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आखिर क्या है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर बनी फिल्म में | After all what is in the film made on Prime Minister Narendra Modi

Posted on: 07 Apr 2019 09:55 by Pawan Yadav
आखिर क्या है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर बनी फिल्म में | After all what is in the film made on Prime Minister Narendra Modi

वरिष्ठ पत्रकार ऋषिकेश राजोरिया

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जोरदार उपयोग एक फिल्म बनी है पीएम नरेन्द्र मोदी। इसके निर्माता सुरेश ओबेराय सहित चार लोग हैं। फिल्म के हीरो हैं सुरेश ओबेराय के पुत्र विवेक ओबेराय, जिन्होंने इस फिल्म में अपना नाम विस्तारित कर विवेक आनंद ओबेराय रख लिया है। हालांकि इससे लोग उन्हें विवेकानंद नहीं समझेंगे। वे विवेक ओबेराय ही रहेंगे। फिल्म का निर्देशन उमंग कुमार ने किया है। यह फिल्म योजनाबद्ध तरीके से लोकसभा चुनाव से ठीक पहले प्रदर्शित करने के लिए बनाई गई प्रतीत होती है। इस फिल्म के प्रदर्शन पर चुनावी आचार संहिता लागू नहीं होती है, ऐसा चुनाव आयोग के हवाले से सुनने में आया है। इस फिल्म का प्रदर्शन रुकवाने के लिए एक कांग्रेस कार्यकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। अभिषेक मनु सिंघवी वकालत कर रहे हैं, जो कि कांग्रेस के नेता भी हैं।

फिल्म बनाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। मुंबई में हजारों लोग तरह-तरह की सभी ग्रेड की फिल्में बनाते रहते हैं। एक फिल्म और सही। यह एक कारोबार है, जिसमें लाखों लोगों को कारोबार मिलता है, लेकिन चमकते सिर्फ सितारे ही हैं। पर्दे के पीछे कई गतिविधियां होती हैं। देश में 1952 से लोकसभा चुनाव हो रहे हैं और 2019 में सत्रहवीं बार लोकसभा के चुनाव हो रहे हैं। इस अंतराल में पहली बार चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री पर फिल्म बनाने की घटना हुई है। देश आजाद होते ही जवाहरलाल नेहरू ने राजपाट संभाल लिया था, लिहाजा उनकी पार्टी कांग्रेस ही राजनीति के केंद्र में रही। कुछ चुनावों तक कांग्रेस ही सरकार बनाती रही। बाद में जनता ने अन्य नेताओं को भी सरकार चलाने का मौका देना शुरू किया।

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लोकसभा चुनाव के जरिए नेताओं को केंद्र सरकार पर नियंत्रण करने का मौका मिलता है। उसके बाद कुछ हासिल करने के लिए नहीं रह जाता। जनता के वोटों से ही सरकार बनाने का मौका मिलता है, इसलिए जनता के वोट बटोरने के लिए हर तरह के उपाय किए जा रहे हैं। पहले कुछ मर्यादाएं हुआ करती थीं। अब वर्जनाएं टूट रही हैं और चुनाव जीतने के लिए हर तरह की मनमानी चल रही है। यह फिल्म भी इसी का नतीजा है। नरेन्द्र मोदी को सरकार चलाते हुए पांच साल नहीं हुए और उन्हें महापुरुष घोषित करना है।
2014 के लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी ने जनता के सामने लच्छेदार भाषण दिए।

खुद का खूब प्रचार करवाया। कांग्रेस की सरकार की कमजोरियों का तरह-तरह से बखान किया और जनता से वादा किया कि वे इससे अच्छी सरकार देंगे। उनकी सरकार बन गई। अच्छी रही या बुरी, जनता को 2019 के लोकसभा चुनाव में फैसला सुनाना है। कोई भी सरकार चलती है तो उसके खिलाफ जनता में सत्ता विरोधी रुझान बनता है। यह राजनीति की रासायनिक प्रक्रिया है। मोदी ने जो बिना ब्रेक की गाड़ी की तरह सरकार चलाई है, उसे बहुत से लोग पसंद नहीं कर रहे हैं। इस आशंका के चलते मोदी महापुरुष हैं और देश के लिए अनिवार्य हैं, यह बात लोगों के दिमाग में बैठाने के हर संभव उपाय साल भर पहले से शुरू हो गए थे। संभवतः इन्हीं प्रयासों के तहत फिल्म बनी है पीएम नरेन्द्र मोदी।

