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जन्म दिन विशेष: उच्च शिक्षा में पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने के लिए याद किये जाते रहेंगे अर्जुन सिंह, नीरज राठौर की कलम से

Posted on: 05 Nov 2018 18:33 by Rakesh Saini
जन्म दिन विशेष:  उच्च शिक्षा में पिछड़ा वर्ग को आरक्षण देने के लिए याद किये जाते रहेंगे अर्जुन सिंह, नीरज राठौर की कलम से

विंध्य की माटी के सपूत एक छोटी सी जागीर में जनम लेकर भारत की राजनीति के क्षितिज पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री स्व. कुंवर अर्जुन सिंह जी की यादों का अब अवशेष शेष रह गया है। चुरहट जागीर के राव घराने में 5 नवंबर 1930 को जन्में अर्जुन सिंह बीमारी के बाद राज्यसभा सदस्य रहते हुए 4 मार्च 2011 को इस दुनिया को अलविदा कह गए थे। आज भी भारतीय राजनीति में उन्हे शोषित, दलितों, अल्पसंखयकों एवं पिछड़ा वर्ग के लिए संघर्ष व आरक्षण की मांग को लेकर आवाज उठाने वाला राजनेता के तौर पर याद किया जाता है। जिले में उन्हे दाऊ साहब के नाम से ही पुकारा जाता था।

एक ठाकुर जाति ( सवर्ण समाज ) के होकर भी अर्जुन सिंह जी ने देश की 52 प्रतिशत ओबीसी समुदाय को सन् 2007 में उच्च शिक्षा में पिछड़ी जातियों के लिए रिजर्वेशन देकर सामाजिक क्रांति का सूत्रपात किया था. 2007 से पहले तक उच्च शिक्षा में पिछड़ी जातियों की बहुत ही बदहाल स्थिति थी. ये अर्जुन सिंह जी की ही देन थी कि देश में, आईआईटी, आई आई एम और एमबीबीएस कॉलेजों सहित डीयू, जेएनयू, बीएचयू , इलाहाबाद यूनिवर्सिटी जैसी प्रतिष्ठित वि.वि. में पिछड़ी जाति के विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा हासिल करने का अवसर मिला. आज आईआईटी, आईआईएम से लेकर देश की तमाम यूनिवर्सिटियों में पिछड़ी जाति के जो भी विद्यार्थी दिखाई दे रहे हैं, उसमें अर्जुन सिंह जी का बहुत कुछ योगदान रहा है.

अर्जुन सिंह जी के केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री रहते यूपीए सरकार ने वर्ष 2007 में देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में पिछड़े वर्ग के लोगों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का फ़ैसला किया था. साथ ही आश्वासन दिया था कि पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षित सीटें बढ़ाने के बावजूद सामान्य श्रेणी की सीटों की संख्या में कोई कमी नहीं आएगी।

लेकिन इसके ख़िलाफ़ आंदोलन शुरु हो गए थे. केंद्र सरकार के आरक्षण लागू करने के फ़ैसले का विरोध करते हुए उच्चतम न्यायालय में बहुत सी याचिकाएँ दायर हो गई थीं इनमें यूथ फॉर इक्वालिटी रेज़िडेंट्स डॉक्टर्स एसोसिएशन, ऑल इंडिया इक्विटी फ़ोरम, अशोक कुमार, शिव खेड़ा और पीवी इंद्रसेन शामिल थे.
केंद्र सरकार का कहना था कि क़ानून बनने के बाद कई केंद्रीय संस्थानों ने ओबीसी के लिए आरक्षित सीटों पर दाखिला देने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी. लेकिन कानून पर स्थगन के बाद यह प्रक्रिया रुक गई थी. उच्चतम न्यायालय ने सरकार के आरक्षण देने के फ़ैसले पर रोक लगा दी थी, और बाद में केंद्र सरकार के अनुरोध पर इस मामले को संविधान पीठ को सौंप दिया गया था. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने अन्य पिछड़े वर्गों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने को हरी झंडी दे दी थी। बाद में अर्जुन सिंह ने पत्रकारों से कहा कि बिना प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष के समर्थन के हम इतना आगे नहीं पहुंच पाए होते।

उन्होंने कहा, “हम उच्चतम न्यायालय के आदेश को पूरा पढ़ेंगे क्योंकि अलग अलग न्यायाधीशों ने टिप्पणियां की हैं, जिनको संज्ञान में लेना होगा. इस लिए हम आदेश की कॉपी का इंतज़ार कर रहे हैं.” उनका कहना था कि जहाँ तक उच्च शिक्षा संस्थानों में मूलभूत सुविधाओं की बात करें तो कुछ संस्थानों में ये सुविधा है, कहीं ये नहीं है।

जब अर्जुन सिंह से पूछा गया कि व्यक्तिगत रूप से उनके लिए ये पूरा सफ़र कितना संघर्षमय रहा है, तो उन्होंने कहा कि राजनीति में व्यक्तिगत कुछ नहीं होता, हाँ राजनीतिक संघर्ष ज़रूर रहा है। उन्होंने कहा, “जहाँ तक आरक्षण से क्रीमी लेयर को हटाने की बात है, हम इस पर विचार कर रहे हैं और क्योंकि हमारी गठबंधन सरकार है, वे अपने सहयोगियों से विचार विमर्श करेंगे।”

उल्लेखनीय है की अर्जुन सिंह जी हमेशा उच्च शिक्षण संस्थानों में ओबीसी छात्रों को आरक्षण दिए जाने की वकालत करते रहे थे और आरक्षण देने की घोषणा उनके ही कार्यकाल में हुई थी। देश भर के सैकड़ों यूनिवर्सिटी और हज़ारों कॉलेजों में लाखों ओबीसी स्टूडेंट्स इसलिए पढ़ रहे हैं क्योंकि अर्जुन सिंह ने एडमिशन में ओबीसी कोटा लागू कर दिया।

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