महिला लेखन के चुनौतियों पर रखे गए विचार

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Akhil Bharaiy Mahila Sahity Samagam-indore

इंदौर में वामा साहित्य मंच और घमासान डॉट कॉम के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित अखिल भारतीय महिला साहित्य समागम के प्रथम दिवस दिनांक 4 मार्च 2019 के उद्घाटन सत्र का प्रारंभ जाल सभा गृह में हुआ। देशभर से पधारे साहित्कारों की उपस्थिति में कार्यक्रम किया गया।

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उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार उषा किरण खान और अतिथि वक्ता वरिष्ठ कहानीकार व उपन्यासकार कृष्णा अग्निहोत्री थीं। दीप प्रज्वलन व स्वस्ति वाचन से कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ।  वामा साहित्य मंच की अध्यक्ष पद्मा राजेंद्र, सचिव अमर चड्ढा, घमासान की तरफ से शिवानी राठौर मौजूद थीं।

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सरस्वती वंदना पटना से पधारी वरिष्ठ साहित्यकार दिव्या मंडलोई द्वारा की गई। घमासान की शिवनी राठौर व वामा साहित्य मंच की बेला जैन ने साफ़ा शाल व तिलक से उषा किरण खान जी का स्वागत किया।

इंदौर शहर व देश की वरिष्ठ साहित्यकार कृष्णा अग्निहोत्री जी का स्वागत सुरभि भावसार व मंजू मिश्रा ने किया।  स्वागत भाषण वामा साहित्य मंच की अध्यक्ष पद्मा जी राजेंद्र ने किया। उन्होंने सभी उपस्थित साहित्यकारों का स्वागत करते हुए कार्यक्रम की रूपरेखा का वर्णन किया। मिथिलेश दीक्षित जी की पुस्तक हिंदी लघुकथा ‘प्रासंगिकता व प्रयोजन” रती सक्सेना जी का काव्य संग्रह ‘पुस, हंसी एक प्रार्थना है , मंजुला जोशी जी के उपन्यास ‘सिंदूरी पलाश’ का विमोचन हुआ।

Usha Kiran Khan

उषा किरण खान जी ने की इंदौर की साहित्यिक अभिरुचि की प्रशंशा

उषा किरण खान ने अपने बीज वक्तव्य में उज्जैन और ओंकारेश्वर के मध्य इंदौर शहर की साहित्यिक अभिरुचि की प्रशंशा की। उन्होंने कहा की स्त्रियां काया की छाया मानी जाती रही हैं किंतु इस सदी में यह छाया संज्ञा होने जा रही है।

अर्धनारीश्वर की कल्पना में ही स्त्री और पुरुष में भेद नहीं किंतु कालांतर में स्त्री को पददलित कर दिया गया। महिला किसी को नीचा दिखाए बिना भी अपने को खड़ा कर सकती है।

स्त्री पहले भी बिना अक्षरज्ञान के अपने आप को अभिव्यक्त करती रहीं हैं। मिथिला क्षेत्र में अक्षरज्ञान के बिना भी लोक कलाओं के माध्यम से स्त्रियों ने उसे जीवित रखा है। सीता का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि इतिहास व काव्य विशिष्ट व्यक्ति पर लिखा जाता है। भारतीय नारी केवल घूँघट व सीमा में रहने वाली ही हो आवश्यक नहीं है। मजदूर, गतिब, दलित, शोषित स्त्रियों पर भी लिखा जाए और उनके संस्कार भिन्न है।

21वीं सदी स्त्रियों की है, वे कुंठा से बाहर आ रहीं हैं व अपने अधिकारों के प्रति सजग हो रही हैं, संघर्ष को स्त्री को ही पार करना है। स्त्रियों में नैतिकता अधिक है। साहित्य किसी विषय पर आधारित न हो।

लेखन नारी की संवेदना से पिघलकर लिखना प्रारंभ होता है। रवींद्रनाथ टैगोर व शरत चंद्र का उदाहरण दे कर कहा कि पुरुषों ने भी स्त्री पर लिखा किंतु
जब स्त्री अपने बारे में लिखती है तो व अधिक सशक्त लिख सकती हैं। नारी के संघर्ष का सम्मान कर लिखें। स्त्रियों में भी बहनापा बढ़ाना होगा। एक स्त्री के ऊपर अत्याचार का विरोध करना होगा।

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कृष्णा अग्निहोत्री ने साहित्य को बताया समाज की विसंगतियों की औषधि

कृष्णा अग्निहोत्री जी ने अपने वक्तव्य में कहा कि साहित्य समाज की विसंगतियों की औषधि है और इस साहित्य कुंभ में यह औषधियां डल रही हैं। स्त्री भोग्या नहीं है और स्वतंत्रता के बाद से काल व समय का गठबंधन हुआ व क्रष्णा सोबती, मंनु भदारी का साहित्य कालजाई हैं।

साहित्यको बंधन में मत बाँधिये, रूढ़ियों का विरोध हो और दोगली मान्यताओं का विरोध होना चाहिए। लेखन में साहस की आवश्यकता है। व्यष्टि से शमिष्ट् तक पहुँचाना ही साहित्य का अभिमान है। इंदौर की उर्वर भूमि की चर्चा कर यहाँ की साहित्यिक योगदान की चर्चा की।

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महिला को संवेदनाओं और भावनाओं का अनुभूतिे का चित्रण किया जाना चाहिये। महिला सजग है और अच्छा लेखन कर रहीं हैं। लेखिकाओं को आपसी संपर्क को तवज्जो भी दी जानी चाहिये। एक- दूसरे का सम्मान करना होगा। प्रकाशन के लिए, अनुवाद के लिए भी सुविधाएं मिलनी चाहिये। लेखन के लिए लेखिकाओं को भी सुविधाएं मिलनी चाहिये। युवा वरिष्ठ का भेद भी मीटना चाहिये।

अतिथियों का आभार कार्यक्रम की अध्यक्ष शिवानी राठौर ने माना।

 

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