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वह Kumbh, यह kumbh

Posted on: 06 Mar 2019 09:56 by Ravindra Singh Rana
वह Kumbh, यह kumbh

मुकेश तिवारी

जीवन में ऐसा अद्भुत सौभाग्य अब शायद ही फिर कभी मिले। डेढ़ माह में दो कुंभ में शामिल होने और डुबकी लगाने का मौका मिला। पौष पूर्णिमा के पर्व पर प्रयागराज में आस्था के कुंभ में संगम के तट पर डुबकी लगाई। महाशिवरात्रि के महापर्व पर इंदौर में साहित्य के कुंभ में बह रही ज्ञान गंगा में डुबकी लगाने का अवसर हाथ लगा। प्रयागराज कुंभ में छह दिन उन लोगों के बीच रहा जो परम पिता परमात्मा की भक्ति में लीन हैं। इंदौर में दो दिन उन लोगों के मध्य रहा जो कलम के माध्यम से शब्द साधना में तल्लीन हैं।

Akhil Bharaiy Mahila Sahity Samagam-indore

यह संयोग ही है कि 4 मार्च को प्रयागराज कुंभ में जब आखिरी स्नान हो रहा था तब इंदौर में अखिल भारतीय महिला साहित्य समागम की शुरुआत। वहां पवित्र गंगा और संगम के तट पर लाखों लोग आस्था की डुबकी लगा रहे थे तो यहां देश भर से आए सैकड़ों साहित्यकार और साहित्य प्रेमी साहित्य गंगा में। वहां बड़े-बड़े संत महात्माओं की मौजूदगी और मार्गदर्शन था तो यहां बड़ी-बड़ी साहित्यकारों की उपस्थिति और मार्गदर्शन।

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Akhil Bharaiy Mahila Sahity Samagam-indore

आस्था के कुंभ में हर पर्व स्नान और शाही स्नान का महत्व था तो साहित्य के कुंभ में हर सत्र का। शुरुआती सत्र में महिला और उससे संबद्ध साहित्य पर सार्थक चर्चा हुई. वरिष्ठ साहित्यकार उषा किरण खान और कृष्णा अग्निहोत्री ने इस सत्र में अपने विचार रखे. नारी-पुरुष की समानता पर भी बात हुई और महाशिवरात्रि पर अर्धनारीश्वर को भी याद किया गया। दूसरा सत्र लघुकथा पर आधारित था वरिष्ठ साहित्यकार डॉ मिथिलेश दीक्षित की मौजूदगी में लघु कथा में सकारात्मक तेवर विषय पर मंथन हुआ। लघुकथा की बढ़ती लोकप्रियता का जिक्र करते हुए सत्र में बताया गया कि किस तरह विषय-भाव आधारित और लघु ही होना चाहिए। इस सत्र में डॉ दीक्षित के अलावा लता अग्रवाल और अनघा जोगलेकर ने भी अपने विचार रखे।

Swati Joshi Akhil Bharaiy Mahila Sahity Samagam-indore

पहले दिन का तीसरा सत्र कविता पर आधारित था। विचारों के साथ ही इस सत्र में कविता और नवगीत भी गूंजे। शशि पुरवार ने कविताएं नवगीत के साथ अपनी बात को रखा। शोभना श्याम ने कविता की वर्तमान स्थिति पर चर्चा की। वरिष्ठ साहित्यकार रति सक्सेना ने कविता को सामान्य नहीं सशक्त माध्यम निरूपित किया। इस सत्र में कुछ कविता पाठ भी हुए।

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इसके बाद बारी आई टॉक शो की। इसका विषय साहित्य में आधुनिकता की परिभाषा परिपक्वता या खुलापन था। गीताश्री, कुमकुम कपूर, नीलिमा टिक्कू और मीनाक्षी जोशी इसमें चर्चाकार थीं। खुलापन को लेकर हुई खुली चर्चा से यह सत्र इस तरह गरमाया की आवाज सभागृह के बाहर तक सुनाई दी। विचारों के जमकर आदान-प्रदान, विचारों की सहमति- असहमति के बीच यह टाॅक शो हुआ। संचालन श्रुति अग्रवाल ने किया। इस सब के बीच पूरा दिन गुजर गया। देर शाम अक्षर पर्व में शिव तांडव की जब प्रस्तुति हुई तो खूब तालियां गूंजी।

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साहित्य समागम के दूसरे दिन का पहला सत्र ‘आंचलिक भाषाओं का स्वर, माधुर्य, ठेठपन’ पर आधारित था। सरला शर्मा, सुरभि बेहेरा और रचना निगम ने अपने विचार रखे। कहा गया कि आंचलिक भाषा के शब्दों का अपना अनुपम ध्वनि संसार होता है और यह अपनी मधुरता से भाषा को अलग ही आयाम देता है। आखिरी सत्र जिसे समापन सत्र भी कहा जाता है बहुत ही मार्मिक था। अपने पिता से मिली साहित्यिक विरासत की चर्चा करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार अचला नागर, सुधा अरोड़ा, नेहा शरद और निर्मला भुराडिया ने सभी को भावुक कर दिया।

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अचला नागर ने अपने पिता के बारे में बहुत सारी रोचक बातें कहीं। सबसे भावपूर्ण क्षण तब उपस्थित हुआ जब दिव्यांग कलमकार बेटी ऋचा कर्पे को पहला अहिल्या शक्ति सम्मान दिया गया। विपरीत शारीरिक परिस्थिति में साहित्य साधना में जुटी इस बेटी को सम्मानित करते वक्त कई लोगों की आंखें भर आई। वामा साहित्य मंच और घमासान डॉट काम का यह आयोजन विचार ही नहीं व्यवस्था के लिहाज से भी सफल रहा। उस वक्त जाल सभागृह में खूब तालियां गूंजी जब यह घोषणा की गई कि अगले साल नए स्वरूप में यह आयोजन फिर होगा।

लेखक घमासान डॉट काम के संपादक हैं।

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