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… और यूं शुरू हुआ मेरे जीवन का दूसरा पड़ाव, वरिष्ठ पत्रकार नगीन बारकिया की आपबीती

Posted on: 08 May 2018 09:55 by Ravindra Singh Rana
… और यूं शुरू हुआ मेरे जीवन का दूसरा पड़ाव, वरिष्ठ पत्रकार नगीन बारकिया की आपबीती

वर्ष 1981 में यह तारीख मेरे जीवन को नया मोड़ दे गई। यही वह दिन था जिस दिन मैं लड़कपन का पड़ाव खत्म कर गृहस्थ जीवन में प्रवेश के लिए है हय क्षत्रिय कलचुरी समाज नगर सभा इंदौर के अध्यक्ष और प्रसिद्ध कम्युनिस्ट नेता कॉ. मन्नूलाल चौकसे की बेटी मंजूश्री से सदैव के लिए परिणय सूत्र में बंध गया।

आज 37 साल बीतने के बाद भी वे यादें जैसे एकदम ताजा होकर मेरे मन-मस्तिष्क में घूम रही हैं। ऐसा लग रहा है मानो अभी अभी ही यह घटनाक्रम सामने से गुजरा हो। मैं स्वयं भी उसी नगर सभा का प्रचारमंत्री था जिसके अध्यक्ष श्री चौकसे जी थे।

नगर सभा द्वारा सामूहिक विवाह का दूसरा आयोजन किया जाना था, हम सब तैयारियों में जुटे थे। उन दिनों सामूहिक विवाह को हेय दृष्टि से देखा जाता था और उसके बारे में यह आम धारणा थी कि गरीब और अक्षम परिवार के बच्चों के विवाह के लिए ही यह आयोजन किया जाता है।

इसी धारणा के तहत तब यह तंज कसे जा रहे थे कि बड़े लोग और पदाधिकारी ऐसे आयोजन में अपने या अपने बच्चों के शादी ब्याह करके देखे तो जाने। यह बात आयोजन समिति तक पहुंची और लगा कि बात में दम तो है। तब एक बैठक में यह तय किया गया कि इस बार के सामूहिक विवाह में हमारे पदाधिकारी ऐसी कुछ तैयारी करें कि कोई एक जोड़ा शादी के लिए तैयार हो जाए।

इस बात को लेकर सभी में इतनी झिझक दिखाई दे रही थी कि कोई किसी से उनके बच्चे की शादी सामूहिक विवाह में करने की बात कहने की भी सोच नहीं सकते थे। उधर आयोजन की तैयारी भी चल रही थी और धीरे धीरे आयोजन तिथि नजदीक आती जा रही थी। अभी तक दो या तीन जोड़े ही शादी के लिए तैयार हुए थे। ऐसे में अचानक कम्युनिस्ट नेता चौकसे जी ने मेरे समक्ष क्रांतिकारी प्रस्ताव रख दिया। उन्होंने कहा कि यदि तुम मेरे दामाद बनने के लिए तैयार हो तो हम इस सम्मेलन में जोरदार ढंग से समाज को प्रेरणा देने में सफल रहेंगे।

इस प्रस्ताव से अब चौंकने की बारी मेरी थी। मुझे ऐसी कोई अपेक्षा ही नहीं थी। श्री चौकसे एक सक्षम और समर्थ परिवार के मुखिया थे और उनके परिवार को समाज में इंदौर शहर के प्रतिष्ठित परिवारों में गिना जाता था। मैंने इसलिए सोच विचार के लिए कुछ समय मांगा और अपने परिवार में माता पिता से चर्चा की तो उन्हें भी कुछ आश्चर्यजनक ही लगा।

उस समय मैं इंदौर से हैहय क्रांति नामक सामाजिक मासिक पत्रिका का प्रकाशन व संपादन कर रहा था तथा मेरे पारिवारिक सदस्य श्री काशीराम वर्मा उसके प्रधान संपादक थे। श्री वर्मा ने भी मेरी मानसिक स्थिति को समझा और मेरे असमंजस को तोड़ने में मदद की। हालाकि मैंने जब चौकसे जी को जवाब हां में दिया तो उनकी खुशी अलग ही दिखाई दे रही थी।

बस फिर क्या था, यह खबर समाज में और आयोजनकर्ताओं में बिजली की तरह फैल गई और पूरा वातावरण ऩए उत्साह और जोश से भर गया क्योंकि समाज के दो पदाधिकारी शादी में अपनी सहभागिता जो कर रहे थे। देखते ही देखते सामूहिक विवाह में जोड़ों की संख्या 10 और फिर 20 के पार पहुंच गई। हमें खुद को आश्चर्य हुआ जब हमने 27 अन्य जोड़ों के साथ उस सम्मेलन में फेरे लिए। सभी दुल्हा दुल्हन को एक जैसी पोशाक पहनने को दी गई जिसमें दुल्हों को सफारी सूट दिया गया था।

शादी के बाद क्षेत्र में दुल्हा दुल्हन की सामूहिक शोभायात्रा निकाली गई जो किसी घोड़े या बग्घी में नहीं बल्कि टेम्पो में सवार थे। इस तरह बड़े ही अनोखे अंदाज में हमने अपनी जिंदगी का दूसरा पड़ाव शुरू किया।

शाम को आयोजित प्रीतिभोज में हमें आशीर्वाद देने पहुंची हस्तियों में कॉ. पेरीन होमी दाजी, कॉ. रूसी दाजी, कॉ. अनंत लागू, कॉ. हरिसिंह, कॉ. प्रीतम चौकसे, कॉ ओमप्रकाश खटके के साथ ही मेरे पारिवारिक मुखिया पूर्व मंत्री श्री राजेंद्र धारकर, श्रीमती संध्या धारकर, श्रीमती एवं श्री नरेंद्र धारकर, पूर्व विधायक श्री श्रीवल्लभ शर्मा, श्री नारायणराव धर्म, श्रीमती सुमित्रा महाजन, श्री विष्णुप्रसाद शुक्ला बड़े भैया, तत्कालीन सांसद श्री फूलचंद वर्मा, पूर्व विधायक श्री नारायणसिंह केसरी, पूर्व विधायक श्री रतन दादा पाटोदी, श्री प्रकाश सोनकर, श्री गोविंद मालू, श्री निर्मल नेमा, डा. ओम नागपाल, श्री प्रीतमलाल दुआ, श्री हेमंत तिवारी, श्री भूपेंद्र वर्मा, श्री टीकाराम डोंगले, श्री गेंदा बी. राय, श्री ख्यालीराम वर्मा, दैनिक स्वदेश से श्री कृष्णकुमार अष्ठाना, श्री गोपाल जोशी, संघ प्रमुख श्री हरचरण चौकसे, श्री सुभाष सातालकर, रोजगार अधिकारी श्री शरद देशमुख, श्री अब्दुल कुद्दुस, श्री भगवानभाई चौधरी, श्री रतन जैन, कॉ आफाक कुरैशी, श्री तेजासिंह ब्रदर प्रमुख थे। यह एक ऐसा अनुभव रहा जिसने मुझमें समाजसेवा का बड़ा जज्बा और संदेश दिया।

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