आर्टिकल-15… कहब तो लग जाई धक्क से !

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राजेश ज्वेल-
शुरुआती जनवादी भोजपुरी गीत श्कहब तो लग जाई धक्क सेश्..ही फिल्म आर्टिकल-15 की तासीर बता देता है। दूसरा नेपथ्य में बजने वाला बॉब डिलन का गीत ‘ब्लोइंग इन द विंड‘ संघर्ष और मानव अधिकार की पैरवी करता है, जिसमें एक जगह कहा गया है कि आखिर कितने कान होने चाहिए यह सुनने के लिए कि लोग रो रहे हैं…!

हम यानी शिक्षित, सुविधा सम्पन्न और उच्च जातीय और वे यानी हाशिए पर पड़े दलित …जिनके संघर्ष को बड़ी निर्ममता से पर्दे पर उजागर करते हैं अनुभव सिन्हा आर्टिकल-15 में संविधान का अनुच्छेद 15 सबको समानता का अधिकार देता है। मगर असल में जो बात बाबा साहेब ने संविधान सभा के आखरी भाषण में कही थी कि बंधुत्व के बिना स्वतंत्रता और समानता स्वाभाविक रूप से नहीं आएगी और इन्हें लागू करने के लिए एक पुलिस वाले की जरूरत पड़ेगी।

फिल्म में यही काम एक आईपीएस अफसर आयुष्मान खुराना करता नजर आता है। जाति कभी नहीं जाती इस सच्चाई को फिल्म का हर पात्र साबित भी करता है। सवर्ण और दलित का संघर्ष फिल्म के कई दृश्यों में बेबाकी से बयां होता है छुआछूत और भेदभाव की तमाम असलियत आज 21वीं सदी में भी आए दिन हमारे सामने आती हैं। उत्तरप्रदेश में यह लड़ाई ज्यादा रही है, जिसका भरपूर राजनीतिक दोहन हमारे नेताओं ने भी किया है।

यह पहली फिल्म है, जिसमें चुनाव चिन्हों के हवाले से इन दलों की असलियत भी उजागर की गई है। जाट बॉडीगार्ड और ब्राह्मण थाना प्रभारी को दलितों के हाथ का पानी गंवारा नहीं, मगर उनकी बच्चियों से बलात्कार कर लेते हैं। आयुष्मान और उसकी प्रेमिका के बीच जो संवाद एसएमएस के जरिए होता है, उसमें दो बड़ी बातें मार्के की है। पहली यह कि सभी समान हो जाएंगे तो राजा कौन बनेगा? जवाब आता है कि राजा की जरूरत ही क्या है? दूसरी बात ये कि हमें हीरो नहीं, बस ऐसे लोग चाहिए तो हीरो का इंतजार न करे।

आखिरकार पुलिस अफसर ही दो दलित बच्चियों के साथ हुए बलात्कार की गुत्थी सुलझाने और तीसरी गायब दलित बच्ची को बचाने में सफल रहता है। फिल्म के कई दृश्य कंपकंपा देते हैं। मसलन गटर से निकलता इंसानी सिर और दल-दल से गुजरते पुलिस दल के अलावा ठंडी सुबह में पेड़ पर लटकी दो बच्चियों की लाशें। दलित-दमित लोगों की आकांक्षाओं, दुरूख, विषाद और संघर्ष को शानदार तरीके से बयान करती है 2 घंटे 20 मिनट की यह फिल्म सपनीले भारत की तस्वीरों से ज्यादा असल स्याह और धुंधली , कड़वी सच्चाइयों की यात्रा करवाती है।

फिल्म में बिम्बों और प्रतीकों का भी बखूबी इस्तेमाल किया गया है। पुलिस अफसर द्वारा अपने अधिनस्थों से उनकी जातियों को लेकर की गई चर्चा और मरी गाय का चमड़ा छीलने पर दलितों की पिटाई और कुत्तों को बिस्किट खिलाता ब्राह्मण थानेदार, जो जानवरों से तो प्यार करता है मगर निचली जाति से नहीं… जातिवाद की डार्क रियलिटी को देखना उस औकात से भी रूबरू होना है जो आए दिन श्रेष्ठता दिखाने के लिए महसूस करवाई जाती है। कबीर सिंह के हैंगओवर का उतारा आर्टिकल-15 जैसी बेहतरीन फिल्म से ही हो सकता है…!

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