मोदी विरोधी थेरेसा आज दे रहीं इस्तीफा | Anti Modi Teresa may Resigns as Party Leader…

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लंदन से परीक्षित यादव

नई दिल्ली: इंग्लैंड की प्रधानमंत्री थेरेसा आज पद छोड़ रही हैं। विरोध में तो गोरे भी थे, लेकिन बीज भारतीयों की तरफ से ही बोया गया। बार-बार विश्वास मत साबित करने में नाकामयाब रही थेरेसा की नीतियां कारोबारी भारतीयों के लिए नुकसान भरी साबित हो रही थी। राख तो कई दिनों से सुलग रही थी, लेकिन लपटें तब उठी जब 2016 में मंत्री प्रीति पटेल से इस बात के लिए इस्तीफा ले लिया गया कि उन्होंने इजरायल के प्रधानमंत्री से हाथ क्यों मिलाया।

वजह तो कुछ और बताई गई लेकिन सच यही था। अलग-अलग पदों पर काम कर रहे भारतीयों को भी हटाया जाने लगा। यह विरोध संसद से सड़क तक पहुंच गया। ब्रेक्जिट ( यूरोपियन संघ से यूके का अलग होना ) के मुद्दे पर भी थेरेसा को मात खानी पड़ी। वह इसकी हिमायती थी, लेकिन अपने हवा हवाई वादों को जमीन पर नहीं ला पाई। ब्रेक्जिट भी नहीं हो पाया। इस सब ने थेरेसा को तोड़ दिया और आज वह प्रधानमंत्री पद को अलविदा कह रही हैं।

कहा जाता है एंटी मोदी

थेरेसा को एंटी मोदी भी माना जाता है। 23 मई को भारत में मोदी “सरकार” हो गए और 24 मई को बकिंघम पैलेस में थेरेसा के आंसू बह निकले। ऐलान हुआ कि बस अब जा रही हूं। मोदी और पूर्व प्रधानमंत्री डेविड कैमरून के बीच खूब मीठा था। एक ही पार्टी के होने के बावजूद कैमरून और थेरेसा के बीच हमेशा दरार रही। थेरेसा ब्रेक्जिट चाहती थी और कैमरून इसके खिलाफ थे। उन्होंने इसके नुकसान भी लोगों को समझाए थे, लेकिन जब इसके खिलाफ ज्यादा वोट आ गए तो उन्होंने खुद ही प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था।

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान के बीच वही मीठा है जो मोदी और कैमरून के बीच था। थेरेसा को यहां भारतीयों का विरोधी भी माना जाता है। बकिंघम पैलेस के ट्राफलगर स्क्वायर पर दशकों से दिवाली मनाई जाती थी, लेकिन जब से थेरेसा कुर्सी पर पहुंची वहां ईद मनाई जाने लगी। बैसाखी का जश्न भी बंद हो गया। टाटा की वह कंपनी जिसमें हजारों लोगों को यूके में नौकरी पर रखा था उसने भी सामान समेटने का ऐलान कर दिया है। बड़ा हुआ टैक्स और कई कारोबारी मुश्किलों के चलते कंपनी बंद हो रही है। दूसरी कई छोटी कंपनियों ने भी यूके छोड़ने का फैसला कर लिया है।

प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने के लिए बिना सोचे समझे कई वादे कर दिए लेकिन फिर वह अपने ही जाल में उलझ गई। वह ब्रिटेन को “बड़ा “तो बनाना चाहती हैं लेकिन जिद यही है कि हर तरफ अंग्रेजी ही अंग्रेज हों। मजबूरी यह है कि भारतीयों के बिना काम नहीं चल सकता। टेक्नॉलोजी में उनका कोई मुकाबला नहीं कर सकता। यूनिवर्सिटीओं में भी ज्यादातर भारतीय प्रोफेसर हैं। मेडिकल फील्ड में भारतीयों का दबदबा है। यूके के टैक्स में 25 से 30 फ़ीसदी भारतीयों की तरफ से ही जाता है। इस सब ने इस सब ने थेरेसा को उलझा दिया और अब वह “कहीं की नहीं” रही। अगले प्रधानमंत्री की दौड़ में 9 लोग हैं लेकिन सबसे मजबूत दावा बोरिस जॉनसन का ही है। लंदन के महापौर रह चुके हैं और पूर्व प्रधानमंत्री डेविड कैमरून के करीबी माने जाते हैं।

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