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हार के बाद अपने हुए हमलावर

Posted on: 26 Dec 2018 16:52 by Surbhi Bhawsar
हार के बाद अपने हुए हमलावर

मुकेश तिवारी
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तीन राज्यों में हार के बाद भारतीय जनता पार्टी और मोदी सरकार पर उसके अपने ही हमलावर हो गए हैं। साथ चुनाव लड़ने और सत्ता में भागीदारी करने वाले दल जिन्हें सहयोगी दल भी कहा जाता है असहयोग जैसी मुद्रा में नजर आने लगे हैं। सबसे पुरानी और कभी भरोसेमंद साथी रही शिवसेना के तेवर तो पहले से ही तीखे थे, तीन राज्यों के चुनाव नतीजों के बाद इनमें और तल्खी आ गई है। दूसरे कई छोटे सहयोगी दल भी अब शिवसेना जैसा ही रुख अपनाने लगे हैं। रोज किसी ना किसी सहयोगी दल की ओर से ऐसा बयान आ जाता है जो मोदी सरकार या भाजपा पर निशाना माना जाता है।

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हार के बाद भाजपा यूं ही सदमे में है और सहयोगी दल उसकी नित मुसीबतें बढ़ा रहे हैं या कहें कि कुछ दल तो राजनीतिक सौदेबाजी पर भी उतर आए हैं। मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में पराजय का पहला बड़ा असर बिहार में एनडीए में हुए लोकसभा सीटों के बंटवारे पर साफ दिखाई पड़ा है। भाजपा को सहयोगी दलों की जिद के आगे झुकना पड़ा है और वह 2014 की तुलना में यहां बहुत कम सीटों पर लड़ेगी। उसे कुछ ऐसी सीटों पर भी अपना दावा छोड़ना पड़ा है जिसे उसने पिछले लोकसभा चुनाव में जीता था। बिहार के बाद अब उत्तर प्रदेश सहित दूसरे कई राज्यों में भी गठबंधन को बचाए रखने के लिए भाजपा को सहयोगी दलों के आगे झुकना पड़ सकता है।

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आज भाजपा उस स्थिति में कतई नहीं बची है जिस स्थिति में वह पिछले लोकसभा चुनाव की तैयारी के वक्त थी। इस समय उसके लिए एक-एक सीट का महत्व है और एक-दो फीसदी वोट का भी। ऐसे में भाजपा नहीं चाहेगी कि वोटों का विभाजन हो और चंद्रबाबू नायडू के नेतृत्व वाली तेलुगू देशम और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी की तरह कोई भी दल अब उससे दूर जाकर कांग्रेस के नजदीक खड़े हो। सत्ता के सेमीफाइनल का क्या महत्व था यह भाजपा के उन नेताओं को भली-भांति समझ में आ गया होगा जो यह कहते फिरते थे कि एक राज्य या एक सीट की हार कतई बड़ी नहीं होती राजनीति में सब चलता रहता है। परिस्थितियां बता रही है कि मजबूर होकर अब भाजपा को सहयोगी दलों की जिद के आगे झुकना ही पड़ेगा और इसकी शुरुआत शायद बिहार से हो भी गई है।

लेखक Ghamasan.com के संपादक है।

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