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पृथ्वी दिवस पर पीढ़ियों से होते आ रहे प्रकृति के प्रति पाप की स्वीकारोक्ति… | Acceptance of Sin against Nature coming from the Generations on Earth Day…

Posted on: 25 Apr 2019 11:09 by rubi panchal
पृथ्वी दिवस पर पीढ़ियों से होते आ रहे प्रकृति के प्रति पाप की स्वीकारोक्ति… | Acceptance of Sin against Nature coming from the Generations on Earth Day…

“लुप्त हो गयी ”

बचपन हमारा गुज़रा
जिन पहाड़ियों की गोद में
जंगलों की छाँव में…
जवानी गुज़र गयी
उनकी छाती रौंदकर
विकास की राह में
मज़दूरी करते-करते …
बुढ़ापा देख रहा उन्हें अब
खत्म होते नष्ट होते…
न दे पाए विरासत में
तुझे वो सम्पदा मेरे बच्चे
जो मिली थी हमें विरासत में …
अब चले हैं ढूंढने
कुछ विरासतें….
जो
न उजड़ी हों अभी तक
न बदले हों हरे जंगल
सीमेंट के जंगल से जहाँ …
बहती हो नदियाँ
न सूखकर लुप्त हुई हों जहाँ ..
सीना ताने खड़े हो पर्वतराज
न बलिदान हुए हों विकास की राह पर…
पगडंडी ढूंढते हैं वो
जो जोड़ती थी न सिर्फ दो गांवों को बल्कि,दो सभ्यताओं को…
कच्ची थी सड़क भले ही वो
पर चलते थे उस पर इरादे पक्के ….
अगर मिल जाए
धरती के किसी कोने में ये एक टुकड़ा विरासत..
तो बच जाए
मानवता शर्मसार होने से!
विकास निरुत्तर होने से!
इंसान बर्बाद होने से!
काश!! समय रहते
निकल पड़ते हम इस खोज में
तो आज तेरे गुनहगार न होते

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