Breaking News

चुनावी समर में बेबस एक चुनाव आयोग

Posted on: 25 Apr 2019 20:01 by Mohit Devkar
चुनावी समर में बेबस एक चुनाव आयोग

नीरज राठौर की कलम से

सिंघम फिल्म आप सबने देखी होगी! उस फिल्म में इंस्पेक्टर बाजीराव DGP से जो कहता है उसपर गौर कीजिये…….

“यदि पुलिस अपना काम ठीक से करे तो कोई मंदिर के सामने से चप्पल तक नहीं चुरा सकता!”

इस चुनावी समर में चुनाव आयोग को इस बात पर गौर करने की जरूरत है कि क्या वह अपना काम ठीक से कर रहा है? हम चुनाव आयोग की कार्यशैली पर सवाल करें, उससे पहले ये जान लें कि “चुनाव” का मतलब होता क्या है!!

सीधे शब्दों में कहें तो …..
“चुनाव” का मतलब है जरुरत के मुताबिक अपनी मनपसंद चीजें चुनना! यह अधिकार हर उम्र, जाति, संप्रदाय के इंसान को जन्म के साथ ही मिल जाती है!

हम बाजार जाते हैं तो पूरा बाजार थोड़ी न उठा लाते हैं? समय देते हैं!अम्बार लगी वस्तुओं में सर्वोत्तम तथा किफायती वस्तुएं चुनते हैं! तसल्ली नहीं होती है तो दो एक जगह और देखते हैं! मोलभाव करते हैं! फिर उसे लेकर घर आते हैं! घर पर कई तरह के लोगों की प्रतिक्रियाएं लेते हैं! पसंद नहीं आने पर रिकॉर्ड समय में उसे वापस कर दूसरी वस्तु ले आते हैं! कुछ वस्तुओं पर कुछ सालों की गारंटी/वारंटी भी दी जाती है! तय मियाद के दरम्यान यदि वस्तु में खराबी आती है तो उसे बदल भी देते हैं!

“चुनाव” शब्द जेहन में आते ही हर भारतीय समझ जाता है कि प्रत्याशी का चुनाव होना है! चाहे वह पंचायत का हो या संसद का! भारत का संविधान हमे ये अधिकार देता है कि हम तय मानकों के मुताबिक अपने मनपसंद प्रत्याशी का चुनाव करें!

चुनाव आयोग की जिम्मेदारी यही से शुरू होती है!

125 करोड़ की आबादी में जनता के सामने मुट्ठीभर साफ़ सुथरे प्रत्याशी प्रस्तुत करना- ये पहली जिम्मेदारी है चुनाव आयोग की!
क्या आयोग ऐसा कर पाया है?
जवाब है- नहीं!

आपके सामने प्रत्याशियों की जो लिस्ट पड़ी है, उनमें से अधिकांश दागी हैं! बदजुबान हैं! बद्तमीज हैं! पैसेवाले हैं! निष्पक्ष चुनाव का दम्भ भरने वाला चुनाव आयोग कोई ऐसा प्रावधान क्यों नहीं करता जिससे भले लोग चुनाव में खड़े हो सकें? क्या ये चुनाव सिर्फ बाहुबलियों तथा धनवानों का चुनाव है? प्रत्याशियों के हलफनामे में दर्ज आपराधिक ब्योरे चीख चीख कर उसके कारनामे बताते हैं, फिर भी ऐसे लोगों को विधानसभाओं तथा संसद के गलियारों में प्रवेश की अनुमति दे दी जाती है? प्रत्याशियों के सांप्रदायिक बयानों ने समाज में जहर घोला है, फिर भी आपको नहीं दीखता?

ये सच है कि लोकतान्त्रिक प्रणाली में हर किसी को चुनाव लड़ने का अधिकार है!
लेकिन कितने शरीफ लोग चुनाव लड़ रहे हैं……ये महत्वपूर्ण है!

दूसरी बात, प्रत्याशी का चयन होने के बाद उसके आचरण पर नजर रखने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की ही है! क्योंकि वे आप ही हैं, जिसने उसके सारे डाक्यूमेंट्स को सत्यापित किया है! उसे देश के सामने लाने वाले आप हैं! राजनीतिक दल कैसा भी प्रत्याशी लाकर दे दे, प्रत्याशी चुनाव लड़ेगा या नही ….. ये तय करना आयोग की जिम्मेदारी है!
क्या चुनाव आयोग ऐसा कर पाया है?
जवाब है-नहीं!

यदि ऐसा होता तो, खुद के द्वारा द्वारा लागू की हुई आचारसंहिता का उल्लंघन करने के आरोप में अब तक हजारों प्रत्याशियों का नामांकन ख़ारिज कर चुके होते!

एक ऐसे देश में जहाँ लोग 100 रूपये किलो तक प्याज खरीद कर खा लिए हों, वहां चुनाव आयोग जनता को विकल्प मुहैया कराने में असफल रहा है! पूरे पांच साल जनता इस पर्व के इन्तजार में रहती है! उसका अरबों खरबों रूपये फूंक देते हो! पूरी मशीनरी आपके पास है!

इसके बावजूद यदि जनता को NOTA वाला बटन दबाना पड़े तो सवाल तो उठेंगे ही!

यूक्रेन में लोगों ने यूँही एक कॉमेडियन नहीं चुन लिया होगा! आप विकल्प दीजिये तो सही!

कबतक यूँहीं अंगूठाछाप लोगों के इशारों पर नाचेंगे आप!

एकबार पढ़े लिखे लोगों के साथ काम कर के देखिये .

Read More:जब एक पत्रकार पर भड़के सलमान खान, पुलिस में हुई शिकायत

Latest News

Copyrights © Ghamasan.com