फिल्म पीएम नरेन्द्र मोदी के खिलाफ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के लिए 8 अप्रैल की तारीख तय की है। इसके साथ ही निर्माताओं ने फिल्म रिलीज करने की तारीख 6 से बढ़ाकर 11 अप्रैल कर दी है। सुप्रीम कोर्ट क्या फैसला करेगी, इससे पहले ही फिल्म के सार्वजनिक प्रदर्शन की तारीख घोषित कर दी गई है। 11 अप्रैल को लोकसभा चुनाव के पहले चरण का मतदान है। इस दिन पीएम नरेन्द्र मोदी के प्रदर्शन का काफी महत्व है। इससे पहले चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन 6 अप्रैल को प्रदर्शन का दिन तय हुआ था, जो टल गया। निर्माताओं का कहना है कि यह फिल्म उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत बनाई है। उन्हें फिल्म बनाने का अधिकार है और उनके काम से लोकसभा चुनाव का कोई संबंध नहीं है।

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सवाल यह है कि भरोसा कौन करेगा? फिल्म का निर्माण करीब छह महीनों में युद्ध स्तर पर हुआ है और इंडियन एक्सप्रेस में खबर भी छपी थी कि गोधरा कांड का सीन फिल्माने के लिए गुजरात में रेलवे लाइन का उपयोग किया गया और बोगियां जलाने का सीन फिल्माया गया था। इस तरह के फिल्मांकन सरकार के सहयोग के बगैर नहीं हो सकते हैं। रेल मंत्रालय ने मंजूरी दी होगी। लोकसभा चुनाव की तारीख पहले से मालूम रहती है। फिल्म बनाने में कितना समय लगता है, इसका अनुमान भी रहता है। इस तरह एक पूर्व निर्धारित योजना के तहत यह फिल्म ठीक लोकसभा चुनाव से पहले बनकर आई है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। अभिव्यक्ति की इस स्वतंत्रता का सम्मान किया जाना चाहिए।

इससे पहले किसी प्रधानमंत्री के जीवित रहते ऐसी फिल्म नहीं बनी। जवाहरलाल नेहरू ने भी खुद पर फिल्म के बारे में नहीं सोचा। फिल्म के माध्यम का चुनावी उपयोग इससे पहले कभी नहीं हुआ। यह पहली बार हो रहा है कि लोकसभा चुनाव होने वाले हैं और उससे ठीक पहले प्रधानमंत्री पर फिल्म बनकर आ गई। मोदी सही कहते हैं कि देश तेजी से विकास कर रहा है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अब राजनीतिक कारोबार के साथ गड्ड-मड्ड हो गई है। जो सरकार का विरोध करते हैं, सरकार के किसी कार्य से असहमत हैं, वे देश विरोधी हैं और जो समर्थन में हैं उनके हर कार्य उचित हैं। इसी तरह पीएम नरेन्द्र मोदी शीर्षक से फिल्म बनाना भी उचित ही है।

नरेन्द्र मोदी की अनुमति के बगैर निर्माताओं ने फिल्म नहीं बनाई होगी। जीवित व्यक्ति पर फिल्म बनाने के लिए उसकी अनुमति लेना लाजिमी है। मोदी ने अनुमति दे दी होगी। इससे अपने आप साबित है कि वे खुद को देश का महानायक साबित करने की फिराक में है। अगर देश के लोग महानायक नहीं मानते हैं तो फिल्म के माध्यम से ही सही। फिल्म के हीरो हैं पीएम नरेन्द्र मोदी। यह फिल्म रिलीज होने के लिए तैयार है और सुप्रीम कोर्ट ने हरी झंडी दे दी तो हर भाजपा कार्यकर्ता के लिए यह फिल्म देखना जरूरी होगा। फिल्म हिट होने की पूरी गारंटी है।

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