द्वापर युग से प्रारंभ हुई अन्नकूट की प्रथा आज भी मनाई जाती है

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माता लक्ष्मी आपको सुख समृद्धि प्रदान करती हैं, उसी प्रकार गाय माता भी अपने दूध से आपको स्वास्थ्य सम्पदा प्रदान करती हैं। इस तरह संपूर्ण गौवंश मानव जाति के लिए पूजनीय और उपयुक्त है। गोवर्धन पूजा का दिन गुजराती नववर्ष के दिन के साथ कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष के दौरान मनाया जाता है।

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अन्नकूट एक प्रकार से सामूहिक भोज का आयोजन है, जिसमें पूरा परिवार एक जगह बनाई गई रसोई से भोजन करता है। मंदिरों में भी अन्नकूट किया जाता है और प्रसाद के रूप में प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।इस दिन चावल, बाजरा, कढ़ी, साबुत मूंग सभी सब्जियां एक जगह मिलाकर बनाई जाती हैं।

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कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रतिपदा के दिन गोर्वधन की पूजा की जाती है और इसके प्रतीक के रूप में गाय की। इसी दिन बलि पूजा, गोवर्धन पूजा होती हैं। गौ के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए ही इस दिन गाय-बैल को स्नान कराकर, फूल माला, धूप, चंदन, मिठाई आदि से उनका पूजन किया जाता है। गायों को मिठाई खिलाकर उनकी आरती उतारी जाती है।

अन्नकूट पूजा भगवान कृष्ण के अवतार के बाद द्वापर युग से प्रारंभ हुई। यह ब्रजवासियों का मुख्य त्योहार है। उस समय छप्पन प्रकार के भोजन बनाकर तरह-तरह के पकवान व मिठाइयों का भोग लगाया जाता था।

इस दिन प्रात: गाय के गोबर से लेटे हुए पुरुष के रूप में गोवर्धन बनाया जाता है। शाम को गोवर्धन की पूजा की जाती है। पुरे विधान से पूजा विधि सम्पन्न होने के बाद गोवर्धनजी की जय बोलते हुए उनकी सात परिक्रमाएं लगाई जाती हैं।

गोवर्धन गिरि भगवान के रूप में माने जाते हैं और इस दिन उनकी पूजा अपने घर में करने से धन, धान्य, संतान और गोरस की वृद्धि होती है। अन्नकूट में चंद्र-दर्शन अशुभ माना जाता है।

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