‘आर्टिकल 15’ देखने के बाद एक नई सोच के साथ बाहर आते हैं

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वरिष्ठ लेखिका पद्मा राजेंद्र की समीक्षा

दिहाड़ी में 3 रु ही तो बढ़ाने की मांग की थी जो कि उनको जायज नहीं लगी, इसलिए नहीं लगी क्योंकि उनकी इतनी औकात नहीं थी। जिसकी जितनी औकात उसको उतना दाम। यह शब्द ठेकेदारों का बहुत ही प्रिय व मुंह लगा शब्द है। जिसे वह मजदूरों को बोलते हैं। सिर्फ बोलते ही नहीं बल्कि उसी के आधार पर उनका शोषण भी करते हैं। वह शोषण मानसिक, आर्थिक ही नहीं बल्कि शारीरिक भी होता है। दलित का छुआ खाएंगे नहीं, पियेंगे नहीं, उन्हें अपने साथ बिठाएंगे भी नहीं पर उनके साथ सामूहिक बलात्कार करते वक्त जात -पात के जुनून की जगह हैवानियत पर उतर आएंगे और दिहाड़ी बढ़ाने की मांग के बहाने दुष्कर्म के साथ – साथ जिंदा लटका देंगे ताकि कोई और मुंह ना उठा सके,तथा बाकी लोगों को सबक भी मिल जाए।

यह सिर्फ फिल्म ही नहीं बल्कि समाज की नंगी सच्चाई है, हर जगह दबाव , दबदबा व खौफ, सच बोलने का खौफ , मनमानी से रोकने का खौफ ,सब चलता है । ‘साहब आपका तो ट्रांसफर होगा ,पर हम मारे जाएंगे ‘ यह पुलिस वालों का ख़ौफ़, राजनीतिक दबाव, काम करने की आजादी नहीं , सच से पर्दा उठाने की मनाही, जो आवाज उठाता है उसे खत्म करने का जघन्य अपराध, क्या व कितनी सच्चाई है समाज की,देश की , लाल गांव जैसे कई गांवों की कस्बों की, उस पर अनुभव सिन्हा ने फिल्म के माध्यम से आवाज उठाई है।

हत्या और बलात्कार की रिपोर्ट कैसे बदल दी जाती है। जमीर अगर जाग रहा है तो उस पर करारा तंज यह कह कर सुलाने की कोशिश की जाती है की फेसबुक पर 2-4 कविता लिख दीजिए। सारा गुबार निकल जाएगा, पर यहां तो रिपोर्ट मैं वही सब लिखना है जो हम चाहते हैं । अगर आपको जिंदा रहना है तो ।

मासूम नाबालिग दुष्कर्म की शिकार लड़कियों का शव पिता अकेले गाड़ी में खींच रहे हैं और बैकग्राउंड में जो लोकगीत बजता है वह कलेजा चीर के रख देता है , और उस पर दुहाई यह की अभी तो रोड व बाथरूम बन रहे हैं कुछ महीनों में यह ठेकेदार चले जाएंगे मिट्टी डालो साहब यहां आवाज उठाने वालों को उठा दिया जाता है।

अनुसूचित जाति वालों के घर खाना खाने कि जो नौटंकी चलती है उस पर भी करारा तंज ‘साहब महंत खाना भी घर से लाए हैं, व बर्तन भी’ । सरहद पर जो जान देते हैं ,उन्हें तो शहीदों का सम्मान दिया जाता है पर जो मैनहोल की सफाई करते वक्त मरते हैं उनके लिए कोई 2 मिनट का मौन भी नहीं रखता है। यह सब आज की सच्चाई है ।

एक परिपक्व प्रेम भी फिल्म में चलता है , नायक कहता है –– तुम्हें हीरो चाहिए ,तो नायिका का बहुत ही बढ़िया जवाब होता है– ‘जो हीरो का वेट न करें वह चाहिए’। एक संवाद और होता है– नायक कहता है प्रजा होती है ,राजा होता है ,तो नायिका बेमिसाल जवाब देती है ‘ राजा बनाना ही क्यों ‘ तात्पर्य यह है कि अगर राजा अच्छा ना होगा तो अत्याचार ही होंगे ।

” फर्क बहुत कर लिया अब फर्क लाएंगे ” यह संदेश देती बहुत अच्छी फिल्म सभी कलाकारों का अभिनय बहुत ही उम्दा अनुभव सिन्हा का निर्देशन कसा हुआ दर्शक फिल्म से बंधा हुआ रहता है ..और एक नई सोच के साथ सिनेमा हॉल से बाहर आता है।

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