शबाना आजमी को देखने आए थे सब

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shabana ajmi

कुंती माथुर सम्मान समारोह

शहर में दर्जनों सम्मान समारोह होते हैं, लेकिन उनमें इतने सुनने-देखने वाले नहीं आते जितने कल आये थे, आमतौर पर ऐसे सम्मान समारोह में दुआ हॉल भरना मुश्किल हो जाता है और कुर्सियां मुँह चिढ़ाने लगती हैं लेकिन कल आंनद मोहन माथुर हॉल खचाखच भरा था। ऐसे नहीं था कि जो आये थे वो शबाना आज़मी को देखने आए थे, अब शबाना आज़मी का वो माहौल नहीं है कि लोग उनके लिए टाइम निकालें। यहां तो जितने भी लोग थे उन्होंने आनंन्द मोहन माथुर के लिए टाइम खर्च किया था कि जितनी समझ रखने वाले लोग बैठे थे वो कम से कम शबाना आज़मी को देखने के लिए तो नहीं आने वाले थे।

बहरहाल आनंन्द मोहन माथुर हर साल अपनी पत्नी कुंती माथुर की याद में एक अवार्ड देते हैं, इस बार ये अवार्ड शबाना आज़मी को दिया गया कि वो समाजसेवा भी करती हैं, उन्हें सम्मान देने दिग्विजय सिंह अपनी पत्नी अमृता सिंह के साथ आये थे। माथुर सिर्फ अवार्ड ही नहीं देते बल्कि बातों की महफ़िल भी सजाते हैं, इसीलिए उन्होंने जयप्रकाश चौकसे को भी बुलाया था और बारी-बारी से सब को बोलने का मौका दिया। संचालन भी सरोज कुमार से करवाया, जिन्होंने कोई कसर बाकी नहीं रखी, और बातचीत की कड़ियों को अच्छे से जोड़ा, सम्मान की रस्म अदायगी के बाद शबाना आज़मी ने कहा कि हिंदुस्तान कई सदियों को एक साथ जिता है, इस वजह से हमें कई विरोधाभास देखने को मिलते हैं।

वे कह रहीं थी कि महिलाओं के लिए काम करने के लिए मुझे अवार्ड मिला है और आज भी महिलाओं की हालत बेहतर नहीं है,उन्होंने कैफ़ी आज़मी की महिलाओं पर लिखी नज़्म से अपनी बात कही उन्होंने कहा कि मैं नो साल की उम्र तक कम्यून में रही जहाँ हम आठ परिवार को एक ही टायलेट-बॉथरूम शेयर करते थे। मिजवां में कैफ़ी आज़मी ने जो सिलाई केंद्र खोला है, जिसकी एम्ब्रॉयडरी किये कपड़े पर आज मनीष मल्होत्रा अपनी डिजाइन में इस्तेमाल करते हैं। वे कह रहीं थी कि साम्प्रदायिकता और महिलाओं के हित एक साथ जुड़ें हैं, सबसे ज्यादा नुकसान उसे ही होता है। हमें अपने देश में फैली बुराई के खिलाफ आवाज़ उठाने चाहिए, आज माहौल बदल रहा है।

बुराइयां गिनाने वालो को देशद्रोही कहा जा रहा है, लेकिन हमें इनसे डरने की जरूरत नहीं है, इनका मुकाबला करने की जरूरत है। उन्होंने कैफ़ी आज़मी की लिखी नज़्म दूसरा वनवास भी पढ़ कर सुनाई जो उन्होंने अयोध्याकांड के वक़्त लिखी थी, जिसमें बताया गया था कि इस कांड से राम को कितन दुख हुआ होगा। उन्होंने कहा कि हमें अपने मुल्क की खूबसूरती के लिए संघर्ष करना होगा। आखिर में उन्होंने कैफ़ी आज़मी की लिखीं चंद लाइन कोई तो सूद चुकाए, कोई तो जिम्मा ले, उस इंकलाब का जो आज तक उधर है।

उनके बाद दिग्विजय सिंह ने कहा कि देश मे उतार चढ़ाव आते हैं, माहौल बिगड़ता है, बिगाड़ने वाले लोग भी हैं लेकिन आज कल जो देश का माहौल है वो देश की तासीर नहीं है। फेक न्यूज़ आज आतंकवाद से भी बड़ा खतरा है, हमारी सरकार और हम इस पर नियंत्रण नहीं कर पा रहे हैं, टेक्नलॉजी का युग है, टेक्नोलॉजी से चुनाव भी हो रहे हैं और उसके परिणाम भी आ रहे हैं, जब उन्होंने ये कहा तो लोग हंस पड़े, समझने वाले समझ रहे थे कि ये उनका दर्द है । उन्होंने कहा कि आज झूट का माहौल है, लेकिन हमें झूट से डरना नहीं है , चुप नहीं रहना है, हमें लड़ना पड़ेगा।

उन्होंने कहा कि बहुत सारे लोग आश्चर्य चकित है कि राहुल गांधी ने इस्तीफा क्यों दिया,उनके चार पन्ने के इस्टेटमेंनट को पढ़ो पता चलेगा। आज गांधीजी को मारने वाले को देश भक्त कहा जा रहा है, उसकी मूर्ती लगाई जा रही है, क्या हम गांधीजी की मूर्ति पर गोली चलाने वालों के खिलाफ खड़े नहीं हो सकते। इन सब से पहले जयप्रकाश चौकसे ने माइक सम्भाला, लोग उनकी बात खूब सुनना चाहते थे, लेकिन उन्होंने सिर्फ शबाना आज़मी का परिचय ही दिया, बस पूरे सम्मान समारोह में यही अखरने वाली बात थी, माइक पर अमृता दिग्विजय सिंह भी आईं लेकिन उन्होंने बिल्कुल भी वक़्त बर्बाद नहीं किया मुख्तसर में दूसरे बोलने वालों को सुनने की बात कह कर बैठ गईं और दिमाग में ये उथलपुथल छोड़ गईं कि अगर मुद्दे पर बोलतीं तो क्या बोलतीं, कैसे बोलतीं।

बहरहाल, आंनद मोहन माथुर ने भी अपनी बात रखी, दरअसल उन्होंने ही बातचीत को रास्ता दिखाया था, जिस पर सभी का भाषण आगे बढ़ा, उन्होंने कहा कि मैं 1942 में जो भारत चाहता था, वो अब नहीं है, मैंने गांधीजी को देखा है, उनकी प्रार्थना सभा में शामिल हुआ हूँ, नेहरूजी को देखा है, वो 1947 का वो मंज़र भी देखा है, जब दिल्ली की सड़कों पर लोग तलवार लेकर दौड़ रहे थे। 1947 में दो टुकड़े हुए एक इस्लामिक बना और दूसरा सेक्युलर बना सोचा था संविधान बनने के बाद ये देश अलग तरह का देश बनेगा लेकिन अफसोस कि बात है कि आज बड़ी ठंड़ी हवा चल रही है और हमें कंपकपी होने लगी। कुछ ऐसे लोग देश में उठ खड़े हुए कि जो माहौल बिगाड़ रहे हैं। इस बातचीत से पहले छोटा-सा नाटक खेला गया जिसका नाम आदाब है, साम्प्रदायिक एकता पर खेले गए इस नाटक में हिन्दू और मुसलमान बने दोनों कलाकारों ने लाजवाब अभिनय किया। कुलमिलाकर सम्मान समारोह प्यार-मुहब्बत, देश की हालात और उसकी फिक्र के नाम रहा।

आदिल सईद

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