीति-नीति चलाने का काम अंग्रेजों ने दुनिया भर में शुरू किया था।

जिन देशों पर उन्होंने शासन किया था, और जिन देशों को वे लोकतंत्र स्थापित करते हुए स्वतंत्र कर गए थे, उनमें भारत सबसे बड़ा देश था। भारत के महत्वाकांक्षी नेताओं ने उनकी रीति नीति को अच्छी तरह से आत्मसात कर लिया है। और जनता लगातार ठगी जा रही है। धर्म के नाम पर पचासों संस्थाएं बन गई हैं, जिनमें जमकर व्याभिचार होता है और माल बटोरने की प्रतियोगिता चलती है। मंदिर और मठ व्यावसायिक उपक्रम के रूप में चलने लगे हैं। तरह-तरह के आश्रम, दरबार आदि अस्तित्व में आ गए हैं, जो जनता की आस्था तय करते हैं। आसाराम, गुरमीत राम रहीम इसके उदाहरण है, जो इन दिनों बलात्कार के अभियुक्त होकर जेल में हैं। और भी कई तथाकथित संत और धार्मिक संस्थान इस देश में हैं, जिनका आध्यात्मिकता से कोई लेना देना नहीं है।

वे भौतिक और सांसारिक तरीके से संचालित होते हैं। उनमें उत्तराधिकारी की नियुक्ति वंश के आधार पर होती है। आसाराम की कंपनी का मालिक उसका बेटा नारायण साईं है। अगर उसको भी जेल हो गई तो उसकी बेटी भारती कंपनी का कारोबार संभाल लेगी। धर्म के नाम पर ऐसी कई कंपनियां हैं। जो भी बोला जा रहा है, लिखा जा रहा है, उसमें कितना सत्य है, कितना असत्य, कोई हिसाब किताब नहीं है। धर्म के नाम पर अधर्म का बोलबाला है।

यही राजनीति करने वाले नेताओं का हाल है। वे नहीं जानते कि देश को आजाद कराने के नाम पर कितने लोगों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। देश पूरी तरह आजाद तो नहीं हुआ, लेकिन नेताओं का वर्चस्व अवश्य स्थापित हो गया। अब ये नेता सत्ता पर कब्जा करने के बाद जनता से कहते हैं कि देश आजाद है, हम सरकार चला रहे हैं और जो हम कहते हैं वह करो।

मतलब यह कि जनता में न तो कोई अक्ल है और न ही समझदारी। उसे सिर्फ यह करना है कि जब भी, जो भी चुनाव हो, उसमें अपना वोट डाल देना है। वोट डालने के लिए कतार में लगकर यह साबित करना है कि देश में लोकतंत्र जीवित है। क्या इसी लोकतंत्र के लिए स्वतंत्रता आंदोलन में इतनी कुर्बानियां दी गई थी?

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