8 घंटे प्रवचन सुनने के बाद मैंने उसका नाम रखा निराशाराम

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इंदौर : आसाराम…पहली मुलाकात में मैंने तुम्हारा नाम रखा था….निराशाराम। तुमसे पहली मुलाकात भुलाए नहीं भूलती। मैं 10 वीं में थी, छिंदवाड़ा से इंदौर में कदम ही रखा था। उस समय इंदौर में तुम्हारा बोलबाला था। मेरे बब्बाजी(दादाजी) जबलपुर से इंदौर आए थे…तुम्हारे प्रवचन सुनने। लगातार किताबें पढ़ने और उम्र के तकाजे के कारण उन्हें नेत्रों से थोड़ा कम नजर आने लगा था। इसलिए हम दो बड़ी बहनों में से एक हमेशा उनके साथ रहता था। बब्बा जी को जाना था, मामला आध्यात्म से जुड़ा था, मैं साथ हो ली। उस समय तक रजनीश की पुस्तकें मेरी सच्ची साथी थी, सोचा इन्हें देखा, सुना जाए…..बस 8 घंटे के उस प्रवचन के बाद मैंने इनका नाम रखा था निराशाराम….Image result for asaram satsangपहली बार जीवन में किसी सत्संग को सुनने गई थी ( ये पहली और आखरी बार था, इसके बाद मैं सुनने नहीं बस कवर करने गई हूं)। बब्बाजी रास्ते भर सत्संग के अच्छे प्रभावों को बताते जा रहे थे। मुझे लगा सत्संग बड़े-बुजुर्गों की किस्सागोई की तरह ही दिलचस्प होगा। हम जब आश्रम पहुंचे तब मैं भीड़ देख चौंक गई, इतनी भीड़ तो मैंने जबलपुर में दशहरे के दिन दुर्गा माँ की शोभायात्रा में भी नहीं देखी थी। मुझे लगा दिन कमाल का होगा…कुछ नया सीखूंगीं। रजनीश के ओरोविले में भी ऐसी ही भीड़ उमड़ती होगी। रजनीश की तरह आसाराम ने भी किताबों का भंडार खा रखा होगा लेकिन-लेकिन-लेकिन….निराशाराम ने बोलना शुरु किया।Image result for asaram jailहिंदुत्व की प्रंचड़ बाते…उदाहरण पृथ्वी राज चौहान और महाराणा प्रताप के। बस यही चूक गए….निराशाराम ने दोनों योद्धाओं का काल मिला दिया……… 🙂 🙂 🙂 और धड़ाम से मेरी नजरों से गिर गए। मैं रजनीश को पढ़ना पसंद करती हूं…बेहद पसंद लेकिन रजनीश जिस विषय पर बोलते थे, उसका अच्छा पाठन, चिंतन औऱ मनन करते थे। ये महाराज यही नहीं जानते थे कि एक बाहरवीं सदि ( पृथ्वीराज चौहान- 1178-1192) एक सोलहवीं सदि ( महाराणा प्रताप 1540 से 1597 ) तक के काल के हैं।

सोचिए कितनों को अपने अज्ञान से अंधकार की तरफ धकेला इस बाबा ने। मैंने घर आकर घोषणा कर दी, मैं नहीं जाने वाली अब सत्संग में, अन्यथा मेरे मुंह से कुछ निकल जाएगा। ऐसे ही एक सहेली अपने परिवार के साथ निराशाराम के दर्शन के लिए गई। सहेली के पिता को अपनी दोनों बेटियों पर बड़ा गर्व था। आसाराम उसके पिता से बोल रहा था….अभी आपकी उम्र ही क्या है। बेटा होना चाहिए….आप चाहे तो मैं पूजा-अराधना करके आपके लिए संतान यज्ञ कर सकता हूं।

सोचिए….सोचिए….सोचिए….हिंदुत्व के नाम पर आप किस का समर्थन कर रहे हैं। क्यों कर रहे हैं। कितने बाबा बनाएंगे हम। कितने पतन की ओर जाएंगे। यूं धर्म-संस्कृति के नाम पर आप अपनी बेटियों को घर में कैद रखें। बहुओं से पर्दा करवाएं और इन कथित महाराजों की गंदी नजरों का निवाला बनने छोड़ दें। नींद खोलिए…हिंदुत्व को खतरा किसी से नहीं। यदि खतरा है तो इन कथित महाराजों से। आसाराम के बाद राम-रहीम….फिर हर गली-नुक्कड़ में पनप रहे बाबा…बचिए इनसे। कुछ ज्ञान पाना है तो इनके पास जाने से अच्छा है अपनी पोथी-पुराण बांचे, इनसे बचे, नई पीढ़ी को बरबाद होने से बचाएं।

श्रुति अग्रवाल

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