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राजनीति में पिछले रास्ते से प्रभावी बनने का ‘अक्षय’ प्रयास | ‘Akshay Kumar’ Effort to become Effective in Politics…

Posted on: 16 May 2019 18:37 by Surbhi Bhawsar
राजनीति में पिछले रास्ते से प्रभावी बनने का ‘अक्षय’ प्रयास | ‘Akshay Kumar’ Effort to become Effective in Politics…

वैसे तो राजनीति और फिल्म जगत का संबंध कोई नया नहीं है। अनगिनत फिल्म सितारों ने सियासत की दुनिया में कदम रखा और मतदाताओं के दिलों से लेकर सरकार में मंत्री और राज्यों के मुख्यमंत्री बनने तक की भूमिका सफलतापूर्व अदा की है। इस तरह की फेहरिस्त में अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, सुनील दत्त, हेमामालिनी और हालिया पेशकश सनी देओल तक की लंबी फेहरिस्त है।

दक्षिण भारत में तो यह फेहरिस्त और लंबी होने के साथ मजबूत भी है। वहां एमजी रामचंद्रन से लेकर करुणानिधि और जयललिता तक, एनटी रामराव से लेकर चिरंजीवी तक और हाल ही में तमिलनाडु का विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा करने वाले महानायक रजनीकांत से लेकर अपनी पार्टी पबनाकर लोकसभा चुनाव लड़ चुके कमल हासन तक हस्तियों की लंबी फेहरिस्त है।

बहरहाल, सियासत में रुचि दिखाने वाले फिल्मी सितारों में सबसे ताजा नाम है अक्षय कुमार का। वे फिल्मी दुनिया से लेकर प्रशंसकों के दिलों पर राज करने वाले काका यानी राजेश खन्ना के दामाद हैं। उनकी सासुजी हैं फिल्मी दुनिया की बॉबी यानी डिंपल कपाड़िया।

बहरहाल, इन दिनों अक्षय कुमार की चर्चा एक निजी चैनल पर प्रसारित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ लिए गए इंटरव्यू को लेकर है। वैसे भी नरेंद्र मोदी के नारे घर-घर शौचालय को मजबूती प्रदान करने के लिए वे टायलेट एक प्रेमकथा औऱ सफाई अभियान को घर-घर पहुंचाने के लिए महिलाओं की सेनेटरी नैपकिन को प्रमोट करे वाली पैडमेन बनाकर वे सरकार और खासतौर पर मोदी के करीब आने की बेहतरीन फिल्मी भूमिका पहले ही लिख चुके हैं। इतना होने के बाद वे चाहते तो किसी सीट से लोकसभा का टिकट भी जुटा सकते थे। फिर ऐसा क्यों नहीं कर पाए।

इसका जवाब मिला मुंबई में मतदान के दिन मिला। पता चला कि अक्षय कुमार तो भारत के नागरिक ही नहीं। वे अनिवासी भारतीय हैं। उनके पास कनाडा की नागरिकता है। इसके कारण मतदान भी नहीं कर सकते। ऐसा क्यों है? इसका कोई तार्किक जवाब उनके पास नहीं है। हालांकि उनकी पत्नी ट्विंकल खन्ना भारतीय नागरिक हैं। वैसे वे भाजपा की राजनीति में कितने फिट बैठेंगे पता नहीं।

उनके ससुर ने 1991 में नई दिल्ली सीट से कांग्रेस के टिकट पर लालकृष्ण आडवाणी का मुकाबला किया था। तब आडवाणी बमुश्किल डेढ़ हजार मतों से ही जीत पाए थे। बाद में वे गांधीनगर सीट पर चले गए। अगला चुनाव वहां से राजेश खन्ना ने ही जीता था। तब उन्होंने भाजपा के उम्मीदवार शत्रुघ्न सिन्हा को हराया था। यदि भाजपा के दिग्गजों को यह इतिहास याद रहा तो अक्षय कुमार राजनीति में फिट होंगे या हिट विकेट कहना जरा मुश्किल है।

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